19 August in History: ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार वर्ष का 231वां दिन (लीप वर्ष में 232वां दिन) है। साल में अभी और 134 दिन शेष हैं। भारत और विश्व इतिहास में 19 अगस्त का खास महत्व है, क्योंकि इस दिन कई महत्वपूर्ण घटनाएं घटी जो इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज होकर रह गईं हैं।
आज का इतिहास में जानिए आज के दिन जन्मे चर्चित व्यक्ति, प्रसिद्ध व्यक्तियों के निधन, युद्ध संधि, किसी देश की आजादी, नई तकनिकी का अविष्कार, सत्ता का बदलना, महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दिवस के बारे में। आईए हिमाचल न्यूज़ में पढ़ें भारत और विश्व इतिहास के पन्नों में दर्ज 19 अगस्त का इतिहास एवं घटनाक्रम।
231 साल पहले देश में पहली बार जारी किया गया था 1 रुपए का सिक्का, प्लासी के युद्ध में जीत के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने की थी शुरुआत
ईस्ट इंडिया कंपनी की शुरुआत एक विशुद्ध व्यापारिक संस्था के रूप में हुई थी, जो मुख्य रूप से एशिया में रेशम (सिल्क), सूती कपड़ा, नील, चाय और नमक का कारोबार करती थी। कंपनी ने 1640 के आसपास भारत में 23 फैक्ट्रियां स्थापित कर ली थीं, जहां करीब 100 लोग काम करते थे। शुरुआती कई दशकों तक कंपनी का भारत के शासन-प्रशासन में कोई दखल नहीं था। लेकिन 1757 में प्लासी के युद्ध में मिली जीत ने ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए भारत में राजनीतिक और प्रशासनिक नियंत्रण के दरवाजे खोल दिए।
प्लासी की जीत के बाद कंपनी ने बंगाल के नवाब के साथ एक संधि की, जिसके तहत उसे अपने सिक्के बनाने का कानूनी अधिकार प्राप्त हुआ। इसके तुरंत बाद कंपनी ने कोलकाता में एक टकसाल की स्थापना की। इसी क्रम में 19 अगस्त 1757 को ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा 1 रुपये का पहला आधिकारिक सिक्का जारी किया गया।

कोलकाता से पहले कंपनी सूरत, बॉम्बे और अहमदाबाद में भी सिक्के बनाने का प्रयास कर चुकी थी, लेकिन एक रुपये का पहला आधिकारिक सिक्का कोलकाता टकसाल में ही ढाला गया। सूरत में सबसे पहली टकसाल बनी थी, लेकिन वहां मांग के अनुसार सिक्के नहीं बन पाते थे, जिसके कारण 1636 में अहमदाबाद में टकसाल शुरू की गई। 1672 में बॉम्बे में सिक्के बनने लगे, जहां यूरोपीय शैली के सोने, चांदी और तांबे के सिक्के ढाले जाते थे। सोने के सिक्कों को कैरोलिना, चांदी के सिक्कों को एंजलीना और तांबे के सिक्कों को कॉपरून कहा जाता था।
उस दौर में पूरे भारत में एक समान मुद्रा व्यवस्था नहीं थी। बंगाल, मद्रास और बॉम्बे प्रेसिडेंसी में अलग-अलग वजन, आकार और मूल्य के सिक्के चलते थे, जिससे व्यापार में भारी परेशानी होती थी। इस समस्या को हल करने के लिए 1835 में ‘यूनिफॉर्म कॉइनेज एक्ट’ पारित किया गया। इसके बाद पूरे ब्रिटिश भारत में एक जैसे सिक्के जारी किए जाने लगे। इन नए सिक्कों के एक तरफ ब्रिटिश सम्राट विलियम चतुर्थ (William IV) की तस्वीर होती थी और दूसरी तरफ अंग्रेजी व फारसी भाषा में सिक्के का मूल्य लिखा होता था।
