Dr Yashwant Singh Parmar: पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश को अस्तित्व में लाने और उसे पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने में केंद्रीय भूमिका निभाने वाले हिमाचल प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री डॉ यशवंत सिंह परमार का आज 120वां जन्मदिन है।
डॉ. यशवंत सिंह परमार का जन्म चार अगस्त 1906 को प्रदेश के सिरमौर जिले (तत्कालीन सिरमौर रियासत) में बागथन क्षेत्र के चन्हालग गांव में भंडारी शिवानंद सिंह परमार के घर हुआ था। यह गांव अब ग्राम पंचायत लानाबांका के तहत आता है। उनके पिता सिरमौर के तत्कालीन महाराजा के बहुत करीबी थे और उर्दू व फारसी भाषा के विद्वान थे। वह सिरमौर रियासत के एक अधिकारी भी थे। वे सिरमौर रियासत के दो राजाओं के दीवान रहे थे। डॉ. परमार की माता का नाम लक्ष्मी देवी था। लोक संस्कृति और पारंपरिक खानपान के प्रति डॉ. यशवंत सिंह परमार का विशेष लगाव रहा तो यह उनकी मां से मिले संस्कार की बदौलत संभव हुआ।
डॉ. परमार का व्यक्तित्व ऐसा था, मानो पहाड़ और डॉ. परमार एक हो गए हों। बात चाहे स्वतंत्रता के आंदोलन की हो, हिमाचल के गठन की हो या फिर पूर्ण राज्यत्व का दर्जा दिलाने की, डॉ. परमार ने अपनी निष्पक्षता और निर्भीकता से हर मुहिम का सफल नेतृत्व किया। उनके योगदान से हिमाचल सरपट पटरी पर दौड़ता चला गया।
पिता ने शिक्षा के लिए गिरवी रख दी थी जमीन जायदाद
यशवंत सिंह परमार के पिता शिवानंद शिक्षा के महत्व को समझते थे। इसलिए उन्होंने यशवंत को उच्च शिक्षा दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उनकी शिक्षा के लिए पिता ने जमीन जायदाद गिरवी रख दी थी। डॉ. परमार की शुरुआती शिक्षा शमशेर हाई स्कूल नाहन से हुई। सन 1922 में दसवीं के बाद जब क्षेत्र में उच्च शिक्षा के लिए कोई कॉलेज नहीं था तो उन्होंने लाहौर के फोरमैन क्रिश्चियन कॉलेज दाखिला लिया। 1928 में बीए ऑनर्स किया। पंजाब यूनिवर्सिटी लाहौर से डिग्री लेने के बाद उन्होंने कैनिंग कॉलेज लखनऊ में प्रवेश लिया। लखनऊ के इस कॉलेज से समाज शास्त्र में एमए किया और एलएलबी की डिग्री भी ली।
सन 1929 में थियोसोफिकल सोसायटी देहरादून के सदस्य रहे। इसके बाद 1937-38 में नाहन क्रिकेट क्लब के सचिव बने और 1938-40 से दक्षिणी पंजाब क्रिकेट संघ के कार्यकारी सदस्य भी बने। सन 1944 में समाज शास्त्र विषय में पीएचडी की। उनकी डॉक्टरेट की डिग्री का विषय ‘सोशल एंड इकोनामिक बैक ग्राउंड ऑफ हिमालयन पॉलीएंड्री’ था।
सेशन जज भी रहे परमार
शिक्षा पूर्ण करने के बाद 1930 में डॉ. यशवंत सिंह परमार वापस सिरमौर आ गए, जहां उन्हे रियासत का न्यायाधीश नियुक्त किया गया। डॉ. परमार 1937 तक सिरमौर रियासत के सब जज व 1941 में सिरमौर रियासत के सेशन जज रहे। रियासत के विरुद्ध ही एक क्रांतिकारी एवं निर्भीक निर्णय पारित करने के कारण उन्हे न्यायाधीश के पद से इस्तीफा देना पड़ा। बाद शिमला में वकालत करते हुए वे रियासती शासन के विरुद्ध प्रजामंडल आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी करने लगे।
