19 July in History: ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार वर्ष का 200वां दिन (लीप वर्ष में 201वां दिन) है। साल में अभी और 165 दिन शेष हैं। भारत और विश्व इतिहास में 19 जुलाई का खास महत्व है, क्योंकि इस दिन कई महत्वपूर्ण घटनाएं घटी जो इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज होकर रह गईं हैं।
आज का इतिहास में जानिए आज के दिन जन्मे चर्चित व्यक्ति, प्रसिद्ध व्यक्तियों के निधन, युद्ध संधि, किसी देश की आजादी, नई तकनिकी का अविष्कार, सत्ता का बदलना, महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दिवस के बारे में। आईए हिमाचल न्यूज़ में पढ़ें भारत और विश्व इतिहास के पन्नों में दर्ज 19 जुलाई का इतिहास एवं घटनाक्रम।
1969: कहानी उस रात की, जब इंदिरा गांधी ने एक झटके में बदल डाला भारत का बैंकिंग इतिहास
तारीख 19 जुलाई 1969…. वक्त रात के 8:30 बजे…. ऑल इंडिया रेडियो पर देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की आवाज गूंजती है। वो एक ऐसा ऐलान करती हैं जिससे देश के बड़े-बड़े उद्योगपतियों के पैरों तले जमीन खिसक जाती है। एक ऐसा अध्यादेश, जिसने भारत की बंद तिजोरियों के ताले खोलकर उन्हें सीधे देश के किसानों और गरीबों से जोड़ दिया। यह कहानी है आजाद भारत के सबसे विवादित और साहसिक फैसलों में से एक की ’14 बड़े निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण’।
इस कहानी के तार जुड़ते हैं दूसरे विश्वयुद्ध से। विश्वयुद्ध की भयंकर तबाही के बाद पूरा यूरोप मंदी और भारी कर्ज में डूब चुका था। तब वहां एक विचार ने जन्म लिया ‘अगर मुल्क को बचाना है, तो बैंकों पर सरकार का कब्जा होना जरूरी है’। यूरोप के कई देशों ने ऐसा ही किया। भारत ने भी इसी राह पर चलते हुए साल 1949 में सबसे पहले ‘भारतीय रिजर्व बैंक’ (RBI) को अपने नियंत्रण में लिया।
लेकिन, असली चुनौती अभी बाकी थी। देश के बाकी तमाम बड़े बैंक अब भी चंद रसूखदार उद्योगपतियों की मुट्ठी में थे। बैंकों का कारोबार सिर्फ चमचमाते बड़े शहरों तक सीमित था। आम हिंदुस्तानी और ग्रामीण आबादी के लिए बैंक का दरवाजा लांघना किसी ख्वाब जैसा था।
इंदिरा गांधी का सोचना साफ था, अगर देश का सामाजिक विकास करना है, तो बैंकों को गांवों और खेतों तक ले जाना ही होगा। लेकिन यह राह इतनी आसान नहीं थी। इंदिरा के इस समाजवादी रुख के खिलाफ खुद उनकी सरकार के भीतर एक ‘अदृश्य दीवार’ खड़ी थी।
तत्कालीन वित्त मंत्री मोरारजी देसाई इस फैसले के सख्त खिलाफ थे। दिल्ली के गलियारों में शह और मात का खेल शुरू हो चुका था। इंदिरा ने एक कड़ा फैसला लेते हुए मोरारजी देसाई का मंत्रालय बदलने का आदेश जारी कर दिया। स्वाभिमानी मोरारजी ने इसे अपना अपमान समझा और तुरंत वित्त मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। अब इंदिरा के सामने कोई रोड़ा नहीं था।
इस पूरे ऑपरेशन को पर्दे के पीछे से लीड कर रहे थे इंदिरा गांधी के प्रधान सचिव पीएन हक्सर। सोवियत संघ की समाजवादी विचारधारा से प्रभावित हक्सर ने इस पूरे फैसले का ऐसा ब्लूप्रिंट तैयार किया, जिसकी भनक विपक्ष को भी नहीं लगी। दरअसल, इसकी नींव 1967 में ही रख दी गई थी, जब इंदिरा ने कांग्रेस के ’10 सूत्रीय कार्यक्रम’ में बैंकों पर नियंत्रण और राजा-महाराजाओं के शाही भत्ते को खत्म करने का इरादा जताया था।
