Shardiya Navratri 2026: 11 से 19 अक्टूबर तक शक्ति साधना का महापर्व, जानें कलश स्थापना मुहूर्त, नौ देवियों का स्वरूप और अखंड ज्योति के नियम
AI सारांश
- घटस्थापना (कलश स्थापना) का शुभ मुहूर्त
- प्रातः काल मुहूर्त: सुबह 6:19 बजे से सुबह 10:12 बजे तक
- अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:44 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक
Shardiya Navratri 2026: शरद ऋतु के आगमन के साथ ही प्रकृति में एक पावन और अलौकिक ऊर्जा का संचार होने लगता है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (11 अक्टूबर) से आरंभ होने वाला शारदीय नवरात्रि का महापर्व केवल नौ दिनों का अनुष्ठान नहीं, बल्कि अंतर्मन के अंधकार को मिटाकर दैवीय चेतना को जगाने का आध्यात्मिक उत्सव है। यह वही पावन कालखंड है जब त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने लंका विजय से पूर्व आदिशक्ति की कठोर आराधना कर विजयश्री का आशीर्वाद प्राप्त किया था। जब धरा पर मां दुर्गा का आगमन होता है, तो हर भक्त का हृदय असीम श्रद्धा, भक्ति और नवचेतना से भर उठता है।
नवरात्रि साधना, संयम और आत्मशुद्धि का वह मार्ग है जहां श्रद्धालु नौ दिनों तक उपवास और जप के माध्यम से अपने भीतर के काम, क्रोध, मोह और अहंकार रूपी राक्षसों का दलन करते हैं। कलश स्थापना से लेकर नवमी के हवन और कन्या पूजन तक, हर एक क्षण भक्त को पराशक्ति के सान्निध्य का अनुभव कराता है। यह महापर्व हमें यह प्रेरणा देता है कि जीवन में कितनी भी विकट बाधाएं क्यों न आएं, यदि मन में धर्म और सत्य का संकल्प दृढ़ हो तो मां भगवती हर परिस्थिति में हमारा मार्गदर्शन और उद्धार करती हैं।
नवरात्रि के इन नौ दिनों में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ नौ विशेष रंगों और भोगों का भी बड़ा महत्व माना गया है। आइए जानते हैं शारदीय नवरात्रि की तिथियों, घटस्थापना मुहूर्त, नौ दिनों के रंग और मां के स्वरूपों से जुड़ी संपूर्ण जानकारी।
Shardiya Navratri 2026: कलश स्थापना और शुभ मुहूर्त का विधान
नवरात्रि के पहले दिन आश्विन शुक्ल प्रतिपदा तिथि पर घटस्थापना की जाती है। कलश को ब्रह्मांड का प्रतीक और समस्त तीर्थों का निवास माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, आश्विन मास की प्रतिपदा तिथि के पावन समय पर मंदिरों और शक्तिपीठों में ब्रह्म मुहूर्त से ही देवी की प्रतिष्ठा का क्रम शुरू हो जाता है। घरों और पूजा पंडालों में शुभ लग्न और अभिजित मुहूर्त में कलश की स्थापना करना सर्वश्रेष्ठ फलदायी माना गया है। कलश के सम्मुख श्रद्धा भाव से संकल्प लेकर माता के प्रथम स्वरूप शैलपुत्री की आराधना से नौ दिवसीय आध्यात्मिक यात्रा का शुभारंभ होता है।
अखंड ज्योति: अंतर्मन से अंधकार मिटाने का महामंत्र
नवरात्रि की साधना में अखंड ज्योति का प्रज्वलन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह पावन ज्योति जीवन में ज्ञान, आशा और सकारात्मकता का प्रकाश फैलाती है। यदि गाय के शुद्ध घी का दीपक जलाया जाए तो उसे माता की प्रतिमा के दाईं ओर और यदि तिल अथवा सरसों के तेल का दीपक हो तो उसे बाईं ओर स्थापित करना चाहिए। दीपक को उड़द दाल, अक्षत या तिल के आसन पर रखा जाता है और इसकी लौ पूर्व या उत्तर दिशा में रखना श्रेयस्कर है। पूरे नौ दिनों तक इस ज्योति का अनवरत जलते रहना गृह में सुख, शांति और समृद्धि का कारक बनता है।