1946 में डॉ. परमार उतर आए राजनीति में
सिरमौर से निर्वासित होने के बाद डा. परमार प्रजा मंडल के सक्रिय सदस्य बन गए। हिमाचल प्रदेश में प्रजा मंडल रियासती और अंग्रेजी शासन के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा था। वह 1943 से 1946 तक दिल्ली में सिरमौर एसोसिएशन के सचिव बनाए गए। वह 1946 में हिमाचल हिल्स स्टेटस रिजनल कॉउंसिल के प्रधान चुने गए। 1947 में ग्रुपिंग एंड अमलेमेशन कमेटी के सदस्य व प्रजामंडल सिरमौर के प्रधान रहे। उन्होंने सुकेत आंदोलन में बढ़-चढक़र हिस्सा लिया और प्रमुख कार्यों में से एक रहे। 1948 से 1950 तक अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य रहे। 1950 में हिमाचल कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बने। उन्होंने भारतीय संविधान सभा में सदस्य के रूप में स्थान पाकर हिमाचल प्रदेश का नाम राष्ट्रीय स्तर पर गौरवान्वित किया।
1952 में बने पहली बार मुख्यमंत्री, 1977 में दिया इस्तीफा
डॉ. परमार 1952 में हिमाचल प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री बने। 1956 में वे 1957 में वे सांसद के रूप में भी निर्वाचित हुए। 1963 में वे दोबारा हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। वर्ष 1966 के अंतिम दो-तीन महीने देश में भारी राजनैतिक उथल-पुथल के थे और इसी बजह से डॉ. परमार ने 24 जनवरी, 1977 को मुखमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया।
इस्तीफे की खबर पर मुस्कुराकर बोले थे- इतनी बात फोन पर बता देते
वर्ष 1977 में जब राजनीतिक घटनाक्रम बदला और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की ओर से उन्हें दिल्ली आने का संदेश भेजा गया, तो डॉ. परमार बिना किसी हिचकिचाहट के दिल्ली पहुंचे। दिल्ली में जब कांग्रेस महासचिव ने उन्हें त्यागपत्र देने के फैसले से अवगत कराया, तो उन्होंने बेहद शांत भाव और मुस्कान के साथ कहा कि इतनी सी बात तो फोन पर ही बता दी जाती। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री बनाने का निर्णय भी शीर्ष नेतृत्व का था और पद छोड़ने का आदेश भी सहर्ष स्वीकार है।
जब नए मुख्यमंत्री को खुद अपनी कार में बिठाकर दी विदाई
त्यागपत्र देने के बाद शिमला में एक अभूतपूर्व दृश्य देखने को मिला था। जब नए मुख्यमंत्री के रूप में रामलाल ठाकुर का चयन हुआ, तो डॉ. परमार खुद अपनी गाड़ी का दरवाजा खोलकर उन्हें सम्मानपूर्वक बिठाते दिखे। उनके इस बड़प्पन और सहजता को देखकर वहां मौजूद सभी लोग हतप्रभ रह गए थे। सत्ता का कोई मोह न रखते हुए उन्होंने अपनी तमाम सरकारी सुविधाएं तुरंत छोड़ दी थीं।
बस कंडक्टर रह गया था हैरान
