Morarji Desai: भारतीय राजनीतिक इतिहास में 14 जुलाई 1979 का दिन एक बड़े सत्ता परिवर्तन का गवाह बना था। आज ही के दिन देश की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार के मुखिया मोरारजी देसाई को आंतरिक कलह और बगावत के कारण प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। आपातकाल (इमरजेंसी) के खिलाफ एकजुट हुए विभिन्न विचारधाराओं के नेताओं की यह महत्वाकांक्षी राजनीतिक लहर महज 28 महीनों में ही शांत हो गई।
मार्च 1977 में जब देश से आपातकाल हटाया गया, तो तत्कालीन कांग्रेस सरकार के खिलाफ जनता में भारी आक्रोश था। इस दौरान विपक्षी दलों, संघ और समाजवादियों ने एकजुट होकर ‘जनता पार्टी’ का गठन किया, जिसके मार्गदर्शक जयप्रकाश नारायण (जेपी) थे। जेपी ने पहले ही किसी भी सरकारी पद को न लेने का संकल्प किया था। चुनावों में कांग्रेस विरोधी ऐसी लहर चली कि इंदिरा गांधी स्वयं 55 हजार से अधिक मतों से पराजित हो गईं और उनके पुत्र संजय गांधी भी अपनी सीट नहीं बचा सके। कांग्रेस महज 189 सीटों पर सिमट गई, जबकि जनता पार्टी ने 345 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत हासिल किया।
ऐतिहासिक जीत के बाद सरकार की कमान संभालने के लिए तीन प्रमुख चेहरे मोरारजी देसाई, जगजीवन राम और चौधरी चरण सिंह दावेदार थे। काफी राजनीतिक विमर्श के बाद मोरारजी देसाई के नाम पर सहमति बनी, जो इससे पहले 1964 और 1967 में भी पीएम बनते-बनते रह गए थे। 23 मार्च 1977 को उन्होंने देश के चौथे प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। अन्य दोनों वरिष्ठ नेताओं को संतुष्ट करने के लिए गृह और रक्षा जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी सौंपी गई।
विरोधी विचारधाराओं के मेल से बनी इस सरकार में कुछ ही महीनों के भीतर मतभेद उभरने लगे। मई 1977 में बिहार के बेलछी में हुए दलित नरसंहार ने विपक्ष में बैठी इंदिरा गांधी को वापसी का बड़ा अवसर दे दिया। वे दुर्गम रास्तों को पार करने के लिए हाथी पर सवार होकर पीड़ितों से मिलने पहुंचीं, जिसकी देश भर में व्यापक चर्चा हुई। इसके बाद, शाह आयोग की रिपोर्ट के आधार पर तत्कालीन गृह मंत्री के आदेश पर इंदिरा गांधी को गिरफ्तार कर लिया गया, हालांकि कहा जाता है कि पीएम मोरारजी देसाई इस जल्दबाजी से पूरी तरह सहमत नहीं थे।
वर्ष 1978 में इंदिरा गांधी कर्नाटक की चिकमगलूर सीट से उपचुनाव जीतकर दोबारा संसद पहुंच गईं, जिससे सरकार पर दबाव और बढ़ गया। इधर जनता पार्टी के भीतर की खींचतान इतनी बढ़ गई कि पीएम मोरारजी देसाई ने गृह मंत्री चौधरी चरण सिंह और स्वास्थ्य मंत्री राज नारायण को कैबिनेट से बर्खास्त कर दिया। इसके जवाब में चौधरी चरण सिंह ने दिल्ली में एक विशाल किसान रैली कर अपनी राजनीतिक ताकत का अहसास कराया, जिसके चलते सरकार को उन्हें वापस कैबिनेट में शामिल करना पड़ा।
इस राजनीतिक संतुलन को बनाए रखने के लिए देश में पहली बार एक साथ दो उपप्रधानमंत्री (चौधरी चरण सिंह और बाबू जगजीवन राम) बनाए गए। इसके बावजूद दरारें कम नहीं हुईं। जुलाई 1979 के मानसून सत्र में सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया। चौधरी चरण सिंह ने बगावत करते हुए अपने खेमे के सांसदों के साथ समर्थन वापस ले लिया।
परिणामस्वरूप, 14 जुलाई 1979 को मोरारजी देसाई ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद 28 जुलाई 1979 को कांग्रेस के बाहरी समर्थन से चौधरी चरण सिंह देश के अगले प्रधानमंत्री बने, लेकिन यह व्यवस्था भी लंबी नहीं चली और अंततः जनवरी 1980 के आम चुनावों में इंदिरा गांधी भारी बहुमत के साथ दोबारा सत्ता में लौट आईं।
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