7 जुलाई 1969 को बेंगलुरु के कांग्रेस अधिवेशन में इस पर अंतिम मुहर लगी और 19 जुलाई को इतिहास रच दिया गया। निजी बैंकों को सरकारी नियंत्रण में लेना इसलिए भी जरूरी हो गया था क्योंकि आज़ादी के शुरुआती 10 सालों के भीतर ही देश के 300 से ज्यादा छोटे-मोटे निजी बैंक कंगाल हो चुके थे। इन बैंकों के डूबने से देश के आम नागरिकों की करोड़ों रुपये की जमा-पूंजी पानी में मिल गई थी।
जिन 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया, उनके पास उस वक्त देश की करीब 80 फीसदी जमा पूंजी थी। लेकिन दिक्कत यह थी कि उद्योगपति इस भारी-भरकम पूंजी का निवेश सिर्फ उन सेक्टर्स में करते थे, जहाँ उन्हें मोटा मुनाफा मिलता था। गरीब और किसान के लिए वहां कोई जगह नहीं थी।
इस एक फैसले ने भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा और दशा हमेशा के लिए बदल दी। राष्ट्रीयकरण का जो असर हुआ, उसने आलोचकों के मुंह बंद कर दिए। शहरों के एसी कमरों से निकलकर बैंक देश के सुदूर गांवों और कस्बों की धूल-मिट्टी तक जा पहुंचे। भारत की विशाल ग्रामीण आबादी पहली बार मुख्यधारा की बैंकिंग से जुड़ी। देखते ही देखते, महज तीन दशकों के भीतर देश में बैंकों की शाखाएं 8 हजार से छलांग लगाकर 60 हजार के आंकड़े को पार कर गईं।
इंदिरा गांधी का यह साहसिक सफरनामा यहीं नहीं रुका। इस ऐतिहासिक फैसले के ठीक 11 साल बाद यानी अप्रैल 1980 में, उन्होंने 6 और निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर भारतीय बैंकिंग सिस्टम पर सरकार की मुहर को हमेशा के लिए अटूट बना दिया।
1941: टॉम एंड जैरी को मिला था अपना नाम
दुनिया में शायद ही कोई ऐसा इंसान होगा जिसने बचपन में चूहे और बिल्ली की उस आइकॉनिक जोड़ी की अतरंगी जंग न देखी हो। जी हां, हम बात कर रहे हैं बच्चों और बड़ों के सबसे पसंदीदा कार्टून कैरेक्टर ‘टॉम एंड जैरी’ की। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया को हंसाने वाले इस चूहे और बिल्ली का नाम शुरुआत में टॉम और जैरी था ही नहीं? इस नाम के पीछे की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम रोमांचक नहीं है।
यह कहानी शुरू होती है साल 1940 से। एनिमेटर्स की मशहूर जोड़ी विलियम हैना और जोसेफ बार्बेरा ने एक शॉर्ट कार्टून फिल्म बनाई, जिसका नाम था “पुस गेट द बूट्स”। इसी फिल्म में यह चूहे-बिल्ली की जोड़ी पहली बार परदे पर अवतरित हुई। लेकिन ट्विस्ट यह था कि इस फिल्म में बिल्ली का नाम ‘जेस्पर’ और चूहे का नाम ‘जिंक्स’ रखा गया था।
यह फिल्म रिलीज होते ही इतनी बड़ी ब्लॉकबस्टर साबित हुई कि इसे सीधे ‘बेस्ट एनिमेटेड शॉर्ट फिल्म’ के लिए ऑस्कर नॉमिनेशन तक मिल गया।
जब पहली फिल्म सुपरहिट हो गई, तो मेकर्स को लगा कि इस जोड़ी में कुछ जादुई बात है। लेकिन उन्हें लगा कि ‘जेस्पर और जिंक्स’ नाम थोड़ा फीका है। इस जोड़ी को एक ऐसा नाम चाहिए था जो हर बच्चे की जुबान पर चढ़ जाए।
इसके बाद विलियम हैना और जोसेफ बार्बेरा ने स्टूडियो के कर्मचारियों के बीच एक अनोखा चैलेंज रख दिया। उन्होंने एलान किया कि जो भी इस जोड़ी को सबसे धांसू और मजेदार नाम देगा, उसे 50 डॉलर का नकद इनाम दिया जाएगा। उस दौर में 50 डॉलर एक बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी।
