16 July in History: ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार 16 जुलाई वर्ष का 197वां (लीप वर्ष में यह 198वां) दिन है। साल में अभी 168 दिन शेष हैं। भारत और विश्व इतिहास में 16 जुलाई का खास महत्व है, क्योंकि इस दिन कई महत्वपूर्ण घटनाएं घटी जो इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज होकर रह गईं हैं।
आज का इतिहास में जानिए आज के दिन जन्मे चर्चित व्यक्ति, प्रसिद्ध व्यक्तियों के निधन, युद्ध संधि, किसी देश की आजादी, नई तकनिकी का अविष्कार, सत्ता का बदलना, महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दिवस के बारे में। आईए हिमाचल न्यूज़ में पढ़ें भारत और विश्व इतिहास के पन्नों में दर्ज 16 जुलाई का इतिहास एवं घटनाक्रम।
16 जुलाई की प्रमुख घटनाएं (What Happened on 16 July in History)
1939: ब्रिटानिया हुकूमत की दमनकारी नीतियों के खिलाफ धामी से फूंका गया था आज़ादी का बिगुल
भारत की आज़ादी के आंदोलन में शिमला के धामी गोलीकांड का भी अहम स्थान है। ब्रिटानिया हुकूमत की दमनकारी नीतियों के खिलाफ धामी के लोगों ने आंदोलन का जो बिगुल फूंका था। उसकी गूंज समूचे भारत में सुनाई दी थी। 16 जुलाई 1939 को धामी में प्रजामंडल के कार्यकर्ताओं ने तत्कालीन रियासत के राजा के खि़लाफ़ आज़ादी की जंग का आगाज़ कर दिया था। शिमला से भागमल सोहटा और पंडित सीताराम शर्मा के नेतृत्व में हजारों लोगों ने राजमहल के बाहर विरोध प्रदर्शन किया था। भीड़ बेकाबू हो गई व पथराव शुरू हो गया। छुट्टियां व मौसमी आयोजन
ऐसा कहा जाता है कि बेकाबू भीड़ पर राजा के सिपाहियों ने लाठीचार्ज कर दिया और गोलियां दागना शुरू कर दी। गोलीबारी में दो लोगों की मौके पर ही मौत हो गई। जबकि दो अन्य लोगों ने उपचार के लिए ले जाते वक्त रास्ते में ही दम तोड़ दिया। धामी गोलीकांड से पूरे देश में असंतोष फैल गया।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने पंजाब के मशहूर वकील दुनी चंद की अध्यक्षता में गोलीकांड की जांच के लिए एक समिति का गठन किया। लेकिन राजा धामी व अंग्रेज सरकार ने मिलकर प्रजामंडल के कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां, उनके सामान की कुर्की और देश निकाला जैसे आदेश पारित कर आंदोलन को कुचलने की कोशिश की। पर्यटकों के घूमने-फ़िरने की जगहें
जिससे लोगों में राजा के खि़लाफ़ ओर अधिक आक्रोश बढ़ गया। राजा धामी ने ब्रिटिश आर्मी की एक टुकड़ी को मंगवाकर आंदोलनकारियों के घरों को सील करवा दिया। बाबजूद इसके आज़ादी के परवानों के हौंसले को नहीं तोड़ पाए थे। आखि़रकार 15 अगस्त 1947 को भारत गुलामी की बेड़ियों से मुक्त हुआ। आज जब भी स्वतंत्रता संग्राम का ज़िक्र आता है तो धामी गोली कांड को भी याद किया जाता है।
1966: जब इंसान ने रची अंतरिक्ष में महाक्रांति, चांद पर पहला कदम रखने वाले व्यक्ति बने नील आर्मस्ट्रांग
यह कहानी 1950 के दशक की है, जब ठंडी जंग की तपिश धरती से ऊपर उठकर अंतरिक्ष के सन्नाटे को चीर रही थी। दुनिया की दो सबसे बड़ी महाशक्तियां अमेरिका और सोवियत संघ एक-दूसरे को पटखनी देने के लिए आसमान की सीमाएं लांघने को बेताब थीं।
सोवियत संघ ने अपने ‘लूना मिशन’ के जरिए शुरुआती बढ़त बना ली थी। जनवरी 1966 में जब उनके ‘लूना-9’ ने पहली बार चांद की पथरीली छाती को छुआ, तो वॉशिंगटन में खलबली मच गई। उधर, अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी पहले ही एक ऐतिहासिक हुंकार भर चुके थे, “60 का दशक खत्म होने से पहले अमेरिका इंसान को चांद पर उतारेगा!”
