15 July in History: ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार 15 जुलाई वर्ष का 196वां (लीप वर्ष में यह 197वां) दिन है। साल में अभी 169 दिन शेष हैं। भारत और विश्व इतिहास में 15 जुलाई का खास महत्व है, क्योंकि इस दिन कई महत्वपूर्ण घटनाएं घटी जो इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज होकर रह गईं हैं।
आज का इतिहास में जानिए आज के दिन जन्मे चर्चित व्यक्ति, प्रसिद्ध व्यक्तियों के निधन, युद्ध संधि, किसी देश की आजादी, नई तकनिकी का अविष्कार, सत्ता का बदलना, महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दिवस के बारे में। आईए हिमाचल न्यूज़ में पढ़ें भारत और विश्व इतिहास के पन्नों में दर्ज 15 जुलाई का इतिहास एवं घटनाक्रम।
15 जुलाई की प्रमुख घटनाएं (What Happened on 15 July in History)
1979: जब ढह गई देश की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार, मोरारजी देसाई को छोड़ना पड़ा था पीएम पद
भारतीय राजनीतिक इतिहास में 14 जुलाई 1979 का दिन एक बड़े सत्ता परिवर्तन का गवाह बना था। आज ही के दिन देश की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार के मुखिया मोरारजी देसाई को आंतरिक कलह और बगावत के कारण प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। आपातकाल (इमरजेंसी) के खिलाफ एकजुट हुए विभिन्न विचारधाराओं के नेताओं की यह महत्वाकांक्षी राजनीतिक लहर महज 28 महीनों में ही शांत हो गई।
मार्च 1977 में जब देश से आपातकाल हटाया गया, तो तत्कालीन कांग्रेस सरकार के खिलाफ जनता में भारी आक्रोश था। इस दौरान विपक्षी दलों, संघ और समाजवादियों ने एकजुट होकर ‘जनता पार्टी’ का गठन किया, जिसके मार्गदर्शक जयप्रकाश नारायण (जेपी) थे। जेपी ने पहले ही किसी भी सरकारी पद को न लेने का संकल्प किया था। चुनावों में कांग्रेस विरोधी ऐसी लहर चली कि इंदिरा गांधी स्वयं 55 हजार से अधिक मतों से पराजित हो गईं और उनके पुत्र संजय गांधी भी अपनी सीट नहीं बचा सके। कांग्रेस महज 189 सीटों पर सिमट गई, जबकि जनता पार्टी ने 345 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत हासिल किया।
ऐतिहासिक जीत के बाद सरकार की कमान संभालने के लिए तीन प्रमुख चेहरे मोरारजी देसाई, जगजीवन राम और चौधरी चरण सिंह दावेदार थे। काफी राजनीतिक विमर्श के बाद मोरारजी देसाई के नाम पर सहमति बनी, जो इससे पहले 1964 और 1967 में भी पीएम बनते-बनते रह गए थे। 23 मार्च 1977 को उन्होंने देश के चौथे प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। अन्य दोनों वरिष्ठ नेताओं को संतुष्ट करने के लिए गृह और रक्षा जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी सौंपी गई।
विरोधी विचारधाराओं के मेल से बनी इस सरकार में कुछ ही महीनों के भीतर मतभेद उभरने लगे। मई 1977 में बिहार के बेलछी में हुए दलित नरसंहार ने विपक्ष में बैठी इंदिरा गांधी को वापसी का बड़ा अवसर दे दिया। वे दुर्गम रास्तों को पार करने के लिए हाथी पर सवार होकर पीड़ितों से मिलने पहुंचीं, जिसकी देश भर में व्यापक चर्चा हुई। इसके बाद, शाह आयोग की रिपोर्ट के आधार पर तत्कालीन गृह मंत्री के आदेश पर इंदिरा गांधी को गिरफ्तार कर लिया गया, हालांकि कहा जाता है कि पीएम मोरारजी देसाई इस जल्दबाजी से पूरी तरह सहमत नहीं थे।
