18 July in History: ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार वर्ष का 199वां दिन (लीप वर्ष में 200वां दिन) है। साल में अभी और 166 दिन शेष हैं। भारत और विश्व इतिहास में 18 जुलाई का खास महत्व है, क्योंकि इस दिन कई महत्वपूर्ण घटनाएं घटी जो इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज होकर रह गईं हैं।
आज का इतिहास में जानिए आज के दिन जन्मे चर्चित व्यक्ति, प्रसिद्ध व्यक्तियों के निधन, युद्ध संधि, किसी देश की आजादी, नई तकनिकी का अविष्कार, सत्ता का बदलना, महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दिवस के बारे में। आईए हिमाचल न्यूज़ में पढ़ें भारत और विश्व इतिहास के पन्नों में दर्ज 18 जुलाई का इतिहास एवं घटनाक्रम।
1947: सौदेबाजी से गुलामी, और गुलामी से बंटवारा… 18 जुलाई का वो दिन जब भारत की आजादी पर लगी कानूनी मुहर
यह कहानी है दुनिया के सबसे बड़े औपनिवेशिक साम्राज्य के ढहने और दो नए मुल्कों के जन्म की। आज ही के दिन, यानी 18 जुलाई 1947 को ब्रिटिश पार्लियामेंट ने ‘इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट’ पर अंतिम मुहर लगाई थी। इस ऐतिहासिक कानून के पास होने के ठीक 28 दिन बाद, 15 अगस्त 1947 को भारत की गुलामी की जंजीरें टूट गईं, लेकिन इसके साथ ही देश को विभाजन का एक गहरा जख्म भी मिला।
कहानी की शुरुआत सदियों पहले हुई थी, जब कुछ अंग्रेज व्यापारी तराजू लेकर हिंदुस्तान की धरती पर उतरे थे। लेकिन समय चक्र बदला, मुगल सल्तनत कमजोर हुई और इन चालाक सौदागरों ने फूट डालो और राज करो की नीति से सत्ता हथिया ली।
1857 में जब मंगल पांडे और झांसी की रानी जैसे शूरवीरों ने पहली क्रांति का बिगुल फूंका, तो अंग्रेजों ने उसे बेहद क्रूरता से कुचल दिया। इस विद्रोह के बाद भारत की कमान सीधे ब्रिटिश क्राउन (लंदन) के हाथों में चली गई। लेकिन आजादी की यह चिंगारी बुझी नहीं थी, जो 1900 के दशक में आते-आते एक धधकते अंगारे में तब्दील हो गई।
जब महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से लौटे, तो उन्होंने देश को ‘अहिंसा और सत्याग्रह’ का एक नया हथियार दिया। देखते ही देखते कांग्रेस देश की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बन गई और ब्रिटिश हुकूमत बैकफुट पर आने लगी।
रही-सही कसर दूसरे विश्व युद्ध ने पूरी कर दी। इस युद्ध ने भले ही ब्रिटेन को जिता दिया, लेकिन उसकी आर्थिक और सैन्य कमर पूरी तरह तोड़ दी। अब ब्रिटेन के लिए इतने बड़े और विद्रोही भारत पर नियंत्रण रखना नामुमकिन हो चुका था।
20 फरवरी 1947 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने एक सनसनीखेज एलान किया कि वे भारत को आजाद कर देंगे। इस मिशन को अंजाम देने के लिए लॉर्ड माउंटबेटन को आखिरी वायसराय बनाकर भारत भेजा गया।
माउंटबेटन ने आते ही दिमागी बिसात बिछानी शुरू की। माउंटबेटन ने पहले एक गुप्त योजना बनाई, जिसे भारतीय नेताओं ने सिरे से खारिज कर दिया। इसके बाद ‘थ्री जून प्लान’ सामने आया। इस प्लान ने साफ कर दिया कि भारत को आजादी तो मिलेगी, लेकिन देश के दो टुकड़े होंगे और एक नया मुल्क ‘पाकिस्तान’ वजूद में आएगा। इस योजना ने भारत की 500 से ज्यादा रियासतों को यह खुली छूट दे दी कि वे चाहें तो भारत में मिलें या पाकिस्तान में।
इस पूरे ब्लूप्रिंट को 3 जुलाई 1947 को ब्रिटिश संसद में ‘द इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट’ के नाम से पेश किया गया। बहस और प्रक्रियाओं के बाद आज के दिन यानि 18 जुलाई 1947 को ब्रिटिश पार्लियामेंट ने इस कानून को अंतिम रूप से पास कर दिया।
इसी ऐतिहासिक दस्तावेज ने भारत की आजादी के रास्ते पर कानूनी मुहर लगाई। इसके ठीक 28 दिन बाद, 14 अगस्त को पाकिस्तान ने खुद को एक अलग मुल्क घोषित किया और 15 अगस्त 1947 की आधी रात को भारत ने ‘शताब्दियों की गुलामी’ को अलविदा कहकर आजादी की एक नई सुबह में कदम रखा।
‘माइन काम्फ’: जेल की कोठरी से निकला वो नफरत का दस्तावेज, जिसने दुनिया को महाविनाश की आग में झोंक दिया!