इनाम की रकम और इस अनोखे कैरेक्टर के लिए स्टूडियो के एनिमेटर जॉन कार ने एक नाम सुझाया ‘टॉम एंड जैरी’। मेकर्स को यह नाम सुनते ही इतना पसंद आ गया कि उन्होंने बिना देर किए जॉन कार को 50 डॉलर का विजेता घोषित कर दिया।
नाम फाइनल होने के बाद विलियम और जोसेफ की जोड़ी ने एक नई फिल्म पर काम शुरू किया, जिसका नाम रखा गया ‘द मिडनाइट स्नैक’।
तारीख आई 19 जुलाई 1941.. आज ही के दिन यह शॉर्ट फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज हुई। परदे पर जैसे ही यह फिल्म शुरू हुई, दुनिया ने पहली बार बिल्ली को ‘टॉम’ और शातिर चूहे को ‘जैरी’ के नाम से पुकारा। उसके बाद जो हुआ, वो इतिहास है। आज 80 से ज्यादा साल बीत जाने के बाद भी इस जोड़ी का जादू दुनिया के हर कोने में बरकरार है।
64 ईस्वी: जब राख में तब्दील हो गई दुनिया की सबसे महान सल्तनत
इतिहास के पन्नों में कुछ तारीखें स्याही से नहीं, बल्कि बेकसूरों के खून और धधकती आग के अंगारों से लिखी जाती हैं। आज से लगभग दो हजार साल पहले, साम्राज्यवादी शानो-शौकत से चमकता रोम शहर एक ही झटके में नरक की भट्टी बन गया था। यह दास्तान प्राचीन इतिहास की सबसे खौफनाक और रूह कंपा देने वाली त्रासदी की है—’द ग्रेट फायर ऑफ रोम’।
तारीख थी 18-19 जुलाई, 64 ईस्वी। जब आधा रोम गहरी नींद में सो रहा था, तब ‘सर्कस मैक्सिमस’ के पास बनी दुकानों से अचानक आग की एक लपट उठी। किसी को अंदाजा नहीं था कि यह लपट पूरे रोमन साम्राज्य के गुरूर को भस्म करने आ रही है। तेज तूफानी हवाओं ने आग को पंख दे दिए और देखते ही देखते तंग, संकरी गलियों में मौत तांडव करने लगी।
लोग जान बचाने के लिए बदहवास भाग रहे थे। गलियों में मची भगदड़, अपनों को पुकारते बच्चों की चीखें और धुएं से घुटता दम। आग एक-दो दिन नहीं, बल्कि पूरे 6 दिनों तक तांडव मचाती रही। जब लगा कि सब थम गया है, तब यह काल-अग्नि दोबारा भड़क उठी और 3 दिनों तक शहर का सीना झुलसाती रही।
जब यह आग बुझी, तो रोम की चमक गायब हो चुकी थी। वहां सिर्फ काला धुआं और इंसानी लाशे थीं। रोम के 14 खूबसूरत प्रशासनिक जिलों में से 3 जिले पूरी तरह राख के ढेर में बदल चुके थे। 7 जिले मलबे का कब्रिस्तान बन गए थे। केवल 4 जिले ही इस कयामत से बच पाए।
सदियों पुराने पूजनीय मंदिर, जैसे ‘टेंपल ऑफ लूना’ और ‘जुपिटर स्टैटर का मंदिर’ पल भर में ढह गए। सदियों से सहेजकर रखी गई ग्रीस की अमूल्य कलाकृतियां और ऐतिहासिक दस्तावेज, जो मानव सभ्यता की धरोहर थे, हमेशा के लिए राख की एक ढेरी बनकर रह गए। यहाँ तक कि सम्राट नीरो का अपना आलीशान महल ‘डोमस ट्रांसिटोरिया’ भी इस तबाही से खुद को बचा नहीं पाया।
इस भयानक त्रासदी में जान-माल का जो नुकसान हुआ, उसकी कल्पना करके आज भी रूह कांप जाती है। आग इतनी अचानक और विकराल थी कि लोगों को संभलने का मौका ही नहीं मिला। तंग गलियों में भागते हुए हजारों मासूम लोग जिंदा जल गए। धुएं के गुबार ने कई आशियानों को श्मशान बना दिया।