वर्ष 1978 में इंदिरा गांधी कर्नाटक की चिकमगलूर सीट से उपचुनाव जीतकर दोबारा संसद पहुंच गईं, जिससे सरकार पर दबाव और बढ़ गया। इधर जनता पार्टी के भीतर की खींचतान इतनी बढ़ गई कि पीएम मोरारजी देसाई ने गृह मंत्री चौधरी चरण सिंह और स्वास्थ्य मंत्री राज नारायण को कैबिनेट से बर्खास्त कर दिया। इसके जवाब में चौधरी चरण सिंह ने दिल्ली में एक विशाल किसान रैली कर अपनी राजनीतिक ताकत का अहसास कराया, जिसके चलते सरकार को उन्हें वापस कैबिनेट में शामिल करना पड़ा।
इस राजनीतिक संतुलन को बनाए रखने के लिए देश में पहली बार एक साथ दो उपप्रधानमंत्री (चौधरी चरण सिंह और बाबू जगजीवन राम) बनाए गए। इसके बावजूद दरारें कम नहीं हुईं। जुलाई 1979 के मानसून सत्र में सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया। चौधरी चरण सिंह ने बगावत करते हुए अपने खेमे के सांसदों के साथ समर्थन वापस ले लिया।
परिणामस्वरूप, 14 जुलाई 1979 को मोरारजी देसाई ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद 28 जुलाई 1979 को कांग्रेस के बाहरी समर्थन से चौधरी चरण सिंह देश के अगले प्रधानमंत्री बने, लेकिन यह व्यवस्था भी लंबी नहीं चली और अंततः जनवरी 1980 के आम चुनावों में इंदिरा गांधी भारी बहुमत के साथ दोबारा सत्ता में लौट आईं।
1916: दुनिया की सबसे बड़ी एयरोस्पेस कंपनी बोइंग की शुरुआत, एक लकड़ी व्यापारी ने रखी थी नींव, प्रथम विश्व युद्ध से लेकर अंतरिक्ष तक का सफर
आज ही के दिन यानी 15 जुलाई 1916 को वैश्विक विमानन इतिहास के एक बड़े अध्याय की शुरुआत हुई थी। अमेरिकी लकड़ी व्यापारी (टिंबर मर्चेंट) विलियम बोइंग ने आज के दिन दुनिया की सबसे बड़ी एयरोस्पेस कंपनी ‘बोइंग’ की स्थापना की थी। विलियम को हवाई जहाज बनाने का विचार वर्ष 1909 में एक विमान प्रदर्शनी देखने के दौरान आया था।
विलियम बोइंग एक बेहद समृद्ध व्यापारी थे। विमानन क्षेत्र में कदम रखने से पहले, वर्ष 1915 में उन्होंने लॉस एंजिल्स के एक फ्लाइंग स्कूल से बाकायदा विमान उड़ाने और उसकी तकनीक की ट्रेनिंग ली। इसके बाद उन्होंने लकड़ी की नावें बनाने वाली एक फैक्ट्री खरीदी, जो आगे चलकर हवाई जहाज बनाने वाले बड़े कारखाने में तब्दील हो गई।
वर्ष 1917 में इस उद्यम का नाम बदलकर ‘बोइंग एयरप्लेन कंपनी’ कर दिया गया। इसी दौरान शुरू हुए प्रथम विश्व युद्ध ने कंपनी के भाग्य को बदल दिया। बोइंग ने अमेरिकी सेना के लिए बड़े पैमाने पर सैन्य विमान तैयार करने शुरू किए। अमेरिकी नौसेना के अधिकारी कॉनरेड वेस्टरवेल्ट के सहयोग से कंपनी ने अपना पहला सिंगल इंजन वाला विमान ‘बी एंड डब्ल्यू’ (B&W) विकसित किया था।
सैन्य विमानों के बाद कंपनी ने व्यावसायिक (कॉमर्शियल) विमानन क्षेत्र में कदम रखा और कई छोटी एयरलाइंस को खरीद लिया। वर्ष 1931 में इन चार एयरलाइंस को आपस में मिलाकर ‘यूनाइटेड एयरलाइंस’ की स्थापना की गई। हालांकि, वर्ष 1934 में अमेरिका के एक नए कानून के चलते एकाधिकार को रोकने के लिए बोइंग को खुद को चार अलग-अलग स्वतंत्र कंपनियों में विभाजित करना पड़ा।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बोइंग के लड़ाकू विमानों की मांग बहुत अधिक बढ़ गई, जिससे कंपनी को भारी मुनाफा हुआ। युद्ध समाप्त होने के बाद जब सैन्य विमानों की मांग घटी, तो बोइंग ने अपना पूरा ध्यान कॉमर्शियल उड़ानों पर लगा दिया। वर्ष 1958 में बाजार में उतरे ‘बोइंग 707’ विमान ने व्यावसायिक विमानन जगत में कंपनी की बादशाहत कायम कर दी। इसके बाद वर्ष 1960 में कंपनी ने अंतरिक्ष क्षेत्र में प्रवेश किया और अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) के लिए पहला लूनर ऑर्बिटर तैयार किया।