कैनेडी के इस सपने को हकीकत में बदलने की जिम्मेदारी ‘नासा’ (NASA) के कंधों पर थी। वैज्ञानिकों ने रात-दिन एक कर दिए। कड़े इम्तिहानों के बाद तीन जांबाज चुने गए नील आर्मस्ट्रांग, बज एल्ड्रिन और माइकल कॉलिंस।
मंजिल करीब थी, लेकिन रास्ता कांटों भरा था। 1966 में पहले मानवरहित परीक्षण के बाद, 1967 में ‘कैनेडी स्पेस सेंटर’ एक खौफनाक हादसे से दहल उठा। लॉन्च पैड पर लगी भीषण आग ने तीन अमेरिकी अंतरिक्ष यात्रियों की जान ले ली। पूरा देश सदमे में था, लेकिन नासा ने हार नहीं मानी। उनका इरादा फौलादी था।
तारीख 16 जुलाई, 1969। समय सुबह के ठीक 9 बजकर 32 मिनट। फ्लोरिडा का आसमान सैटर्न-5 रॉकेट की गड़गड़ाहट से कांप उठा। अपोलो-11 अंतरिक्ष यात्रियों को लेकर अनंत ब्रह्मांड की ओर बढ़ चला। टीवी स्क्रीन पर नजरें गड़ाए बैठे करोड़ों लोगों की सांसें थमी हुई थीं।
करीब 76 घंटों के सफर में 2,40,000 किलोमीटर की दूरी नापकर, 19 जुलाई को यह यान चांद की कक्षा में दाखिल हुआ। अगले ही दिन, आर्मस्ट्रांग और एल्ड्रिन ‘ईगल मॉड्यूल’ नामक लैंडर में सवार होकर मुख्य यान से अलग हुए और चांद की ओर गोता लगा दिया।
लैंडिंग के अंतिम क्षण बेहद सांस रोक देने वाले थे। कंप्यूटर लगातार अलार्म बजा रहा था, नीचे चट्टानें थीं और यान में ईंधन केवल 30 सेकेंड का बचा था। जरा सी चूक और मौत निश्चित थी!
लेकिन आर्मस्ट्रांग के हाथों ने कमाल कर दिखाया। 20 जुलाई की शाम 4 बजकर 17 मिनट पर सन्नाटे को चीरती हुई आवाज गूंजी: “ह्यूस्टन, यहाँ ट्रैनक्विलिटी बेस है। ईगल लैंड कर चुका है!”
कंट्रोल रूम में तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी। चांद की धूल पर पहला कदम रखते ही आर्मस्ट्रांग ने वे शब्द कहे जो अमर हो गए, “एक इंसान के लिए यह भले ही एक छोटा कदम है, लेकिन संपूर्ण मानव जाति के लिए यह एक बहुत बड़ी छलांग है।”
कुछ ही देर बाद बज एल्ड्रिन भी उनके साथ शामिल हो गए। दोनों ने चांद की बंजर जमीं पर ढाई घंटे बिताए, अमेरिकी ध्वज फहराया, तस्वीरें लीं, वहां की मिट्टी के नमूने बटोरे और 24 जुलाई को सुरक्षित धरती पर लौट आए।
इस मिशन ने साबित कर दिया कि जब इंसान कुछ ठान ले, तो कायनात की कोई भी सीमा उसे बांध नहीं सकती। अंतरिक्ष की इसी दीवानगी ने आने वाली पीढ़ियों को ऐसा रास्ता दिखाया कि आज जेफ बेजोस जैसे दिग्गज उद्यमी भी अंतरिक्ष पर्यटन के नए क्षितिज तलाश रहे हैं।
1945: वो खुफिया मिशन जिसने दुनिया को ‘परमाणु युग’ में धकेल दिया
साल 1942 के दौर में जब दूसरा विश्व युद्ध अपने चरम पर था, तब परदों के पीछे एक ऐसा गुप्त खेल चल रहा था जिसने पूरी इंसानियत का भविष्य हमेशा के लिए बदल दिया। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को डर था कि एडॉल्फ हिटलर की नाजी सेना गुपचुप तरीके से एक बेहद विनाशकारी परमाणु हथियार तैयार कर रही है। इसी खौफ के बीच, 28 अक्टूबर 1942 को अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट ने एक ऐसे गुप्त मिशन को हरी झंडी दिखाई, जिसका नाम इतिहास में दर्ज होना था—’मैनहट्टन प्रोजेक्ट’।
इस महापरियोजना के लिए अमेरिका ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। देश-विदेश के 6,000 से भी ज्यादा चोटी के वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और सैन्य अधिकारियों की एक जांबाज टीम तैयार की गई।