आज का दिन इतिहास में एक ऐसी किताब के प्रकाशन के रूप में दर्ज है, जिसने आगे चलकर करोड़ों इंसानों की किस्मत और दुनिया का नक्शा बदल दिया। साल 1025 में आज ही के दिन नाजी तानाशाह एडोल्फ हिटलर की आत्मकथा ‘माइन काम्फ’ (Mein Kampf यानी मेरा संघर्ष) का पहला संस्करण प्रकाशित हुआ था। शुरुआती साल में इस किताब की महज 9,473 प्रतियां बिकी थीं और किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि जेल की काल कोठरी में लिखी गई यह इबारत एक दिन दूसरे विश्व युद्ध और यहूदियों के नरसंहार की पटकथा बनेगी।
बात 1923 की है। हिटलर ने म्यूनिख के एक बीयर हॉल से बगावत फूंकते हुए सरकार का तख्तापलट करने की नाकाम कोशिश की थी। इस बगावत को कुचल दिया गया और हिटलर को देशद्रोह के आरोप में 5 साल की सजा सुनाकर म्यूनिख की लैंड्सबर्ग जेल में डाल दिया गया।
सलाखों के पीछे बैठे इस सनकी सैनिक के पास विचारों का गुबार था। उसने अपनी नफरत को पन्नों पर उतारना शुरू किया। उसने बोलकर यह किताब अपने साथी रुडोल्फ हेस से लिखवाई थी।
इस आत्मकथा के पहले संस्करण का नाम ‘अ रेकनिंग’ (एक हिसाब-किताब) रखा गया था। इस किताब में हिटलर ने अपने उन नस्लीय और यहूदी विरोधी विचारों को खुलकर दुनिया के सामने रखा, जो बाद में नाजीवाद का आधार बने। हिटलर का मानना था कि जर्मन (आर्य) दुनिया की सबसे श्रेष्ठ नस्ल हैं और यहूदी उनके बीच एक परजीवी की तरह हैं, जो जर्मनी को विश्व शक्ति बनने से रोक रहे हैं।
उसने पहले विश्व युद्ध में जर्मनी को मिली करारी हार का ठीकरा दूसरों पर फोड़ा और देश की जनता के भीतर बदले की आग को भड़काया।
जेल से रिहा होने के बाद हिटलर ने नए सिरे से अपनी जमीन तैयार की। हालांकि 1932 के राष्ट्रपति चुनाव में उसे शिकस्त झेलनी पड़ी, लेकिन चालबाजियों के दम पर अगले ही साल यानी 1933 में वह जर्मनी का चांसलर बनने में कामयाब रहा। चांसलर बनते ही उसकी क्रूर तानाशाही दुनिया के सामने आ गई। उसने विपक्ष को कुचला, कम्युनिस्ट पार्टी को अवैध घोषित किया और यहूदियों के कत्लेआम का ब्लूप्रिंट लागू कर दिया।
सत्ता पर काबिज होते ही जो किताब धूल फांक रही थी, वह अचानक जर्मनी की सबसे बड़ी ‘बेस्टसेलर’ बन गई। इस किताब को नाजी विचारधारा की पवित्र पुस्तक घोषित कर दिया गया। हर सरकारी अधिकारी के घर में इसकी एक प्रति होना अनिवार्य था।
हिटलर चाहता था कि जर्मनी का बच्चा-बच्चा उसकी इस नफरत की घुट्टी को पिए। इसलिए उसने सरकारी अफसरों को सख्त आदेश दिया कि वे देश में होने वाली हर नई शादी का रिकॉर्ड रखें और नवविवाहित जोड़ों को शादी के तोहफे के रूप में ‘माइन काम्फ’ की एक कॉपी सरकारी खर्च पर भेंट करें।
इस तरह सरकारी मशीनरी और डर के दम पर इस किताब की लाखों प्रतियां बांटी गईं, जिसने अंततः समूचे जर्मनी का ब्रेनवॉश कर उसे विनाश के रास्ते पर धकेल दिया।
1968: इंटेल कॉर्पोरेशन की शुरुआत
‘फेयरचाइल्ड’ की बगावत से ‘इंटेल’ के सम्राज्य तक: दो इंजीनियरों की वो जिद, जिसने बदल दी दुनिया की रफ्तार!