आज बोइंग विमानन और अंतरिक्ष तकनीक में दुनिया की अग्रणी कंपनी है, जो लगातार नए प्रयोगों के जरिए भविष्य के हवाई और अंतरिक्ष सफर को सुगम बना रही है।
साभार: दैनिक भास्कर
1857: इतिहास के पन्नों में दफन कानपुर का वो प्रतिशोध, जब जलियांवाला से भी भयानक रक्तपात से लाल हुई थी गंगा
साल 1857 का भारतीय विद्रोह केवल एक सैन्य तख्तापलट नहीं था, बल्कि दशकों से सुलग रहे जन-आक्रोश का ज्वालामुखी था। इस महासंग्राम में उत्तर प्रदेश का कानपुर (तब का काउंनपोर) एक ऐसा केंद्र बना, जिसकी गूंज लंदन की संसद तक सुनाई दी। नाना साहेब पेशवा के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश सेना को व्हीलर एंट्रेंचमेंट (ब्रिटिश छावनी) में हफ्तों तक भूखे-प्यासे रहने पर मजबूर कर दिया था।
लंबी घेराबंदी के बाद, दोनों पक्षों के बीच एक समझौता हुआ। नाना साहेब ने ब्रिटिश नागरिकों और बची हुई सेना को सुरक्षित इलाहाबाद (अब प्रयागराज) भेजने का वादा किया। 27 जून 1857 की सुबह, जब लगभग 400 अंग्रेज सतीचौरा घाट पर नावों में बैठ रहे थे, तभी अचानक गोलियां चल पड़ीं। पुरुष मार दिए गए, लेकिन करीब 120 (कुछ ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार 200 के करीब) ब्रिटिश महिलाओं और मासूम बच्चों को बंदी बनाकर ‘बीबीगढ़’ नामक एक छोटे भवन में रख दिया गया।
जैसे ही यह खबर फैली कि जनरल हैवलॉक के नेतृत्व में एक विशाल अंग्रेजी सेना प्रतिशोध लेने कानपुर की तरफ बढ़ रही है, क्रांतिकारियों में खलबली मच गई।
15 जुलाई 1857 की काली रात को, सबूत मिटाने या रणनीतिक दबाव बनाने के उद्देश्य से, उन बेगुनाह महिलाओं और बच्चों को बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया गया। अगली सुबह, उनके क्षत-विक्षत शवों को पास के ही एक गहरे कुएं (जिसे बाद में ‘मेमोरियल वेल’ या कंपनी बाग का कुआं कहा गया) में डाल दिया गया। इतिहास में इस घटना को ‘बीबीगढ़ नरसंहार’ के नाम से जाना जाता है।
जब ब्रिटिश फौज कानपुर पहुंची और उन्होंने उस कुएं का मंजर देखा, तो वे पागल हो उठे। इसके बाद अंग्रेजों ने प्रतिशोध की जो स्क्रिप्ट लिखी, वह रूह कंपा देने वाली थी। ब्रिटिश सैनिकों ने कसम खाई कि वे हर एक अंग्रेज की मौत के बदले एक हजार भारतीयों को मारेंगे।
इतिहासकार अमारी मूरहाऊस और थॉमस लोव के दस्तावेजों के मुताबिक, जनरल नील और उनकी सेना ने पूरे कानपुर और उसके आसपास के गांवों को श्मशान बना दिया। जो भी सामने आया—चाहे वह विद्रोही सैनिक हो, आम किसान, निर्दोष महिलाएं या बूढ़े—सबको मौत के घाट उतार दिया गया।
पकड़े गए विद्रोही सैनिकों और नागरिकों को फांसी देने से पहले जबरन सतीचौरा घाट और बीबीगढ़ के खून से सने फर्श को जीभ से चाटने पर मजबूर किया गया। कइयों को सूअर की खाल में सिलकर जिंदा जला दिया गया।
कानपुर से लेकर फतेहपुर के बीच कोई ऐसा पेड़ नहीं बचा था, जिस पर पांच से दस भारतीयों की लाशें न लटकी हों। हजारों निर्दोष ग्रामीणों को बिना किसी मुकदमे के तोपों के मुंह पर बांधकर उड़ा दिया गया।