इस पूरे प्रोजेक्ट की कमान सौंपी गई विलक्षण प्रतिभा के धनी भौतिक विज्ञानी जे. रॉबर्ट ओपनहाइमर को, जिन्हें आज दुनिया ‘फादर ऑफ एटॉमिक बम’ के नाम से जानती है। लॉस एलामोस की गुप्त प्रयोगशालाओं में दिन-रात की कड़ी मेहनत और वैज्ञानिक प्रयोगों के बाद आखिरकार टीम ने प्लूटोनियम पर आधारित एक महाविनाशकारी बम तैयार कर लिया। इस पहले परमाणु बम को गुप्त कोड नाम दिया गया—’गैजेट’ (Gadget)।
अब सबसे बड़ी चुनौती थी इस महाविनाशक का परीक्षण करना। वैज्ञानिकों को एक ऐसी जगह की तलाश थी जहां विस्फोट का असर न्यूनतम हो और धमाके से निकलने वाली खतरनाक रेडियोएक्टिव किरणें इंसानी बस्तियों को नुकसान न पहुंचाएं।
काफी खोजबीन के बाद लॉस एलामोस से करीब 210 मील दूर अलामोगोर्डो के एक सुनसान, बंजर और रेतीले इलाके को चुना गया। इस परीक्षण को नाम दिया गया ‘ट्रिनिटी टेस्ट’।
बम को लटकाने के लिए रेगिस्तान के बीचों-बीच एक विशालकाय स्टील का टावर खड़ा किया गया। वैज्ञानिकों और सैन्य अधिकारियों को इस भयानक धमाके से बचाने के लिए सुरक्षित दूरी पर मजबूत बंकर बनाए गए। किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए सेना को हाई-अलर्ट पर रखा गया।
12 जुलाई से ही बम के संवेदनशील हिस्सों को कड़ी सुरक्षा के बीच सैन्य वाहनों से टेस्ट साइट पर लाया जाने लगा। आखिरकार, 15 जुलाई 1945 तक इस घातक बम को पूरी तरह असेंबल करके टावर के ऊपर स्थापित कर दिया गया।
अगले ही दिन, 16 जुलाई 1945 की सुबह ठीक 5:30 बजे इंसानी इतिहास का सबसे भयानक धमाका हुआ। काउंटडाउन खत्म होते ही रेगिस्तान की खामोशी एक ऐसे अंधाधुंध प्रकाश में बदल गई, जिसने कई सूर्यों की चमक को भी फीका कर दिया।
इस धमाके की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि, धमाके वाली जगह पर 300 मीटर चौड़ा और गहरा गड्ढा बन गया। रेत पल भर में पिघलकर हरे रंग के शीशे (ट्रिनिटाइट) में बदल गई। विस्फोट से लगभग 21 किलोटन टीएनटी के बराबर ऊर्जा पैदा हुई।
यह परीक्षण विज्ञान और अमेरिका के लिए एक अभूतपूर्व कामयाबी थी। इस धमाके ने दुनिया को एक नए ‘एटॉमिक युग’ में धकेल दिया था। लेकिन इस कामयाबी का जो भयावह चेहरा आने वाला था, उसकी कल्पना शायद खुद ओपनहाइमर ने भी नहीं की थी।
ठीक एक महीने बाद, अगस्त 1945 में अमेरिका ने इसी तकनीक से बने दो परमाणु बम जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराए। पलक झपकते ही लाखों जिंदगियां राख के ढेर में बदल गईं। विज्ञान की इस सबसे बड़ी खोज ने मानवता को तबाही का वो जख्म दिया, जिसकी कसक आज भी दुनिया महसूस करती है।
साभार: दैनिक भास्कर
देश-विदेश में 16 जुलाई को इन घटनाओं के लिए भी याद किया जाता है
622 ईस्वी: इस्लामी युग या हिजरी संवत की शुरूआत और उसी दिन से पैगम्बर मुहम्मद ने मक्का से मदीना की यात्रा शुरू की।
1439: इंग्लैंड में बीमारी फैलने के डर से चुंबन पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
1661: स्वीडिश बैंक ने यूरोप में पहला नोट जारी किया।
1790: अमेरिकी कांग्रेस ने कोलंबिया की स्थापना की।
1856: हिंदू विधवाओं के पुनर्विवाह को कानूनी मान्यता मिली।
1890: पार्किंसस नामक एक डॉक्टर ने पार्किंसस बीमारी और उसके अस्तित्व में आने की प्रक्रिया के बारे में अपनी जॉच पूरी की। उन्हीं के नाम पर बीमारी का नाम पार्किन्सन्स रखा गया।
1926: नेशनल जियोग्राफिक ने पहली बार समुद्र के भीतर के दृश्यों का प्राकृतिक रंगीन फोटों निकाली।