आज आप और हम जिस डिजिटल युग में जी रहे हैं, उसकी असली बुनियाद आज ही के दिन रखी गई थी। आज ही के दिन, यानी 18 जुलाई 1968 को दो अमेरिकी इंजीनियरों—रॉबर्ट नोयस और गॉर्डन मूर ने मिलकर ‘इंटेल कॉर्पोरेशन’ की स्थापना की थी। यह महज़ एक कंपनी की शुरुआत नहीं थी, बल्कि कंप्यूटर क्रांति और सिलिकॉन वैली के उस सुनहरे दौर का आगाज़ था जिसने पूरी दुनिया की तकनीक को अपनी मुट्ठी में कर लिया।
इंटेल की शुरुआत की कहानी किसी थ्रिलर से कम नहीं है। रॉबर्ट नोयस और गॉर्डन मूर दोनों ही अपने ज़माने के दिग्गज इंजीनियर थे। 1957 में वे ‘फेयरचाइल्ड सेमीकंडक्टर्स’ नाम की एक बेहद मशहूर कंपनी के संस्थापक सदस्यों में शामिल थे। यह कंपनी सेमीकंडक्टर बनाने के मामले में दमदार नाम कमा रही थी, लेकिन यहीं से एक बड़ी उलझन शुरू हुई।
दरअसल, फेयरचाइल्ड का मुख्य कारोबार कैमरे और अन्य उपकरण बनाना था। कंपनी सेमीकंडक्टर बेचकर मुनाफा तो मोटा कमा रही थी, लेकिन इस क्षेत्र में रिसर्च और नई खोज पर पैसा खर्च करने से कतरा रही थी। नोयस और मूर को समझ आ गया था कि भविष्य सेमीकंडक्टर का ही है, और इस घुटन के बीच दोनों ने एक बड़ा जोखिम लेने का फैसला किया।
अपनी पुरानी सफल नौकरी को लात मारकर दोनों ने एक नई शुरुआत की। उन्होंने ठाना कि वे एक ऐसी कंपनी बनाएंगे जो सिर्फ और सिर्फ सेमीकंडक्टर सर्किट के भविष्य को गढ़ेगी। इस तरह जन्म हुआ ‘इंटेल कॉर्पोरेशन’ का।
कंपनी की नींव रखने के ठीक बाद, 1 अगस्त से महज़ एक दर्जन चुनिंदा और जुनूनी इंजीनियरों की टीम के साथ इंटेल ने अपना कामकाज शुरू किया। रॉबर्ट नोयस ने आगे चलकर इंटीग्रेटेड सर्किट (IC) के विकास में अहम भूमिका निभाई, जबकि गॉर्डन मूर ने वह प्रसिद्ध ‘मूर का नियम’ दिया, जिसने भविष्यवाणी की थी कि हर दो साल में माइक्रोचिप पर ट्रांजिस्टर की संख्या दोगुनी हो जाएगी।
शुरुआत भले ही एक छोटे से दफ्तर और 12 इंजीनियरों से हुई थी, लेकिन आज इंटेल को सेमीकंडक्टर मार्केट का ‘ग्लोबल किंग’ कहा जाता है। आपके हाथ में मौजूद स्मार्टफोन से लेकर, सुपर कंप्यूटर, लैपटॉप, डेटा सेंटर्स और लगभग हर आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस के भीतर इंटेल का बनाया हुआ सेमीकंडक्टर सर्किट धड़कता है। दो इंजीनियरों की एक छोटी सी जिद ने आज पूरी दुनिया को सुपरफास्ट और डिजिटल बना दिया है।
देश-विदेश में 18 जुलाई को इन घटनाओं के लिए भी याद किया जाता है
1743: साप्ताहिक अखबार न्यूयार्क में दुनिया में पहली बार आधे पृष्ठ का विज्ञापन प्रकाशित किया गया। इस से पहले, अख़बारों और पत्रिकाओं में विज्ञापन बहुत छोटे आकार के हुआ करते थे। आधे पृष्ठ के इस बड़े विज्ञापन ने विज्ञापन की दुनिया में एक बड़ा बदलाव लाया।
1781: ब्रिटेन के विख्यात खगोल शास्त्री विलियम हरशल ने आकाश गंगा की वास्तविकता का पता लगाया।
1825: उरुग्वे ब्राजील से अलग हुआ।