सल्तनत की करीब 10 लाख की आबादी में से 2 लाख से ज्यादा लोग एक ही रात में सड़क पर आ गए। जिन अमीर और रसूखदार लोगों के पास कभी खुद के महल थे, वे अपने बच्चों को छाती से चिपकाए खुले मैदानों, सार्वजनिक पार्कों और सम्राट के बगीचों में फटे हुए तंबुओं के नीचे दाने-दाने को मोहताज बैठे थे। रोम के इतिहास में ऐसा शरणार्थी संकट पहले कभी नहीं देखा गया था।
इस कयामत के बीच एक ऐसी कहानी ने जन्म लिया जो आज भी हर जुबान पर है “जब रोम जल रहा था, तो नीरो बांसुरी बजा रहा था।” हालांकि, इतिहासकार टैसिटस के अनुसार यह बात पूरी तरह सच नहीं है। आग के वक्त नीरो रोम से 35 मील दूर ‘एंजियम’ में था। खबर मिलते ही वह दौड़ा चला आया। उसने भूखे लोगों के लिए अनाज के गोदाम खोल दिए और अपने बागों में पीड़ितों को पनाह दी।
लेकिन, जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर था। लोग मानने को तैयार नहीं थे, क्योंकि इस आग के बाद नीरो ने खाली हुई जमीन पर अपना बेहद आलीशान महल ‘डोमस ऑरिया’ (सोने का महल) बनवाना शुरू कर दिया था। चारों तरफ अफवाहें उड़ने लगीं कि नीरो ने अपना नया महल बनाने के लिए खुद ही रोम को फूंक दिया।
अपनी गद्दी बचाने और जनता का ध्यान भटकाने के लिए नीरो ने एक घिनौनी चाल चली। उसने इस पूरी तबाही का ठीकरा रोम के बेकसूर ‘ईसाइयों’ पर फोड़ दिया। इसके बाद रोम की धरती पर ईसाइयों के खिलाफ क्रूर और अमानवीय अत्याचारों का वो खूनी दौर शुरू हुआ, जिसने इंसानियत को शर्मसार कर दिया।
रोम दोबारा खड़ा हुआ, सड़कें चौड़ी हुईं, पत्थरों की नई इमारतें बनीं। लेकिन उस भयानक रात की चीखें आज भी रोम की फिजाओं में दफन हैं, जो याद दिलाती हैं कि कुदरत के कहर और इंसानी सियासत के बीच हमेशा आम इंसान की जिंदगी ही दांव पर लगती है।
देश-विदेश में 19 जुलाई को इन घटनाओं के लिए भी याद किया जाता है
711: ग्वाडालेते के युद्ध में उमय्यद सेना ने विसिगोथ राजा रोडरिक को पराजित किया, जिससे इबेरियन प्रायद्वीप (स्पेन) में मुस्लिम शासन की शुरुआत हुई।
1763: बंगाल के नवाब मीर क़ासिम को कटवा के युद्ध में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने पराजित किया। यह बंगाल में ब्रिटिश प्रभुत्व स्थापित होने की दिशा में महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक थी।
1848: अमेरिका के सेनेका फॉल्स, न्यूयॉर्क में पहला महिला अधिकार सम्मेलन शुरू हुआ। इसे आधुनिक महिला अधिकार आंदोलन की आधारशिला माना जाता है। जिसमें महिलाओं के लिए संपत्ति का अधिकार, शिक्षा और वोट देने का अधिकार की मांग रखी गई।
1900: फ्रांस की राजधानी पेरिस में पहली मेट्रो लाइन का हुआ। इसे पेरिस विश्व मेले और शहर में आयोजित ओलंपिक खेलों के दौरान यात्रियों की भारी भीड़ को संभालने के लिए विशेष रूप से बनाया गया था। दुनिया की पहली मेट्रो सेवा लंदन में शुरू हो चुकी थी।
1903: फ्रेंच साइक्लिस्ट मोरिस गेरिन ने 2,428 किलोमीटर लंबा पहला टूर डी फ्रांस जीता।
1916: प्रथम विश्व युद्ध फ्रोमेल्स के युद्ध में ब्रिटिश और आस्ट्रेलियाई सेना ने जर्मन सेना पर हमला किया।
1926: फ्रांस में एडवर्ड हेरियोट के नेतृत्व में दूसरी बार सरकार बनीं।
1941: ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने पहली बार अपनी दो उंगलियों से ‘V’ (Victory) आकार का संकेत दिया था। यह चिन्ह बाद में पूरी दुनिया में ‘जीत’ का आधिकारिक प्रतीक बन गया।