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन चला गया और सिक्कों पर ब्रिटिश सम्राट की तस्वीरें छपने लगीं। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान चांदी की किल्लत होने पर कागज के नोट जारी किए गए। 1947 में भारत के आजाद होने के बाद भी 1950 तक यही औपनिवेशिक सिक्के देश में प्रचलन में रहे।
19 अगस्त 1942 को बलिया हुआ था आजाद राष्ट्र घोषित: देश में सबसे पहले ब्रिटिश सरकार के समानांतर स्वतंत्र बलिया प्रजातंत्र की सरकार का गठन
भारत के स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उत्तर प्रदेश के बलिया जनपद का नाम स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। 19 अगस्त का दिन बलिया और पूरे देश के लिए अत्यंत गौरवशाली है। सन 1947 में मिली देश की आजादी से ठीक 5 साल पहले, यानी 19 अगस्त 1942 को, बलिया के वीर सपूतों ने अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेंककर बलिया को एक ‘स्वतंत्र राष्ट्र’ घोषित कर दिया था। अपने इसी विद्रोही और निडर तेवर की वजह से इस क्षेत्र को ‘बागी बलिया’ की ऐतिहासिक पहचान मिली।

9 अगस्त 1942 को मुंबई अधिवेशन में महात्मा गांधी द्वारा ‘करो या मरो’ का शंखनाद करते ही पूरे देश में आंदोलन की आग भड़क उठी। लेकिन बलिया में इसका असर सबसे प्रचंड था। स्थानीय क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश शासन के प्रशासनिक ढांचे को ध्वस्त करना शुरू कर दिया। थाने, तहसीलों और सरकारी कार्यालयों पर आजादी के दीवानों ने कब्जा जमा लिया।
19 अगस्त 1942 की शाम 5 बजे तक बलिया जिला कारागार के बाहर हजारों ग्रामीणों और क्रांतिकारियों का महासमुद्र उमड़ पड़ा। लोग अपने पारंपरिक हथियारों से लैस होकर जेल में बंद अपने प्रिय नेताओं की रिहाई की मांग कर रहे थे।
जनता के इस उग्र हुजूम और आक्रोश को देखकर तत्कालीन जिलाधिकारी जगदीश्वर निगम और एसपी रियाजुद्दीन के हाथ-पांव फूल गए। दोनों अधिकारियों ने जेल के भीतर जाकर आंदोलनकारियों से वार्ता की और घुटने टेकते हुए चित्तू पांडेय, राधामोहन सिंह और विश्वनाथ चौबे को तत्काल प्रभाव से रिहा कर दिया।
जेल से रिहा होते ही चित्तू पांडेय के नेतृत्व में जनसैलाब कलेक्ट्रेट की ओर बढ़ा और सभी सरकारी इमारतों से ब्रिटिश झंडे को उतारकर गर्व से तिरंगा फहरा दिया गया।
19 अगस्त 1942 की शाम करीब 6 बजे बलिया को स्वतंत्र घोषित कर दिया गया। देश के इतिहास में पहली बार ब्रिटिश हुकूमत के समानांतर ‘स्वतंत्र बलिया प्रजातंत्र’ की सरकार का गठन हुआ और सर्वसम्मति से चित्तू पांडेय को प्रथम शासनाध्यक्ष नियुक्त किया गया।
चित्तू पांडेय के नेतृत्व में यह स्वतंत्र सरकार 22 अगस्त 1942 तक सफलतापूर्वक चलती रही। लेकिन आंदोलन को कुचलने के लिए ब्रिटिश सरकार के गवर्नर जनरल हैलट ने वाराणसी के कमिश्नर नेदर सोल को भारी सैन्य बल के साथ बलिया का प्रभारी बनाकर भेजा।
22 अगस्त की रात नेदर सोल ने बलिया पहुंचकर अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी और एक-एक करके सरकारी कार्यालयों पर फिर से कब्जा जमाना शुरू किया। 23 अगस्त को इलाहाबाद से लेफ्टिनेंट मार्स स्मिथ भी अतिरिक्त पुलिस बल के साथ पहुंच गया।