1857: 1957: बॉम्बे यूनिवर्सिटी की स्थापना हुई।
1872: ब्रिटेन में चुनाव में गुप्त मतदान अधिनियम आया। इससे पहले मतदान खुले तौर पर किए जाते थे।
1914: गांधी जी ने भारत लौटने के इरादे से दक्षिण अफ्रीका छोड़ा।
1918: दक्षिण अफ्रीका के ‘मदीबा’ पुकारे जाने वाले नेल्सन मंडेला का जन्म हुआ।
1931: दुनिया का पहला वातानुकूलित (एयर-कंडीशंड) पानी का जहाज ‘मरिपोसा’ आज के दिन लॉन्च किया गया था।
1951: उरुग्वे ने संविधान स्वीकार किया।
1955: पहली बार परमाणु ऊर्जा से उत्पादित बिजली को व्यावसायिक रूप से बेचा गया।
1973: अफ़ग़ानिस्तान में राजशाही की समाप्ति एवं गणराज्य की स्थापना।
1976: ओलिंपिक खेलों में पहली बार किसी जिम्नास्ट को परफेक्ट-10 स्कोर मिला। रोमानिया की जिम्नास्ट नादिया कोमानेसी को 10 में से 10 अंक दिए गए।
1977: वियतनाम संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बना।
1980: पूर्ण रूप से भारत में निर्मित उपग्रह ‘रोहिणी-1’ पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया गया।
1984: बेवर्ली बर्न्स ने पीपल एक्सप्रेस एयरलाइंस की उड़ान के दौरान बोइंग 747 की कप्तानी करने वाली पहली महिला बनकर इतिहास रच दिया। इसके बाद उन्हें “क्वीन ऑफ द स्काईज़” (आकाश की रानी) के नाम से भी जाना जाने लगा।
1994: ब्राजील ने चौथी बार विश्व कप फ़ुटबाल चैंपियनशिप जीती।
2002: डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम भारत के 11वें राष्ट्रपति चुने गए। उन्होंने 18 जुलाई 2002 को हुए चुनाव में भारी बहुमत (90% से अधिक) से जीत हासिल की थी और 25 जुलाई 2002 को अपना पदभार संभाला था।
2003: वाई. वेणुगोपाल रेड्डी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के नये गर्वनर बने।
2005: भारत के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु सहयोग पर संयुक्त घोषणा जारी की, जिसने बाद के परमाणु समझौते की नींव रखी।
2008: भारतीय मूल के सलमान रुश्दी ने प्रमोशन टूर के दौरान 57 मिनट में एक हज़ार पुस्तकों पर हस्ताक्षर करने का रिकार्ड बनाया।
2012: किम जोंग उन को आधिकारिक तौर पर उत्तर कोरिया का सर्वोच्च नेता नियुक्त किया गया और उन्हें कोरियाई पीपुल्स आर्मी में मार्शल का पद दिया गया।
2019: जापान के क्योटो एनीमेशन स्टूडियो में आगज़नी की घटना में 36 लोगों की मृत्यु हुई।
2020: भारत में पहली बार एक ही दिन में 38,000 से अधिक नए कोरोना संक्रमितों की पुष्टि हुई थी, जो उस समय तक का सबसे बड़ा दैनिक आंकड़ा था। इसके साथ ही देश में कुल संक्रमितों की संख्या 10 लाख पार कर चुकी थी।
2024: न्यूयॉर्क के सोथबी ऑक्शन हाउस में एक प्राचीन डायनासोर का कंकाल रिकॉर्ड 44.6 मिलियन डॉलर (करीब 373 करोड़ रुपये) में नीलाम हुआ। यह इतिहास की सबसे महंगी जीवाश्म नीलामी थी।
18 जुलाई को जन्मे प्रमुख व्यक्ति (Born on 18 July)
