सिर्फ एक जंगली सब्जी नहीं, हिमाचल की महिलाओं के स्वावलंबन की कहानी है ‘लुंगडु‘
स्वाद और सेहत के खजाने से लेकर बाजारों की रौनक तक… जानिए कैसे एक जंगली फर्न बदल रहा है ग्रामीण आर्थिकी की तस्वीर।

15 मई 2026
पहाड़ों में जब सर्दियां विदा लेती हैं और बर्फ पिघलने के बाद धरती फिर से हरी चादर ओढ़ती है, तब धौलाधार और पीर पंजाल की नम और छायादार घाटियों में एक जादुई हलचल शुरू होती है। यह हलचल है ‘लुंगडु’ के अंकुरित होने की।
हिमाचल प्रदेश की पारंपरिक थाली का यह सबसे अहम हिस्सा सिर्फ एक मौसमी सब्जी भर नहीं है। यह प्रकृति का वह ‘हरा सोना’ है, जो बिना किसी खाद-पानी या खेती के उगता है और पहाड़ की मेहनतकश महिलाओं की आजीविका का एक मजबूत सहारा बन जाता है।
जंगल से मंडी तक: भोर की पहली किरण के साथ शुरू होता है संघर्ष
कांगड़ा, मंडी, कुल्लू, चंबा और शिमला के ग्रामीण इलाकों में अप्रैल से लेकर सितंबर तक का समय ‘लुंगडु के सीजन’ के रूप में जाना जाता है। सुबह की पहली किरण फूटने से पहले ही, जब घाटियों में गहरी धुंध छाई होती है, ग्रामीण महिलाओं की टोलियां अपनी पीठ पर ‘किल्टा’ लादे जंगलों और खड्डों के किनारे निकल पड़ती हैं।
दुर्गम रास्तों, कांटों और जंगली जानवरों के खतरे के बीच, नम मिट्टी में उगे इन घुमावदार, कोमल तनों को खोजना और तोड़ना एक बेहद श्रमसाध्य काम है। एक ग्रामीण महिला के शब्दों में, “यह कोई आसान काम नहीं है। फिसलने का डर रहता है, लेकिन जब किल्टा भर जाता है, तो लगता है कि बच्चों की स्कूल की फीस और घर के राशन का इंतजाम हो गया।”
जंगल से टूटकर ये लुंगडु सीधे स्थानीय बाजारों और सब्जी मंडियों तक पहुंचते हैं। सीजन की शुरुआत में बाजार में इसकी कीमत 80 से 120 रुपये प्रति किलो तक होती है। बिना किसी लागत के, सिर्फ मेहनत के बलबूते यह जंगली पौधा इन महिलाओं के हाथों में नकद आय सौंपता है, जो उन्हें आर्थिक रूप से स्वतंत्र और सशक्त बनाता है।
औषधीय गुणों का पावरहाउस
विज्ञान की भाषा में बात करें तो जिसे स्थानीय लोग ‘लुंगडु’, ‘लिंगड़’ या ‘खसरोड़’ कहते हैं, वह न्यूट्रिशन का एक पावरहाउस है। आयुर्वेद और आधुनिक पोषण विज्ञान, दोनों ही इसके गुणों का लोहा मानते हैं। यह विटामिन-ए, विटामिन-बी कॉम्प्लेक्स, आयरन, पोटेशियम और फोलिक एसिड से भरपूर है। इसमें मौजूद उच्च फाइबर पाचन तंत्र को दुरुस्त रखता है, जबकि एंटीऑक्सीडेंट्स शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं।

क्यों खास है यह ‘जंगली उपहार‘?
आज जब हर सब्जी में कीटनाशकों का जहर घुला है, लुंगडु शत प्रतिशत प्राकृतिक और ऑर्गेनिक है। इसे उगाने के लिए किसी यूरिया या केमिकल की जरूरत नहीं पड़ती। यह शुद्ध हिमालयी मिट्टी और बारिश के पानी से पलता है।
स्वाद ऐसा कि भूल न पाएं
हिमाचली घरों में लुंगडु का पकना किसी छोटे-मोटे उत्सव से कम नहीं होता। हालांकि, इसे पकाना भी एक कला है। इसके तनों पर बारीक भूरे रंग के रेशे होते हैं, जिन्हें सूती कपड़े से रगड़ कर साफ करना पड़ता है। फिर इसे उबाला जाता है ताकि इसकी हल्की कड़वाहट निकल जाए। सरसों के तेल में मेथी, धनिया और लाल मिर्च का तड़का लगाकर बनी लुंगडु की सूखी सब्जी का सोंधापन लाजवाब होता है। इसके अलावा, कई जगहों पर इसे दही के साथ ‘खट्टा’ बनाकर परोसा जाता है। लुंगडु का खट्टा-मीठा अचार तो इतना मशहूर है कि प्रदेश से बाहर रहने वाले हिमाचली और पर्यटक इसे डिब्बों में भरकर अपने साथ ले जाते हैं। यह अचार महीनों तक खराब नहीं होता और पूरे साल पहाड़ों की याद दिलाता रहता है।
चुनौतियां और संरक्षण की दरकार
इस खूबसूरत कहानी का एक दूसरा पहलू भी है, जो चिंताजनक है। बढ़ती मांग के कारण कई बार इसका अवैज्ञानिक तरीके से दोहन हो रहा है। कुछ लोग इसे जड़ से उखाड़ लेते हैं, जिससे अगले साल इसके उगने की संभावना खत्म हो जाती है। इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन और गर्मियों में जंगलों में लगने वाली आग भी इस प्राकृतिक संपदा के लिए बड़ा खतरा बन गई है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि, “लुंगडु हमारी जैव विविधता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। हमें महिलाओं और स्थानीय लोगों को इसके टिकाऊ दोहन के प्रति जागरूक करना होगा, ताकि वे इसे ऐसे तोड़ें कि पौधे को नुकसान न हो।”
ब्रांड बनने की है राह पर लुंगडु
आज जब दुनिया भर में ‘फॉरेज्ड फूड’ (जंगलों से चुना गया प्राकृतिक भोजन) को फाइव-स्टार होटलों में महंगी डिश के तौर पर परोसा जा रहा है, तो हिमाचल के लुंगडु को भी उसकी सही पहचान मिलनी चाहिए। इसे फूड प्रोसेसिंग के जरिए एक ब्रांड बनाया जा सकता है। सरकार और संस्थाओं को चाहिए कि वे इन ग्रामीण महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों को बाजार से जोड़ें, ताकि बिचौलियों के बजाय सीधा मुनाफा इन महिलाओं को मिले।

लुंगडु केवल एक जंगली पौधा नहीं है। यह पहाड़ के लोगों की जीवटता, प्रकृति के प्रति उनके प्रेम और स्वावलंबन का प्रतीक है। जब तक हिमालय की ये खड्डें नम रहेंगी, धौलाधार का यह ‘हरा सोना‘ हिमाचल की कहानी कहता रहेगा।
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