आंकड़ों के अनुसार, इस प्रतिशोध में अंग्रेजों ने 20,000 से अधिक भारतीयों को मौत के घाट उतारा था, जो संख्या के मामले में 1919 के जलियांवाला बाग नरसंहार से कई गुना बड़ी और क्रूर थी। लेकिन, चूंकि इतिहास विजेताओं द्वारा लिखा गया, इसलिए ब्रिटिश इतिहासकारों ने बीबीगढ़ के कुएं को तो एक महान त्रासदी के रूप में पेश किया, पर उसके बाद हुए भारतीयों के इस भीषण नरसंहार को पन्नों से गायब कर दिया।
उस दौर के ब्रिटिश कलाकारों द्वारा बनाई गई दो ऐतिहासिक पेंटिंग्स आज भी उस भयावह कालखंड की मूक गवाह हैं।
पहली पेंटिंग (कत्लेआम का खौफ): इसमें ब्रिटिश सेना के उस अमानवीय प्रतिशोध को दिखाया गया है, जहां भारतीय नागरिकों और सिपाहियों को तोपों के मुहाने पर बांधा जा रहा है और चारों तरफ चीख-पुकार मची है।

दूसरी पेंटिंग (कंपनी बाग का कुआं): इसमें बीबीगढ़ के उस ऐतिहासिक और उदास कुएं को दर्शाया गया है, जिसके चारों ओर बाद में अंग्रेजों ने एक स्मारक (मेमोरियल स्क्रीन और एंजेल ऑफ पीस की मूर्ति) बनवाया था। यह चित्र उस खामोश दर्द को बयां करता है, जिसने 1857 की क्रांति के रुख को हमेशा के लिए बदल दिया था।

1948: पटियाला एंड ईस्ट पंजाब स्टेट्स यूनियन को मिला राज्य का दर्जा
पटियाला एंड ईस्ट पंजाब स्टेट्स यूनियन (PEPSU) स्वतंत्र भारत के शुरुआती दौर में पंजाब के भौगोलिक और प्रशासनिक पुनर्गठन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है। देश की स्वतंत्रता के बाद रियासतों के विलय की कड़ी में, 15 जुलाई 1948 को भारत के तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने विधिवत रूप से इस नए राज्य का उद्घाटन किया। प्रशासनिक तौर पर इस राज्य ने 20 अगस्त 1948 से कार्य करना प्रारंभ किया।
यह संघ पूर्वी पंजाब की 8 प्रमुख रियासतों को मिलाकर किया गया था, जिसमें पटियाला (सबसे बड़ी रियासत), नाभा, जींद, कपूरथला, फरीदकोट, मलेरकोटला, कलसिया और नालागढ़ शामिल थीं। पटियाला शहर को इस नए राज्य की राजधानी बनाया गया। लगभग 26,208 वर्ग किलोमीटर में फैले पेप्सू की आबादी 1951 की जनगणना के अनुसार करीब 34.9 लाख थी।
प्रशासनिक व्यवस्था के तहत पटियाला के तत्कालीन महाराजा यादवेंद्र सिंह को राज्य का ‘राजप्रमुख’ (राज्यपाल के समकक्ष) और कपूरथला के महाराजा जगजीत सिंह को उप-राजप्रमुख नियुक्त किया गया। ज्ञान सिंह राड़ेवाला ने इसके पहले मुख्यमंत्री (कार्यकारी) के रूप में शपथ ली। वर्ष 1952 के पहले आम चुनावों के बाद राड़ेवाला के नेतृत्व में यहाँ देश की पहली गैर-कांग्रेसी गठबंधन सरकार बनी। हालांकि, राजनीतिक उठापटक के कारण 1953 में यहाँ राष्ट्रपति शासन भी लगाना पड़ा था।
पेप्सू राज्य का अस्तित्व लगभग आठ वर्षों तक रहा। राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के आधार पर, 1 नवंबर 1956 को पेप्सू का पूरी तरह से पड़ोसी राज्य पंजाब में विलय कर दिया गया। आगे चलकर 1966 में जब पंजाब का भाषाई विभाजन हुआ, तो पेप्सू का नालागढ़ क्षेत्र हिमाचल प्रदेश में और जींद जैसे हिस्से हरियाणा में शामिल हो गए।
देश-विदेश में 15 जुलाई को इन घटनाओं के लिए भी याद किया जाता है
1795: ‘ला मारसेइलेसी’ को फ्रांस का राष्ट्रीय गान घोषित किया गया।
1864: अमेरिका में कैदियों से भरी हुई एक यात्री ट्रेन एक कोयला ट्रेन से टकरा गयी जिससे उसमें सवार 955 में से 65 लोग मारे गये और 109 घायल हो गये।
1904: अमेरिका के लॉस एंजिल्स में पहला बौद्ध मंदिर बना।