1861: कादम्बिनी गांगुली – भारत की पहली महिला स्नातक और पहली महिला फ़िजीशियन।
1918: नेल्सन मंडेला– नोबेल पुरस्कार सम्मानित दक्षिण अफ़्रीका के भूतपूर्व राष्ट्रपति।
1921: जॉन ग्लैन- अमेरिका के प्रसिद्ध अंतरिक्ष यात्री, जो पृथ्वी की कक्षा की परिक्रमा करने वाले पहले अमेरिकी बने और बाद में देश के सीनेटर भी रहे।
1922: टॉमस कून – विज्ञान के अमेरिकी दार्शनिक।
1927: मेहदी हसन – प्रसिद्ध ग़ज़ल गायक।
1931: भावानम वेंकटरामी रेड्डी – आं:ध्र प्रदेश के आठवें मुख्यमंत्री थे।
1935: जयेन्द्र सरस्वती – कांची मठ के 69वें शंकराचार्य (कामकोटि पीठ, कांचीपुरम, तमिलनाडु के शंकराचार्य थे)।
1946: राजेश जोशी – समकालीन हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कवि, लेखक और पत्रकार, जिन्हें उनके उत्कृष्ट साहित्यिक योगदान के लिए ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ से नवाजा जा चुका है।
1982: प्रियंका चोपड़ा – भारतीय बॉलीवुड-हॉलीवुड अभिनेत्री एवं मिस वर्ल्ड।
1996: स्मृति मंधाना – भारतीय महिला क्रिकेट टीम की स्टार बल्लेबाज और उप-कप्तान, जिन्हें दुनिया की सबसे बेहतरीन महिला क्रिकेटरों में गिना जाता है।
1971: सुखविंदर सिंह- बॉलीवुड के विख्यात पार्श्व गायक जिन्होंने ‘छैया छैया’ और ऑस्कर विजेता गीत ‘जय हो’ को अपनी बुलंद आवाज दी है।
1975: माथान्गी अरुल्प्रगास्म (एम.आई.ए.) – अंग्रेज गायिका-गीतकार, रैपर, रिकॉर्ड निर्माता, दृश्य कलाकार, कार्यकर्ता, फोटोग्राफर, फैशन डिजाइनर।
18 जुलाई को हुए प्रमुख निधन (Died on 18 July)
1948: पीरू सिंह – भारतीय सेना के वीर अमर शहीद।
1998: अब्दुल हमीद कैसर – भारत के प्रसिद्ध क्रांतिकारी।
1999: जॉन एडवर्ड “एड” लॉन्ग जूनियर– विश्व विमानन इतिहास में सर्वाधिक घंटे तक विमान उड़ाने का रिकॉर्ड बनाने वाले।
2012: राजेश खन्ना – हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता, भारत के पहले सुपर स्टार।
2013: तिरुचिरापल्ली श्रीनिवासन रंगराजन- तमिल सिनेमा में ‘वाली’ नाम से प्रसिद्ध, दिग्गज कवि, गीतकार और अभिनेता।
2016: मुबारक बेगम – हिन्दी फ़िल्मों की प्रसिद्ध पार्श्व गायिका।
2017: अजित शंकर चौधरी – सुप्रसिद्ध भारतीय कवि, संस्मरणकार, कहानीकार, उपन्यासकार तथा सहृदय समीक्षक थे।
2022: भूपेंद्र सिंह– भारत के प्रसिद्ध पार्श्व गायक और गजल सम्राट।
2023: ओमन चांडी– केरल के दो मुख्यमंत्री रह चुके कांग्रेस के वरिष्ठ राजनेता।
18 जुलाई के महत्त्वपूर्ण अवसर एवं उत्सव
नेल्सन मंडेला अंतरराष्ट्रीय दिवस
