Mission Aagman: भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में आज का दिन सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया है। भारत के पहले निजी तौर पर विकसित ऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-1’ ने आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से उड़ान भरकर सफलता का नया इतिहास रच दिया है। सुबह तकनीकी कारणों से लॉन्चिंग में आई कुछ पलों की रुकावट के बाद, रॉकेट ने अंतरिक्ष की ओर गर्जना करते हुए निजी स्पेस सेक्टर में भारत का परचम लहरा दिया।
इस ऐतिहासिक कामयाबी पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘विक्रम-1’ के पहले कक्षीय प्रक्षेपण की जमकर सराहना करते हुए इसे देश की अंतरिक्ष यात्रा में एक ‘ऐतिहासिक नई सीमा’ बताया और कहा कि यह मिशन भारत के युवाओं की अद्भुत प्रतिभा और उद्यमशीलता की भावना का जीवंत प्रतिबिंब है।
‘मिशन आगमन’ अपने साथ अंतरिक्ष में बेहद अनोखे और अनूठे पेलोड लेकर गया है, जो कला और विज्ञान के बेजोड़ संगम को दर्शाते हैं। अंतरिक्ष में अजय कुमार मट्टेवाड़ा द्वारा निर्मित एक अद्भुत माइक्रोआर्ट भेजी गई है। यह 18 कैरेट सोने से बना एक बेहद छोटा रॉकेट है, जिसके अंदर भारत के तीन महान वैज्ञानिकों सर सीवी रमन, डॉ. विक्रम साराभाई और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की बेहद सूक्ष्म मूर्तियां तराशी गई हैं। इन मूर्तियों का आकार चावल के एक दाने से भी छोटा है।
बेंगलुरु की कंपनी कॉसमॉस डायमंड्स द्वारा अत्याधुनिक लैब में तैयार किया गया एक विशेष ‘डायमंड लोटस’ भी इस मिशन के जरिए अंतरिक्ष का चक्कर काट रहा है।
क्या है ‘मिशन आगमन’?
‘मिशन आगमन’ दरअसल विक्रम-1 रॉकेट की पहली और सबसे महत्वपूर्ण परीक्षण उड़ान है। इस मिशन के जरिए हैदराबाद स्थित प्राइवेट एयरोस्पेस कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस ने अपने पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक से निर्मित ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल की वास्तविक क्षमताओं का सफलतापूर्वक परीक्षण किया है। अब तक भारत में सैटेलाइट भेजने का एकाधिकार मुख्य रूप से इसरो के पास था, लेकिन इस सफलता के बाद भारत की निजी कंपनियां भी वैश्विक बाजार में स्वतंत्र रूप से व्यावसायिक लॉन्च सेवाएं देने के लिए तैयार हो गई हैं।
Mission Aagman: प्राइवेट स्पेस मार्केट में भारत का बजेगा डंका
आईएन-स्पेस के तकनीकी निदेशक राजेश जोथी के अनुसार, यह मिशन वैश्विक स्तर पर छोटे उपग्रहों के बढ़ते बाजार में भारत की स्थिति को बेहद मजबूत कर देगा। वर्ष 2020 में केंद्र सरकार द्वारा अंतरिक्ष क्षेत्र में किए गए ऐतिहासिक सुधारों के बाद से निजी क्षेत्र की भागीदारी में जो तेजी आई थी, आज की इस सफल लॉन्चिंग ने उस पर कामयाबी की अंतिम मुहर लगा दी है। स्काईरूट एयरोस्पेस का यह ‘विक्रम-1’ रॉकेट अब दुनिया भर के छोटे कमर्शियल सैटेलाइट्स के लिए सबसे सस्ता और भरोसेमंद विकल्प बनने की राह पर अग्रसर है।
Mission Aagman: जानिए ‘विक्रम-1’ की खासियतें
भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई के सम्मान में नाम पाए इस रॉकेट की तकनीक बेहद आधुनिक और उन्नत है।
24 मीटर लंबा यह ऑर्बिटल क्लास रॉकेट पूरी तरह हल्के कार्बन-कॉम्पोजिट स्ट्रक्चर से बना है। कार्बन फाइबर सबसे मजबूत स्टील की तुलना में लगभग पांच गुना हल्का होता है, जिससे रॉकेट का वजन बेहद कम और ईंधन दक्षता कई गुना बढ़ जाती है।
रॉकेट में तीन सॉलिड प्रोपल्शन स्टेज हैं। इसके सबसे ऊपरी हिस्से पर एक विशेष ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल लगाया गया है, जो एक ही मिशन में कई उपग्रहों को अलग-अलग कक्षाओं में स्थापित करने की क्षमता रखता है।
‘विक्रम-1’ को 450 किलोमीटर की लो-अर्थ ऑर्बिट में 350 किलोग्राम तक का वजनदार ले जाने के लिए खास तौर पर डिजाइन किया गया है।
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