1947: बर्मा के प्रधानमंत्री आंग सेन की रंगून में हत्या कर दी गई।
1961: ट्रांस वर्ल्ड एयरलाइंस ने फर्स्ट क्लास पैसेंजर्स को फ्लाइट में मूवीज दिखाने की शुरुआत की।
1974: महान भारतीय क्रांतिकारी शहीद सरदार उधम सिंह की अस्थियां लंदन से एक विशेष विमान द्वारा नई दिल्ली लाई गई थीं। अंग्रेजों की जेल में फांसी दिए जाने के 34 साल बाद यह देश के लिए एक बहुत बड़ा और भावुक पल था।
1980: तुर्की के पूर्व प्रधान मंत्री निहट एरीम को तुर्की के इस्तांबुल में 2 बंदूकधारियों ने जान से मार दिया।
1980: मॉस्को में ओलिंपिक की शुरुआत हुई। अफगानिस्तान में सोवियत संघ की सेना के दखल से कई देशों ने इन खेलों का बहिष्कार किया।
1985: स्कूल टीचर क्रिस्टा मैकोलिफ को अंतरिक्ष मिशन के लिए चुना गया। पहली बार किसी टीचर को अंतरिक्ष मिशन के लिए चुना गया था। हालांकि जनवरी 1986 में मिशन पर जाने के दौरान ही चैलेंजर में विस्फोट से क्रिस्टा का निधन हो गया।
1995: रूस एवं उससे अलग हुए गणराज्य चेचेन्या के बीच रूसी महासंघ में ही ‘समप्रभु गणराज्य’ का दर्जा देने संबंधी समझौता सम्पन्न।
2001: नेपाल के प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया। उन्होंने यह कदम शाही महल में हुए दुखद नरसंहार के लगभग एक महीने बाद उठाया था। उनके इस्तीफ़े के बाद शेर बहादुर देउबा को नया प्रधानमंत्री चुना गया था।
2001: तालिबान के सर्वोच्च नेता मुल्ला मुहम्मद उमर के नेतृत्व में, अफ़ग़ानिस्तान में “गैर-इस्लामिक” बताकर 30 वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। इस सूची में ताश, लिपस्टिक, नेल पॉलिश और शतरंज के अलावा टाई, संगीत वाद्ययंत्र और पत्रिकाएं शामिल थीं।
2003: रूस के अंतरिक्ष यात्री यूरी माले थान्को अंतरिक्ष में शादी रचाने वाले पहले व्यक्ति बने।
2006: लेबनान में इस्राइली हवाई हमलों के दौरान 3 भारतीय सहित 55 लोग मारे गए। यह घटना इस्राइल-हिजबुल्लाह युद्ध के दौरान हुई थी, जिसमें भारी संख्या में आम नागरिक मारे गए थे और लाखों लोग विस्थापित हुए थे।
2010: कोलकाता में एक ट्रेन दुर्घटना में 63 लोगों की मौत हो गई।
2020: संयुक्त अरब अमीरात ने जापान के तनेगाशिमा स्पेस सेंटर से मंगल ग्रह के लिए अपने पहले अंतरिक्ष मिशन ‘होप प्रोब’ को सफलतापूर्वक लॉन्च किया था। यह किसी भी अरब देश का पहला अंतरग्रहीय मिशन था।
2020: जापान के क्यूशू क्षेत्र में मूसलाधार बारिश के बाद आई बाढ़ और भूस्खलन से भारी तबाही मची थी, जिसमें 70 से अधिक लोगों की मौत हुई और लगभग 15,000 से अधिक इमारतें क्षतिग्रस्त हुई।
2024: अमेरिकी साइबर सुरक्षा कंपनी ‘क्राउडस्ट्राइक’ द्वारा माइक्रोसॉफ्ट विंडोज के लिए जारी किए गए एक त्रुटिपूर्ण सॉफ्टवेयर अपडेट के कारण दुनिया भर के लगभग 85 लाख कंप्यूटर अचानक क्रैश हो गए और स्क्रीन पर ‘ब्लू स्क्रीन ऑफ डेथ’ दिखाई देने लगा। इस तकनीकी खराबी के कारण 19 जुलाई 2024 को पूरी दुनिया में विमान सेवाएं, बैंकिंग सिस्टम, अस्पताल, टीवी चैनल, शेयर बाजार और आपातकालीन सेवाएं पूरी तरह ठप हो गईं। हजारों उड़ानें रद्द करनी पड़ीं और वैश्विक अर्थव्यवस्था को अरबों डॉलर का नुकसान हुआ।
19 जुलाई को जन्मे प्रमुख व्यक्ति
1814: सैमुअल कोल्ट – रिवॉल्वर का आविष्कार करने वाले।