नेल्सन मंडेला अंतरराष्ट्रीय दिवस (Nelson Mandela International Day) हर साल 18 जुलाई को मनाया जाता है। यह दिन दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति और रंगभेद के खिलाफ लड़ने वाले महान नेता, नेल्सन मंडेला के जन्मदिन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इसे संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2009 में आधिकारिक तौर पर घोषित किया गया था। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, यह दिन नेल्सन मंडेला के शांति, मानवाधिकार, आपसी मेलजोल और समाज सेवा के मूल्यों को सम्मान देने के लिए मनाया जाता है। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में नस्लीय भेदभाव (रंगभेद) को खत्म करने के लिए 27 साल जेल में बिताए थे।
इस दिन लोगों से 67 मिनट निकालकर दूसरों की भलाई और समाज सेवा करने का आग्रह किया जाता है। यह 67 मिनट इसलिए चुने गए हैं क्योंकि नेल्सन मंडेला ने अपने जीवन के 67 वर्ष सार्वजनिक सेवा, मानवाधिकारों की रक्षा और रंगभेद के खिलाफ संघर्ष में बिताए थे। कोई भी व्यक्ति अपने आसपास के लोगों की मदद करके, पेड़ लगाकर, या किसी जरूरतमंद को खाना खिलाकर इस दिन को सार्थक बना सकता है।
वर्ल्ड लिसनिंग डे
वर्ल्ड लिसनिंग डे (World Listening Day) हर साल 18 जुलाई को मनाया जाता है। यह दिन प्रकृति की आवाजों, पर्यावरण और हमारे आसपास की ध्वनियों को ध्यान से सुनने और समझने के प्रति जागरूक करने के लिए समर्पित है।वर्ल्ड लिसनिंग डे का इतिहासइसकी शुरुआत साल 2010 में वर्ल्ड लिसनिंग प्रोजेक्ट द्वारा की गई थी। 18 जुलाई की तारीख को इसलिए चुना गया क्योंकि यह कनाडा के प्रसिद्ध संगीतकार, लेखक और पर्यावरणविद् आर. मरे शेफर का जन्मदिन है। शेफर को ध्वनिक पारिस्थितिकी आंदोलन के संस्थापकों में से एक माना जाता है।
तमिलनाडु दिवस
तमिलनाडु दिवस (Tamil Nadu Day) हर साल 18 जुलाई को मनाया जाता है। यह दिन 1967 में तत्कालीन मुख्यमंत्री सी.एन. अन्नादुरई के नेतृत्व वाली विधानसभा में मद्रास राज्य का आधिकारिक नाम बदलकर ‘तमिलनाडु’ करने के प्रस्ताव को पारित करने की ऐतिहासिक घटना की याद दिलाता है। 1 नवंबर 1956 को भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के दौरान ‘मद्रास राज्य’ का गठन हुआ था।
एक नवंबर, 1956 को देश में राज्यों का भाषाई आधार पर पुनर्गठन किया गया था जिसके बाद आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल के कुछ हिस्सों को तत्कालीन मद्रास राज्य से ‘निकाल’ अलग कर दिया गया था। फिर 8 जुलाई 1967 को मद्रास विधानसभा में एक सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित करके राज्य का नाम बदलकर ‘तमिलनाडु’ (जिसका अर्थ है “तमिलों की भूमि”) करने की मांग की गई थी। पहले 1 नवंबर को ‘तमिलनाडु दिवस’ मनाया जाता था। बाद में राज्य सरकार ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की कि वास्तविक भाषाई और सांस्कृतिक गौरव के क्षण को चिह्नित करने के लिए इसे हर साल 18 जुलाई को मनाया जाएगा।
प्रस्तुति
हिमाचल न्यूज़ रिसर्च डेस्क
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Posted By: Himachal News
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