अंग्रेजों ने अत्यंत दमनकारी रुख अपनाते हुए सुखपुरा, बांसडीह, चौरवां, रसड़ा, नरहीं और चितबड़ागांव जैसे क्षेत्रों में क्रांतिकारियों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाईं। इस खूनी दमन चक्र में 84 क्रांतिकारी शहीद हो गए। इसके बाद चित्तू पांडेय, महानंद मिश्र, राधामोहन सिंह, जगन्नाथ सिंह, रामानंद पांडेय और उमाशंकर समेत प्रमुख नेताओं को पुनः गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया।
भले ही अंग्रेजों ने सैन्य बल से बलिया पर दोबारा कब्जा कर लिया, लेकिन 19 अगस्त 1942 को बलिया के वीरों द्वारा जलाई गई आजादी की यह मशाल पूरे देश के लिए प्रेरणा स्रोत बन गई।
आज अफगानिस्तान का स्वतंत्रता दिवस
सोवियत संघ, अमेरिका और तालिबान जैसी महाशक्तियों की खींचतान का केंद्र रहा अफगानिस्तान आज अपना स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। 19 अगस्त 1919 ही वह ऐतिहासिक दिन था जब अफगानिस्तान ने ब्रिटिश हुकूमत के नियंत्रण से अपनी विदेश नीति और पूर्ण स्वतंत्रता हासिल की थी।

हालांकि, अफगानिस्तान कभी भी औपचारिक रूप से ब्रिटेन का उपनिवेश (कॉलोनी) नहीं रहा, लेकिन अपनी रणनीतिक भौगोलिक स्थिति के कारण इसे ब्रिटिश भारत और रूसी साम्राज्य के बीच ‘द ग्रेट गेम’ का शिकार होना पड़ा। ब्रिटेन ने अफगानिस्तान पर अपना प्रभाव जमाने के लिए तीन बड़े युद्ध लड़े, जिन्हें ‘एंग्लो-अफगान वॉर’ कहा जाता है।
ब्रिटेन को डर था कि रूसी साम्राज्य अफगानिस्तान के रास्ते भारत में ब्रिटिश शासन के लिए खतरा पैदा कर सकता है। इसी डर से ब्रिटेन ने 1839 में अफगानिस्तान पर हमला कर दिया। शुरुआती सफलता के बाद अंग्रेजों ने दोस्त मोहम्मद खान को गद्दी से हटाकर शाह शुजा को अमीर बना दिया। लेकिन अफगान कबीलों के भीषण जनाक्रोश और विद्रोह के आगे ब्रिटिश सेना टिक न सकी और उन्हें पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा। 1843 में दोस्त मोहम्मद खान फिर से अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज हुए।
1875 में लॉर्ड लिटन भारत के गवर्नर जनरल बने। अफगानिस्तान में रूस का प्रभाव बढ़ते देख लिटन ने काबुल में एक ब्रिटिश मिशन भेजने की कोशिश की, जिसे अफगान सीमा पर ही रोक दिया गया। लेकिन जब अफगानिस्तान ने रूसी राजदूत का काबुल में स्वागत किया, तो भड़के लॉर्ड लिटन ने 1878 में हमला बोल दिया। तत्कालीन अफगान शासक शेर अली देश छोड़कर भाग गए और काबुल पर अंग्रेजों का वर्चस्व हो गया। इस युद्ध के बाद हुई संधि के तहत अफगानिस्तान के आंतरिक मामलों में तो उसकी स्वायत्तता रही, लेकिन विदेश नीति का पूरा नियंत्रण ब्रिटेन के हाथों में चला गया।
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जब ब्रिटेन ओटोमन (उस्मानी) साम्राज्य से लड़ रहा था, तब अफगानिस्तान में ब्रिटिश विरोधी भावनाएं चरम पर थीं। 20 फरवरी 1919 को अफगान शासक हबीबुल्लाह खान की हत्या कर दी गई, जिसके बाद उनका बेटा अमानुल्लाह खान गद्दी पर बैठा। अमानुल्लाह खान ने तुरंत ब्रिटेन से पूर्ण स्वतंत्रता का ऐलान कर दिया।
प्रथम विश्व युद्ध से थकी-हारी ब्रिटिश सेना एक और लंबी लड़ाई झेलने की स्थिति में नहीं थी। नतीजतन, 8 अगस्त 1919 को रावलपिंडी में एक शांति संधि पर हस्ताक्षर हुए और 19 अगस्त 1919 को ब्रिटेन ने आधिकारिक रूप से अफगानिस्तान को एक संप्रभु और आजाद देश के रूप में मान्यता दे दी।