प्रथम दिन: मां शैलपुत्री की कृपा और पीला रंग
नवरात्रि पर्व का प्रथम दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप हिमालय राज की पुत्री मां शैलपुत्री को समर्पित है, जो स्थिरता और अडिग संकल्प की प्रतीक हैं। वृषभ पर सवार मां शैलपुत्री को गाय के दूध से बनी खीर, पंचामृत और शुद्ध घी के नैवेद्य का भोग लगाया जाता है। मां शैलपुत्री को समर्पित इस दिन पीला रंग पहनना बहुत शुभ माना जाता है। इस दिन पीले रंग के वस्त्र धारण करने से जीवन में सूर्य के समान ओज, तेज, उत्साह और सकारात्मक ऊर्जा का उदय होता है। इस दिन माता को गाय के घी या गाय के दूध से बनी मिठाइयों और खीर का भोग लगाया जाता है।
दूसरा दिन: मां ब्रह्मचारिणी की तपस्या और हरा रंग
दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है, जिनका जीवन घोर तप, त्याग और वैराग्य की प्रेरणा देता है। देवी को हरा रंग अत्यंत प्रिय है, जो प्रकृति, प्रगति और सद्भाव का द्योतक है। इस दिन हरा रंग पहनकर साधना की जाती है। हरे वस्त्र पहनकर देवी की आराधना करने से साधक के जीवन में धैर्य, विद्या और संयम का संचार होता है तथा कठिन से कठिन परिस्थितियों में अडिग रहने का आत्मबल मिलता है। मां ब्रह्मचारिणी को शक्कर और पंचामृत का भोग प्रिय है।
तीसरा दिन: मां चंद्रघंटा का तेज और स्लेटी रंग
तीसरे दिन मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र धारण करने वाली मां चंद्रघंटा की आराधना की जाती है। देवी का यह स्वरूप निर्भयता, साहस और पराक्रम का आशीर्वाद देता है। मां चंद्रघंटा की पूजा भूरे या ग्रे रंग के वस्त्र पहनकर की जाती है। इस दिन स्लेटी या भूरे रंग के परिधान पहनकर पूजा करने से तामसिक प्रवृत्तियों का शमन होता है और मन में बुराइयों से लड़ने का दृढ़ संकल्प जागृत होता है। मां चंद्रघंटा को दूध व उससे बनी चीजों का भोग लगाएं।
चौथा दिन: मां कूष्मांडा का मंद हास्य और नारंगी रंग
चौथे दिन अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना करने वाली मां कूष्मांडा की पूजा का विधान है। इन्हें ब्रह्मांडीय ऊर्जा और जीवन शक्ति की देवी माना जाता है। इस दिन नारंगी रंग के वस्त्र पहनकर माता की आराधना करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और प्रसन्नता आती है और साधक को उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु का वरदान मिलता है। माता को मालपुए का भोग अर्पित किया जाता है।
पांचवां दिन: मां स्कंदमाता का वात्सल्य और धवल श्वेत रंग
पांचवें दिन भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता मां स्कंदमाता की उपासना की जाती है। कमल के आसन पर विराजमान यह स्वरूप ममता, वात्सल्य और सुरक्षा का प्रतीक है। ज्ञान और मोक्ष की प्रदाताओं मां स्कंदमाता की पूजा में सफेद रंग का विशेष महत्व है। इस दिन श्वेत रंग के वस्त्र पहनकर साधना करने से चित्त शांत होता है, ध्यान गहरा होता है और साधक को आंतरिक शुद्धि की अनुभूति होती है। मां स्कंदमाता केले का भोग अति प्रिय है।
छठा दिन: मां कात्यायनी का महिषासुरमर्दिनी स्वरूप और लाल रंग
