दैनिक पंचांग का महत्व एवं उसके पांच मुख्य अंग: जानिए तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण का संपूर्ण वैदिक विज्ञान
सनातन संस्कृति में किसी भी नए कार्य की शुरुआत, मांगलिक अनुष्ठान, व्यापार, विवाह, गृह प्रवेश अथवा यात्रा से पूर्व पंचांग (Panchang) देखने की समृद्ध परंपरा रही है। वैदिक काल-गणना का आधार ‘पंचांग’ मुख्य रूप से पांच मूलभूत अवयवों तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण से मिलकर बनता है। यह खगोलीय गणना किसी निश्चित समय और स्थान पर सूर्य, चंद्रमा व अन्य नवग्रहों की सटीक स्थिति को दर्शाती है।
पंचांग का प्रतिदिन प्रातः अध्ययन न केवल दिन की शुभता और दिशा तय करता है, बल्कि नकारात्मक ऊर्जा व अशुभ काल (जैसे राहुकाल और भद्रा) से बचते हुए सफलता के मार्ग को प्रशस्त करता है।
पंचांग (Panchang) के पांच प्रमुख अंग और उनकी खगोलीय व्याख्या
वैदिक ज्योतिष में काल को सूक्ष्मता से मापने के लिए पांच प्रमुख घटक निर्धारित किए गए हैं:
तिथि: सूर्य रेखांश से चंद्र रेखांश के 12 अंश (Degree) आगे बढ़ने की समयावधि को एक तिथि कहा जाता है। एक मास में कुल 30 तिथियां होती हैं, जो 15-15 दिनों के दो पक्षों (शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष) में विभाजित होती हैं। प्रतिपदा से आरंभ होकर चतुर्दशी तक दोनों पक्षों में समान नाम होते हैं; शुक्ल पक्ष का 15वां दिन पूर्णिमा और कृष्ण पक्ष का अंतिम दिन अमावस्या कहलाता है।
तिथि के नाम: प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्थदशी, अमावस्या/पूर्णिमा।
वार: वार का सीधा संबंध सौर दिवस से है। सप्ताह के सातों दिनों के नाम संबंधित अधिष्ठाता ग्रहों के आधार पर रखे गए हैं। रविवार (सूर्य), सोमवार (चंद्रमा), मंगलवार (मंगल), बुधवार (बुध), गुरुवार (बृहस्पति), शुक्रवार (शुक्र) और शनिवार (शनि)।
नक्षत्र: भचक्र (Zodiac) में तारों के समूह को नक्षत्र कहा जाता है। संपूर्ण क्रांतिवृत्त को 27 नक्षत्रों में बांटा गया है, जिनमें अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती शामिल हैं। प्रत्येक नक्षत्र का स्वामित्व किसी एक ग्रह के पास होता है।
योग: सूर्य और चंद्रमा की भोगांश दूरियों के योग (स्पष्ट जोड़) के आधार पर 27 योग बनते हैं। इनमें विष्कुम्भ, प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, अतिगण्ड, सुकर्मा, धृति, शूल, गण्ड, वृद्धि, ध्रुव, व्याघात, हर्षण, वज्र, सिद्धि, व्यातीपात, वरीयान, परिघ, शिव, सिद्ध, साध्य, शुभ, शुक्ल, ब्रह्म, इन्द्र और वैधृति शामिल हैं। इनमें से कुछ योग शुभ कार्यों के लिए अत्यंत प्रशस्त तो कुछ त्याज्य माने जाते हैं।
करण: एक तिथि के दो बराबर भागों को करण कहा जाता है (आधा भाग एक करण)। कुल 11 करण होते हैं, जिनमें 7 चर करण (बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज, विष्टि) और 4 स्थिर करण (शकुनि, चतुष्पाद, नाग, किस्तुघ्न) हैं। विष्टि करण को सामान्य बोलचाल में 'भद्रा' कहा जाता है, जिसमें कोई भी मांगलिक कार्य करना शास्त्रसम्मत रूप से वर्जित माना गया है।
शुक्ल पक्ष, कृष्ण पक्ष और काल-निर्धारण
चंद्रमा की गति के आधार पर मास दो पक्षों में विभक्त होता है। अमावस्या से पूर्णिमा तक का बढ़ता हुआ प्रकाशमान पखवाड़ा शुक्ल पक्ष कहलाता है। इसके विपरीत पूर्णिमा से अमावस्या तक का घटता हुआ अंधकारमय पखवाड़ा कृष्ण पक्ष कहलाता है। प्रत्येक पक्ष में 15 तिथियां होती हैं।
शुभ मुहूर्त बनाम राहुकाल: कब करें और कब टालें कार्य
शुभ मुहूर्त (शुभ घड़ी): वह कालखंड जब ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति अनुकूल परिणाम देने वाली होती है। इस समय शुरू किया गया कार्य बिना विघ्न के संपन्न होता है। इस समय में कार्यारंभ करने से लक्ष्यों को हासिल करने में सफलता मिलती है और काम में लगने वाली अड़चने दूर होती हैं। आजकल शुभ मुहूर्त को शुभघड़ी भी कहा जाता है।
राहुकाल: प्रत्येक दिन का लगभग 90 मिनट (डेढ़ घंटे) का वह समय, जो स्थानीय सूर्योदय और वार के अनुसार निर्धारित होता है। ज्योतिष शास्त्र में राहुकाल को अशुभ माना गया है, अतः इस अवधि में नए उपक्रम, लेन-देन या मांगलिक कार्य आरंभ करने से बचना चाहिए।
जानिए किस वार को कब होता है राहुकाल
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वार |
राहुकाल का समय |
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सोमवार |
सुबह 07: 30 से 09:00 बजे तक। |
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मंगलवार |
दोपहर 03 से 04 : 30 बजे तक। |
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बुधवार |
दोपहर 12 से 01 : 30 बजे तक। |
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बृहस्पतिवार |
दोपहर 01 : 30 से 03 बजे तक। |
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शुक्रवार |
सुबह 10 : 30 से 12:00 बजे तक। |
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शनिवार |
सुबह 09 बजे से 10 : 30 बजे तक। |
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रविवार |
शाम 04 : 30 से 06:00 बजे तक। |
अस्वीकरण (Disclaimer): अलग-अलग स्थानों और पंचांगों के अनुसार तिथियों एवं समय में अंतर हो सकता है। पाठकों से अनुरोध है कि किसी भी धार्मिक अनुष्ठान से पहले स्थानीय पंचांग या विद्वान की सलाह अवश्य लें।
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