अनुशी शर्मा: पहाड़ों की गोद से कान्स के रेड कारपेट तक
कहते हैं कि अगर इरादों में दम और सपनों में सच्चाई हो, तो हिमालय जैसी विशाल चुनौतियां भी घुटने टेक देती हैं। इस कहावत को सच कर दिखाया है हिमाचल प्रदेश के सिरमौर (गिरिपार क्षेत्र) की 32 वर्षीय बेटी अनुशी शर्मा ने। पहाड़ों की शांत वादियों से शुरू हुआ अनुशी का सफर दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित ‘कान्स फिल्म फेस्टिवल 2026’ के मंच तक जा पहुंचा है। अनुशी शर्मा द्वारा लिखित, निर्देशित और अभिनीत फिल्म ‘खूंटा’ का चयन कान्स के लिए हुआ है, जो न केवल एक सिनेमाई सफलता है, बल्कि वैश्विक मंच पर हिमाचल की संस्कृति और पहाड़ों की आत्मा की गूंज है।
माटी से जुड़ाव और रंगमंच का कड़ा संघर्ष
शिलाई और सोलन से अपनी पढ़ाई पूरी करने वाली अनुशी का जन्म गिरिपार के एक छोटे से गांव द्राबिल में हुआ था। बचपन से ही देव परंपराओं, लोक संस्कृति और ग्रामीण परिवेश को जीने वाली अनुशी के भीतर अपनी माटी की कहानी को दुनिया के सामने लाने का एक अटूट सपना था। इस सपने को पंख देने के लिए उन्होंने लंबे समय तक हिमाचल में थिएटर और स्टेज कलाकार के रूप में कड़ा संघर्ष किया। अभिनय और निर्देशन की बारीकियां सीखकर वह मुंबई पहुँचीं। टीवी इंडस्ट्री में अपनी प्रतिभा साबित करने के बाद भी उनका दिल हमेशा पहाड़ों के लिए धड़कता रहा, जिसने आखिरकार ‘खूंटा’ को जन्म दिया।
‘खूंटा’: सिर्फ एक फिल्म नहीं, पहाड़ों का जीवंत दस्तावेज
‘खूंटा’ महज़ एक कहानी नहीं, बल्कि हिमालयी जीवन का एक ऐसा दर्पण है जिसमें सिरमौर का रहन-सहन, देव संस्कृति और प्रकृति के साथ इंसानी संघर्ष को बेहद संजीदगी से उकेरा गया है। फिल्म की कहानी एक ऐसी महिला के इर्द-गिर्द घूमती है जो अपने लापता पति का इंतज़ार कर रही है। यह इंतज़ार सिर्फ विरह का नहीं, बल्कि आस्था, विरासत और विनाश के बीच की जंग का है। फिल्म में हाटी संस्कृति, उत्तराखंड के जौनसार-बावर और गद्दी समुदाय की जीवनशैली को पिरोया गया है। यह सिनेमाई मास्टरपीस संदेश देता है कि जब प्रकृति रौद्र रूप लेती है, तो सब कुछ बदल जाता है।
बिना बनावटी ग्लैमर के रचा इतिहास
16 मई 2026 को कान्स फिल्म मार्केट प्रीमियर में जब ‘खूंटा’ की स्क्रीनिंग हुई, तो वह पल हिमाचल के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया। यह कान्स मार्केट प्रीमियर में जगह बनाने वाली हिमाचल की पहली फिल्म है। इस फिल्म में कोई बनावटी चमक-दमक या नकली ग्लैमर नहीं है; इसमें सिर्फ पहाड़ों की कड़वी सच्चाई, संघर्ष और यहाँ का मर्मस्पर्शी दर्द है। न्यूयॉर्क बेस्ड इंडियन-अमेरिकन निर्माता के सहयोग से करीब एक करोड़ रुपये के बजट में बनी यह फिल्म अपनी जड़ों से पूरी तरह जुड़ी रही।
पूरे पहाड़ की साझी विरासत और गर्व का क्षण
इस फिल्म की खूबसूरती यह है कि इसकी शूटिंग सिरमौर के द्राबिल गांव और उत्तराखंड के क्वाणु में हुई, जहां स्थानीय ग्रामीणों ने इसे अपनी कहानी मानकर पूरे दिल से सहयोग किया। लोगों ने अपने घरों के दरवाज़े खोले और पारंपरिक वस्त्रों व धार्मिक अनुष्ठानों की शुद्धता को बनाए रखने में मदद की। अनुशी शर्मा ने साबित कर दिया है कि स्थानीय कहानियों में वैश्विक बनने का दम होता है। आज इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर आज सिर्फ सिरमौर नहीं… पूरा हिमाचल अपनी इस बेटी पर गर्व कर रहा है।
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