19 अगस्त के दिन को इतिहास में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय महत्व की इन घटनाओं की वजह से याद किया जाता है…
1600: मुगल बादशाह अकबर ने अहमदनगर पर विजय हासिल की। यह विजय मुगलों के दक्षिण भारत में विस्तार का एक बड़ा चरण थी।
1666: छत्रपति शिवाजी महाराज अपने पुत्र संभाजी के साथ आगरा में मुग़ल सम्राट औरंगजेब की कैद से फलों और मिठाइयों की बड़ी टोकरियों में छिपकर चतुराई से बाहर निकले और फरार हो गए। मई 1666 में आगरा दरबार में अपमानित होने के बाद औरंगजेब ने शिवाजी को आगरा में नजरबंद किया था।
1897: लंदन में पहली इलेक्ट्रिक टैक्सी का परिचालन किया गया।
1944: द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इम्फाल और कोहिमा की भयंकर लड़ाइयों के बाद भारत से जापान की अंतिम सैन्य टुकडी को खदेडा गया।
1947: जवाहरलाल नेहरू ने पंजाब की अत्यंत गंभीर स्थिति और विभाजन के बाद जारी साम्प्रदायिक हिंसा पर रेडियो प्रसारण किया। उनके अभिलेख में यह प्रसारण ‘पांच नदियों की दुखी धरती’ शीर्षक से दर्ज है।
1949: भुवनेश्वर ओडिशा की राजधानी बनी।
1960: सोवियत संघ ने स्पुतनिक-5 अंतरिक्ष यान भेजा, जिसमें दो कुत्ते बेल्का और स्त्रेल्का सवार थे। दोनों सुरक्षित पृथ्वी पर लौटे।
1964: नासा द्वारा दुनिया की पहली दुनिया की पहली भू-स्थिर उपग्रह (जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट) ‘सिन्कोम-3’ लॉन्च की गई। इसे प्रशांत महासागर के ऊपर स्थापित किया गया था। इसी उपग्रह ने टोक्यो ओलंपिक 1964 का पहला सीधा अंतरराष्ट्रीय टेलीविजन प्रसारण अमेरिका और दुनिया के अन्य देशों में किया था।
1966: पूर्वी तुर्की के मुश प्रांत (विशेषकर वर्तो और हिनीस क्षेत्र) में 6.8 से 6.9 तीव्रता के विनाशकारी भूकंप से 2394 लोग मारे गए, 1500 से अधिक लोग घायल हुए और हज़ारों लोग बेघर हो गए।
1978: ईरान के अबादान में सिनेमा घर में आग लगने से 422 की मौत। इस्लामी चरमपंथ से प्रेरित चार उग्रवादियों ने सिनेमा घर की इमारत पर हवाई जहाज का ईंधन छिड़ककर आग लगा दी थी।
1999: भारत की परमाणु नीति मसौदे पर नाराज़ दुनिया के प्रमुख विकसित देशों के समूह जी-8 ने भारत को दी जाने वाली सभी प्रकार की आर्थिक और तकनीकी मदद पर रोक लगाने की घोषणा की थी।
2000: पाकिस्तान की प्रसिद्ध वकील और मानवाधिकार हिना जलाली विश्व की पहली मानवाधिकार संरक्षक प्रतिनिधि नियुक्त।
2003: इराक के बगदाद स्थित कैनाल होटल में संयुक्त राष्ट्र के कार्यालय पर ट्रक-बम हमला हुआ। इसमें 22 लोगों की मौत हुई, जिनमें संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिनिधि सर्जियो विएरा द मेलो भी शामिल थे। इस घटना की स्मृति में बाद में 19 अगस्त को विश्व मानवीय दिवस घोषित किया गया।
2004: पीटर वान डेन हूगेनबैंड ने एथेंस ओलंपिक में 200 मीटर फ्रीस्टाइल तैराकी स्पर्धा जीतकर ओलंपिक इतिहास के सबसे तेज तैराक बने।
2004: दुनिया की सबसे बड़ी इंटरनेट कंपनी Google ने 2004 में आज ही के दिन अपने शेयर बाजार में उतारे थे। कंपनी ने अपने एक शेयर की कीमत 85 डॉलर रखी थी।