1827: मंगल पांडे– भारतीय स्वतंत्रता सेनानी।
1881: हरमैन एश्टेडिंगर – जर्मनी के नोबल पुरस्कार प्राप्त विख्यात रसायनशास्त्री।
1893: विलादीमीर मायाकोस्फ़ी – 20वीं सदी की शुरुआत के बेहद प्रसिद्ध और क्रांतिकारी रूसी कवि व नाटककार।
1909: नालापत बालमणि अम्मा – मलयालम भाषा की अत्यंत प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित कवयित्री। उन्हें मलयालम साहित्य की ‘दादी’ के रूप में भी आदर से याद किया जाता है।
1925: दिनेश सिंह -भारत के वरिष्ठ राजनेता, जो कई बार लोकसभा के सदस्य रहे और देश के विदेश मंत्री का पदभार भी संभाला।
1938: जयंत विष्णु नार्लीकर– प्रख्यात भारतीय खगोल भौतिक विज्ञानी लेखक और पद्म विभूषण सम्मानित वैज्ञानिक।
1948: अल्तमस कबीर – भारत के 39वें मुख्य न्यायाधीश थे।
1955: रोजर बिन्नी- भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व दिग्गज ऑलराउंडर खिलाड़ी, जिन्होंने 1983 के ऐतिहासिक विश्व कप में भारत के लिए सबसे ज्यादा विकेट चटकाए थे। वे भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) के अध्यक्ष भी रहे हैं।
1961: हर्ष भोगले- भारत के सबसे लोकप्रिय और दिग्गज क्रिकेट कमेंटेटर व पत्रकार। अपनी अनूठी और ज्ञानवर्धक कॉमेंट्री शैली के लिए वे पूरी दुनिया के खेल प्रेमियों के बीच प्रसिद्ध हैं।
1956: ज़िया मोदी– भारत की प्रमुख कानूनी सलाहकार और कॉर्पोरेट वकील। वे देश की सबसे प्रभावशाली महिला बिजनेस लीडर्स में गिनी जाती हैं।
19 जुलाई को हुए प्रमुख निधन
1963: एनी मसकैरिनी- भारत की स्वतंत्रता सेनानी और राजनीतिज्ञ। वे भारत की संविधान सभा की सदस्य थीं और केरल से चुनी जाने वाली पहली महिला लोकसभा सांसद थी।
1965: सिंगमन री – दक्षिण कोरिया के पहले राष्ट्रपति।
1988: राजीव संधू- भारतीय सेना के जांबाज अधिकारी, जिन्हें मरणोपरांत वीरता के प्रतिष्ठित सम्मान ‘महावीर चक्र’ से नवाजा गया था।
2018: गोपालदास नीरज – हिन्दी साहित्यकार, शिक्षक एवं कवि सम्मेलनों के मंचों पर काव्य वाचक एवं फ़िल्मों के गीत लेखक थे।
19 जुलाई के महत्त्वपूर्ण अवसर एवं उत्सव
अंतरराष्ट्रीय कराओके दिवस
हर साल 19 जुलाई को दुनिया भर के संगीत प्रेमियों द्वारा अंतरराष्ट्रीय कराओके दिवस (International Karaoke Day) बड़े उत्साह से मनाया जाता है। जापान से शुरू हुआ कराओके आज वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय है। इसका उद्देश्य लोगों के बीच खुशी फैलाना और इस मनोरंजक गतिविधि के माध्यम से मेलजोल बढ़ाना है। कराओके (Karaoke) शब्द जापानी भाषा के दो शब्दों—’कारा’ (जिसका अर्थ ‘खाली’) और ‘ओके’ (जिसका अर्थ ‘ऑर्केस्ट्रा’) से मिलकर बना है। इसका मतलब है “बिना गायक के संगीत”।
यह खास तारीख (19 जुलाई) संगीतकार दाइसुके इनौए के सम्मान में चुनी गई है। 1971 में, जापान के कोबे शहर में दाइसुके इनौए ने स्वतंत्र रूप से पहला कराओके मशीन बनाया था। उन्होंने आम लोगों के लिए लोकप्रिय गानों को आसान सुर (keys) में रिकॉर्ड किया, ताकि कोई भी आसानी से गा सके। इस तारीख को वैश्विक रूप से मान्यता कराओके के माध्यम से लोगों को एक साथ लाने के लिए दी गई है।
प्रस्तुति
हिमाचल न्यूज़ रिसर्च डेस्क
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