1910: एमिल क्रेपलिन ने एलॉइस अल्जाइमर के नाम पर अल्जाइमर बीमारी का नाम दिया।
1923: इटली की संसद ने नया संविधान स्वीकार किया।
1926: बॉम्बे (अब मुम्बई) में पहली मोटरबस सेवा की शुरुआत हुई।
1927: वियना नरसंहार- ऑस्ट्रियाई पुलिस ने 89 प्रदर्शनकारियों की हत्या की।
1948: अमेरिका के राष्ट्रपति हैरी एस टूमैन दूसरे कार्यकाल के लिए निर्वाचित हुए।
1955: भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को भारत रत्न दिया गया।
1955: अठारह नोबेल विजेताओं ने परमाणु हथियारों के इस्तेमाल के खिलाफ मेनौ घोषणा पर हस्ताक्षर किए।
1961: स्पेन ने पुरुषों और महिलाओं के लिए समान अधिकारों को स्वीकार किया।
1962: अल्जीरिया अरब लीग का हिस्सा बना।
1970: डेनमार्क ने इटली को 2-0 से हराकर पहला महिला विश्व कप फुटबॉल जीता।
1984: पंजाब को आतंकवाद प्रभावित क्षेत्र घोषित किया गया।
1986: महिला क्रिकेटर संध्या अग्रवाल ने टेस्ट क्रिकेट में 190 रन बनाकर विश्व रिकॉर्ड बनाया।
2000: सिएरा लियोन में सैन्य कार्यवाही द्वारा सभी भारतीय सैनिक बंधक मुक्त किए।
2002: मिसाइल मैन एपीजे अब्दुल कलाम भारत के 11वें राष्ट्रपति बने।
2002: अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल के हत्यारे उमर शेख़ को पाकिस्तानी अदालत द्वारा मौत की सज़ा सुनाई गई।
2006: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्विटर’ (अब X) आधिकारिक रूप से लॉन्च किया गया था।
2009: इरान से अर्मेनिया जा रहा एक प्लेन रास्ते में ही दुर्घटनाग्रस्त हो गया। हादसे में प्लेन में सवार सभी 168 लोग मारे गए।
2011: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने पीएसएलवी सी-17 के जरिए जीसैट-12 ए का श्रीहरिकोटा से सफल प्रक्षेपण किया।
2023: हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने सार्वजनिक रूप से बयान जारी कर बताया कि मानसून से राज्य को लगभग 8,000 करोड़ रुपये का भारी नुकसान हो चुका है और 24 जून से 14 जुलाई की रात तक विभिन्न आपदाओं व हादसों में 108 लोगों की जान जा चुकी है।
2025: भारत की प्रसिद्ध महिला अधिकार कार्यकर्ता वर्षा देशपांडे को लैंगिक समानता, कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ 35 वर्षों के संघर्ष और बाल विवाह रोकने के प्रयासों के लिए संयुक्त राष्ट्र के प्रतिष्ठित ‘2025 यूएन पापुलेशन अवार्ड’ से सम्मानित किया गया।
15 जुलाई को जन्मे प्रमुख व्यक्ति (Born on 15 July)
1611: मिर्ज़ा राजा जयसिंह– आमेर (जयपुर) के पराक्रमी राजा और मुगल साम्राज्य के सबसे वरिष्ठ सेनापति। जयसिंह ने 3 मुग़ल राजाओं का शासन काल देखा- जहांगीर, शाहजहां, और औरंगज़ेब।
1840: विलियम विलसन हन्टर – एक परिष्कृत शिक्षाविद, ग्रन्थकार और सांख्यिकीविज्ञ अंग्रेज़ अधिकारी।
1885: पत्तम थानु पिल्लई – केरल के दूसरे मुख्यमंत्री। उन्होंने पंजाब और आंध्र प्रदेश के राज्यपाल के रूप में भी कार्य किया।
1883: जमशेद जी जीजाभाई – प्रसिद्ध भारतीय जो व्यवसाय से अत्यंत धनी और दानवीर थे।
1903: के. कामराज – भारत रत्न सम्मानित स्वतंत्रता सेनानी, राजनेता, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री।
1909: दुर्गाबाई देशमुख – भारत की स्वतंत्रता सेनानी, सामाजिक कार्यकर्ता तथा भारतीय संविधान सभा में चुनी जाने वाले महिला।