छठे दिन महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रकट हुई मां कात्यायनी की आराधना होती है, जिन्होंने महिषासुर का संहार कर धर्म की पुनर्स्थापना की थी। यह स्वरूप शौर्य और अन्याय पर धर्म की विजय का प्रतीक है। युद्ध की देवी और महिषासुर मर्दिनी मां कात्यायनी की पूजा लाल रंग के वस्त्र पहनकर की जाती है। इस दिन लाल रंग के वस्त्र धारण कर पूजा करने से आत्मविश्वास में अपार वृद्धि होती है और हर प्रकार के भय का नाश होता है। इन्हें शहद का भोग लगाया जाता है।
सातवां दिन: मां कालरात्रि का अभय वरदान और नीला रंग
सातवें दिन अंधकार और दुष्टों का संहार करने वाली मां कालरात्रि की पूजा की जाती है। यद्यपि इनका स्वरूप भयानक और श्याम वर्ण है, फिर भी वे भक्तों को सदैव अभय दान देने वाली शुभंकरी हैं। दुष्टों का नाश करने वाली मां कालरात्रि के स्वरूप को समर्पित इस दिन नीला रंग पहनना शुभ होता है। इस दिन नीले रंग के वस्त्र पहनकर साधना करने से नकारात्मक शक्तियां, ग्रह बाधाएं और भय सदा के लिए समाप्त हो जाते हैं। माता को गुड़ का भोग अर्पित किया जाता है।
आठवां दिन: मां महागौरी की सौम्यता और गुलाबी रंग
आठवें दिन कठोर तप से परम उज्ज्वल कांति प्राप्त करने वाली मां महागौरी की पूजा का विधान है। यह स्वरूप क्षमा, करुणा और पापों के प्रक्षालन का प्रतीक है। महाष्टमी के दिन महागौरी की पूजा गुमकी या गुलाबी रंग के वस्त्र पहनकर पूजा करने से पारिवारिक जीवन में प्रेम, सौहार्द और आत्मिक शांति का विस्तार होता है तथा जीवन के समस्त संताप दूर होते हैं। इस दिन माता को नारियल का भोग लगाया जाता है।
नौवां दिन: मां सिद्धिदात्री का पूर्णत्व और जामुनी रंग
महानवमी के पावन अवसर पर समस्त सिद्धियों की प्रदाता मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। भगवान शिव ने भी इन्हीं की कृपा से समस्त सिद्धियां और अर्धनारीश्वर स्वरूप प्राप्त किया था। महानवमी के दिन मां सिद्धिदात्री की आराधना जामुनी अथवा बैंगनी रंग के वस्त्र धारण कर आराधना करने से महत्वाकांक्षाओं को पूर्णता मिलती है और आध्यात्मिक उन्नति के द्वार खुलते हैं। इस दिन माता को हलवा, पूरी और चने का भोग अर्पित किया जाता है।
कन्या पूजन: नारी शक्ति के सम्मान का पावन संकल्प
नवरात्रि की यह दिव्य साधना कन्या पूजन के बिना अधूरी मानी जाती है। हमारे ऋषियों ने छोटी कन्याओं को साक्षात मां दुर्गा का रूप मानकर पूजने की जो परंपरा स्थापित की है, उसका मूल उद्देश्य समाज में नारी शक्ति के प्रति अगाध आदर का भाव जगाना है। जब तक समाज में बेटियों और महिलाओं की सुरक्षा व सम्मान सुनिश्चित नहीं होगा, तब तक कोई भी धार्मिक अनुष्ठान पूर्ण नहीं माना जा सकता। अतः इस महापर्व पर मां के चरणों में शीश नवाकर प्रत्येक स्त्री के प्रति सम्मान और संरक्षण का संकल्प लेना ही वास्तविक शक्ति पूजा है।
Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है। लेख में बताए गए उपाय, लाभ, सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। हिमाचल न्यूज़ इसकी पुष्टि नहीं करता है। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।
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