2013: बिहार के धमरा घाट में राज्यरानी सुपरफास्ट एक्सप्रेस की चपेट में आने से पटरी पार कर रहे 28 श्रद्धालु मारे गए। (शुरुआती पुलिस और स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार 37 लोगों की मौत की पुष्टि की गई थी, जबकि बाद में रेलवे अधिकारियों ने मृतकों की संख्या 28 बताई थी।)
2022: जल जीवन मिशन के तहत “हर घर जल” मिशन को पूरा करने वाला गोवा देश का पहला राज्य और दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव पहला केंद्र शासित प्रदेश (UT) बना।
2023: हिमाचल प्रदेश सरकार ने भारी मानसूनी बारिश, बाढ़ और भूस्खलन से हुए भारी विनाश के बाद पूरे राज्य को ‘प्राकृतिक आपदा प्रभावित क्षेत्र’ घोषित किया था। उस समय तक आपदा में 330 से अधिक लोगों की जान जा चुकी थी और राज्य को लगभग 10,000 करोड़ रुपये से अधिक का आर्थिक नुकसान हुआ था।
19 अगस्त को जन्मे प्रमुख व्यक्ति
1871: ऑरविल राइट – हवाई जहाज के आविष्कारक ‘राइट बंधुओं’ में से एक, जिन्होंने दुनिया की पहली सफल नियंत्रित और संचालित हवाई उड़ान भरी थी।
1887: एस. सत्यमूर्ति – भारत के क्रांतिकारी नेता थे।
1891: हरिशंकर शर्मा – पद्म श्री से सम्मानित भारत के प्रसिद्ध साहित्यकार, कवि, लेखक, व्यंग्यकार और पत्रकार।
1906: फिलो टी. फार्न्सवर्थ – अमेरिकी आविष्कारक। उन्हें इलेक्ट्रॉनिक टेलीविजन प्रणाली के शुरुआती प्रमुख आविष्कारकों में माना जाता है।
1907: हज़ारी प्रसाद द्विवेदी – पद्म भूषण से सम्मानित हिंदी साहित्य के महान निबंधकार, आलोचक, उपन्यासकार और विद्वान। उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ और ‘अशोक के फूल’ शामिल हैं।
1908: महाराजा बीर बिक्रम किशोर माणिक्य – त्रिपुरा के अंतिम महाराजा, जिन्हें आधुनिक त्रिपुरा का निर्माता माना जाता है।
1908: अब्दुल राशिद ख़ान – पद्म भूषण से सम्मानित हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायक।
1918: शंकरदयाल शर्मा – भारत के नवें राष्ट्रपति (25 जुलाई 1992 से 25 जुलाई 1997 तक)।
1928: शिवप्रसाद सिंह – साहित्य अकादमी पुरस्कार’ से सम्मानित हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार।
1940: गोविंद निहलानी – प्रसिद्ध भारतीय फिल्म निर्देशक, छायाकार और पटकथा लेखक, जिन्होंने समानांतर सिनेमा में सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर गंभीर फिल्में बनाईं।
1941: जसवंत सिंह रावत – भारतीय थल सेना के जांबाज सैनिक। उन्हें 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान अरुणाचल प्रदेश के नूरानंग में अकेले 72 घंटे तक चीनी सेना को रोके रखने और लगभग 300 दुश्मन सैनिकों को मार गिराने के उनके अदम्य साहस के लिए मरणोपरांत प्रतिष्ठित महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था।
1946: बिल क्लिंटन – अमेरिका के 42वें राष्ट्रपति। इन्होंने भारत के साथ मधुर राजनयिक संबंध स्थापित किए।
1950: सुधा मूर्ति – सामाजिक कार्यकर्ता। वे इन्फोसिस फाउंडेशन के संस्थापक एन. आर. नारायणमूर्ति की पत्नी है।
1967: सत्या नडेला – विश्व की सबसे बड़ी सॉफ़्टवेयर कंपनी माइक्रोसॉफ़्ट के सीईओ। हैदराबाद में जन्मे नाडेला को भारत सरकार द्वारा ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया जा चुका है।