1929: भारत में कृषि अनुसंधान और शिक्षा के सर्वोच्च संस्थान ‘इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च’ (ICAR) की स्थापना आज ही के दिन की गई थी।
1935: अमेरिका के ओक्लाहोमा सिटी में पहला ऑटोमैटिक पार्किंग मीटर लगा।
1942: फ्रांस की राजधानी पेरिस में पुलिस ने 13,152 यहूदियों को गिरफ्तार किया।
1950: चौथे फुटबॉल विश्व कप के फाइनल में ब्राजील को हरा उरुगवे चैंपियन बना।
1951: नेपाल में 104 साल पुराने निरंकुश राणा शासन का अंत हुआ और देश में पहली बार लोकतंत्र की शुरुआत हुई।
1965: फ्रांस और इटली को जोड़ने वाली 12 किलोमीटर लंबी सुरंग की औपचारिक शुरुआत हुई।
1970: इराक में संविधान लागू हुआ।
1979: सद्दाम हुसैन इराक के राष्ट्रपति बने। इस पद पर लगातार 24 साल तक काबिज रहे।
1990: फिलीपींस के लूज़ोन द्वीप पर आए 7.7 तीव्रता के भूकंप में 1,000 से अधिक लोग मारे गए।
1991: यूक्रेन ने अपना पहला स्वतंत्रता दिवस मनाया।
2006: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कोरिया पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव पारित।
2015: नासा के वैज्ञानिकों ने न्यू होराइजन्स अंतरिक्ष यान ने प्लूटो के पास से उड़ान भरते हुए इतिहास की पहली क्लोज़-अप तस्वीरें लीं। इसने वैज्ञानिकों को पहली बार इस दूरस्थ बौने ग्रह के ऊंचे बर्फीले पहाड़ों और जमी हुई नाइट्रोजन के विशाल मैदानों को स्पष्ट रूप से देखने का मौका दिया।
2018: जुपिटर ग्रह के 12 नए चांद खोजे गए, इसके बाद जुपिटर के कुल चांद की संख्या 79 हो गई।
2020: भारत में कोरोना मामलों का नया रिकॉर्ड- देश में पहली बार एक ही दिन में संक्रमण के रिकॉर्ड 32,000 से अधिक नए मामले दर्ज किए गए थे, जिससे देश में कुल संक्रमितों का आंकड़ा लगभग 9.7 लाख के पार पहुंच गया था।
16 जुलाई को जन्मे प्रमुख व्यक्ति (Born on 16 July)
1896: ट्रीगवी ली – प्रसिद्ध मजदूर नेता, राजकीय अधिकारी, नॉर्वीयन राजनीतिज्ञ तथा जानेमाने लेखक थे।
1909: अरुणा आसफ़ अली – ‘भारतीय स्वतंत्रता संग्राम’ में योगदान देने वाली प्रमुख महिलाओं में से एक।
1917: जगदीशचन्द्र माथुर – प्रसिद्ध नाटककार।
1968: धनराज पिल्लै – भारतीय हॉकी टीम के पूर्व कप्तान। इस समय वे भारतीय हॉकी टीम के प्रबंधक हैं।
1984: कटरीना कैफ – बालीवुड अभिनेत्री।
16 जुलाई को हुए प्रमुख निधन (Died on 16 July)
2005: के. वी. सुबन्ना– प्रसिद्ध कन्नड़ नाटककार।
2017: नर बहादुर भंडारी- सिक्किम के पूर्व मुख्यमंत्री।
2020: कांजीवरम श्रीरंगचारी- भारत के महानतम और पद्म भूषण से सम्मानित गणितज्ञ
2021: सुरेखा सीकरी- भारतीय सिनेमा, रंगमंच और टेलीविजन की दिग्गज व तीन बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार विजेता अभिनेत्री (जिन्हें ‘बालिका वधू’ धारावाहिक में ‘दादी सा’ के किरदार के लिए अपार लोकप्रियता मिली)।
16 जुलाई के महत्त्वपूर्ण अवसर एवं उत्सव (Important events and festivities of 16 July)
विश्व सर्प दिवस
विश्व सर्प दिवस (World Snake Day) हर साल 16 जुलाई को मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य लोगों को सांपों के पर्यावरण में उनकी भूमिका के बारे में जागरूक करना और इन जीवों के प्रति फैली गलत धारणाओं और डर को दूर करना है।
प्रस्तुति
हिमाचल न्यूज़ रिसर्च डेस्क
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Posted By: Himachal News
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