1912: मोहम्मद उस्मान – भारतीय सेना के उच्च अधिकारी, जो भारत और पाकिस्तान के प्रथम युद्ध (1947-48) में शहीद हुए थे।
1922: लिओन एम. लेडरमैन – अमेरिकी भौतिक विज्ञानी, नोबेल पुरस्कार विजेता।
1925: बादल सरकार – प्रसिद्ध अभिनेता, नाटककार, निर्देशक और इन सबके अतिरिक्त रंगमंच के सिद्धांतकार।
1927: सी. एच. मुहम्मद कोया – केरल के भूतपूर्व मुख्यमंत्री थे।
1933: एम. टी. वासुदेव नायर– केरल के प्रसिद्ध मलयालम लेखक, पटकथा लेखक और निर्देशक। उन्हें कई राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।
1937: प्रभाष जोशी – हिंदी के जाने-माने पत्रकार।
1959: रमेश पोखरियाल “निशंक”– भारत सरकार में केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री। वे एक हिन्दी कवि भी हैं।
1962: भूपेन्द्र पटेल- गुजरात के वर्तमान और 17वें मुख्यमंत्री।
1947: तुलसी मुण्डा– ओडिशा की प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता और पद्मश्री से सम्मानित। उन्होंने आदिवासी क्षेत्रों में बच्चों, विशेषकर बालिकाओं की शिक्षा और सामाजिक चेतना के लिए अभूतपूर्व कार्य किया।
15 जुलाई को हुए प्रमुख निधन (Died on 15 July)
1542: लिसा डेल जियोकोंडो- इतालवी पुनर्जागरण के दौर की महिला, जिन्हें पूरी दुनिया महान चित्रकार लियोनार्डो दा विंची की कालजयी पेंटिंग ‘मोना लिसा’ की मुख्य मॉडल (विषय) के रूप में जानती है।
1967: बाल गन्धर्व – मराठी रंगमंच के महान् नायक और प्रसिद्ध गायक।
1985: बनारसीदास चतुर्वेदी- भारत के प्रसिद्ध हिंदी पत्रकार, लेखक और पद्म भूषण से सम्मानित पूर्व राज्यसभा सदस्य।
2004: बानो जहाँगीर कोयाजी – भारतीय चिकित्सा वैज्ञानिक तथा परिवार नियोजन विशेषज्ञ।
2017: मरियम मिर्ज़ाख़ानी – गणित की दुनिया का प्रतिष्ठित सम्मान ‘फील्ड्स मेडल’ पाने वाली पहली महिला गणितज्ञ थीं।
15 जुलाई के महत्त्वपूर्ण अवसर एवं उत्सव (Important events and festivities of 15 July)
युवा कौशल दिवस
हर साल 15 जुलाई को विश्व युवा कौशल दिवस (World Youth Skills Day) मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य युवाओं को रोजगार, बेहतर कार्य और उद्यमिता के लिए आवश्यक तकनीकी और व्यावसायिक कौशल से लैस करना है। तेजी से बदलती दुनिया, जैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डिजिटल दुनिया की जरूरतों को पूरा करने के लिए युवाओं को आधुनिक कौशल प्रदान करना है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 18 दिसंबर 2014 को एक प्रस्ताव पारित कर हर साल 15 जुलाई को इस दिवस को मनाने की घोषणा की थी। पहली बार यह दिवस 15 जुलाई 2015 को मनाया गया था।
विश्व प्लास्टिक सर्जरी दिवस
हर साल 15 जुलाई को ‘विश्व प्लास्टिक सर्जरी दिवस’ (World Plastic Surgery Day) मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य प्लास्टिक सर्जरी के बारे में जागरूकता लाना, इससे जुड़े मिथकों को दूर करना और पुनर्निर्माण व कॉस्मेटिक सर्जरी के फायदों के बारे में लोगों को शिक्षित करना है। भारत में पहली बार 15 जुलाई 2011 को ‘राष्ट्रीय प्लास्टिक सर्जरी दिवस’ मनाने की शुरुआत हुई थी। इसके एक दशक बाद, इसे वैश्विक स्तर पर मान्यता मिली।
प्रस्तुति
हिमाचल न्यूज़ रिसर्च डेस्क
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Posted By: Himachal News
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