1985: विजय कुमार – भारतीय निशानेबाज़ हैं। वे 2012 के लंदन ओलंपिक में 25 मीटर रैपिड फायर पिस्टल इवेंट में रजत पदक जीतने वाले पहले भारतीय बने।
19 अगस्त को हुए प्रमुख निधन
1909: बदरुद्दीन तैयबजी – प्रसिद्ध वकील, न्यायाधीश और नेता। उन्होंने भारत की आज़ादी और इंसाफ की लड़ाई को नई दिशा दी।
1993: उत्पल दत्त – हिन्दी तथा बांग्ला फ़िल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता और निर्माता।
1987: सचिन नाग – भारतीय तैराक। उन्होंने 1951 के एशियाई खेलों में पुरुषों की 100 मीटर फ्रीस्टाइल में स्वर्ण पदक जीता, जो एशियाई खेलों में भारत के लिए पहला स्वर्ण पदक था।
1994: लिनस पॉलिंग – महान अमेरिकी वैज्ञानिक। वह इतिहास के इकलौते ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें दो अलग-अलग क्षेत्रों (1954 में रसायन विज्ञान और 1962 में शांति) में व्यक्तिगत रूप से नोबेल पुरस्कार मिला।
2015: सनत मेहता – भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, समाजवादी विचारक और राजनीतिज्ञ, जिन्होंने गुजरात के सार्वजनिक जीवन और सामाजिक आंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
2019: मोहम्मद ज़हूर ख़य्याम: संगीत जगत में ‘ख़य्याम’ नाम से मशहूर महान संगीतकार (‘कभी-कभी’, ‘उमराव जान’)।
2019: जगन्नाथ मिश्रा – बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री।
19 अगस्त के महत्त्वपूर्ण अवसर एवं उत्सव
आज वर्ल्ड फोटोग्राफी डे है: 200 साल पहले डामर की काली प्लेट पर ली गई थी दुनिया की पहली फोटो, तैयारी में लगे थे पूरे 6 साल और 8 घंटे में खींची गई थी तस्वीर
हर तस्वीर अपने आप में एक इतिहास गढ़ती है। दुनिया की सबसे पहली फोटो का भी अपना 200 साल पुराना इतिहास है। 1826 में पहली बार तस्वीर बनी लेकिन 13 साल बाद इसे फ्रांसीसी सरकार ने मान्यता दी और 19 अगस्त को इस दिन की शुरुआत हुई। पहली रंगीन तस्वीर का श्रेय स्कॉटलैंड के भौतिक शास्त्री क्लर्क मैक्सवेल के नाम है, जिन्होंने एक लाल फीते को कैप्चर किया था।

19 अगस्त 1826 में दुनिया की पहली दिखने वाली तस्वीर खींचने का श्रेय जाता है फ्रांस के जुझारू इनवेंटर जोसेफ नाइसफोर और उनके मित्र लुइस डॉगेर को, जिन्होंने अपनी आधी उम्र सिर्फ इसी काम के लिए समर्पित कर दी। इन दोनों की फोटो खींचने की इसी उपलब्धि को दुनिया ‘डॉगेरोटाइप’ प्रोसेस कहती है और इसे सम्मान देने के लिए वर्ल्ड फोटोग्राफी डे मनाए जाने का सिलसिला शुरू हुआ।
विश्व मानवतावादी दिवस

विश्व मानवतावादी दिवस (World Humanitarian Day) उन राहतकर्मियों और स्वयंसेवकों को समर्पित है, जो संकटग्रस्त और युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में लोगों की जान बचाने के लिए निस्वार्थ सेवा करते हैं। संयुक्त राष्ट्र (UN) द्वारा यह दिन 19 अगस्त 2003 को बगदाद में हुए बम धमाके में मारे गए संयुक्त राष्ट्र के दूत सर्जियो विएरा डी मेलो और उनके साथियों की याद में मनाया जाता है।
प्रस्तुति
हिमाचल न्यूज़ रिसर्च डेस्क
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Posted By: Himachal News
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