मुख्यमंत्री पद से हटने के तुरंत बाद डॉ. परमार ने अपना व्यक्तिगत सामान एक साधारण बक्से में बांधा और शिमला के पुराने बस स्टैंड पहुंच गए। वे नाहन जाने वाली हिमाचल पथ परिवहन निगम (एचआरटीसी) की एक खचाखच भरी साधारण सरकारी बस में सवार हो गए। जब कंडक्टर टिकट काटने के लिए उनके पास आया और पैसे लेकर टिकट थमाया, तो सामने तीन बार के मुख्यमंत्री को आम सवारी की तरह बैठा देख स्तब्ध रह गया। राजनीति में ईमानदारी, नैतिकता और जनसेवा की ऐसी मिसाल दुनिया में विरली ही देखने को मिलती है।
वह कहते थे ‘मेरा सपना हिमाचल को पूर्ण राज्य बनाना था, अब भले ही मै मुख्यमंत्री नही तो क्या हुआ। अब मैं एक साधारण नागरिक ही बनकर रहना चाहता हूं।’
परमार न होते तो आज हम हिमाचली नहीं, पंजाबी कहलाते
अंग्रेजों और रियासती शासन के खिलाफ मुखर रहने वाले डॉ. परमार पहाड़ और पहाड़ियों के हितों के लिए भी हमेशा संजीदगी के साथ सक्रिय रहे। जिसका जीता जागता प्रमाण पूर्ण राज्य के रूप में प्रदेशवासियों के सामने है। उन्होंने प्रदेश की सीमाओं को और बड़ा कर दिया था, जबकि प्रदेश को पंजाब में मिलाने की पुरजोर बात चल रही थी। डॉ. परमार ने हरियाणा और पंजाब के कई इलाकों को हिमाचल में मिलाकर हिमाचल प्रदेश का इतिहास ही नहीं, भूगोल भी बदल दिया था। अगर ऐसा न होता तो आज हम हिमाचली नहीं, पंजाबी कहला रहे होते। आज हर कोई यह बात कह रहा है, डा. परमार न होते तो हिमाचल, हिमाचल न होता।
30 रियासतों को मिलाकर बनाया हिमाचल, दिलाया पूर्ण राज्य का दर्जा
पहाड़ी क्षेत्र के लोगों के अधिकारों और पहचान के लिए डॉ. परमार ने 1963 से 1966 के दौरान लंबी लड़ाई लड़ी। पंजाब और शिमला पहाड़ी रियासती क्षेत्रों के हिमाचल प्रदेश के साथ विलय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। डॉ. परमार के अनवरत प्रयासों और दूरदर्शिता का ही नतीजा था कि 15 अप्रैल 1948 को पहाड़ी क्षेत्र की 30 छोटी-बड़ी रियासतों का विलय करके हिमाचल प्रदेश का गठन हो सका। 1966 में विशाल हिमाचल का गठन किया गया। परिणामस्वरूप 25 जनवरी 1971 को हिमाचल प्रदेश को देश के 18वें पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त हुआ।
आर्थिक संकट से जूझते हिमाचल को हर बाधा से निकाला बाहर
हिमाचल प्रदेश के वर्तमान स्वरूप में डॉ. परमार का बहुत बड़ा योगदान है। हिमाचल प्रदेश के गठन के समय राज्य की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, लेकिन डॉ. यशवंत सिंह परमार ने उन चुनौतियों का मजबूती से सामना किया और प्रदेश को बड़ी-बड़ी बाधाओं से बाहर निकाला।
साहित्य और शोध में भी रहा अतुलनीय योगदान
राजनीति और प्रशासन के साथ-साथ डॉ. परमार एक प्रखर लेखक और शोधकर्ता भी थे। उन्होंने हिमालयी संस्कृति, सामाजिक व्यवस्था और हिमाचल की भौगोलिक स्थिति पर कई प्रामाणिक पुस्तकें लिखीं। इनमें पॉलिऐंड्री इन द हिमालयाज, हिमाचल प्रदेश केस फॉर स्टेटहुड और हिमाचल प्रदेश एरिया एंड लैंग्वेजेस जैसी प्रमुख कृतियां शामिल हैं।
जर्मनी में सीखे गहन कृषि के कार्यक्रम
डॉ. यशवंत सिंह परमार ने इंडो-जर्मन गहन कृषि कार्यक्रम के सिलसिले में पश्चिम जर्मनी के एक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया। जर्मनी और स्विट्जरलैंड में विभिन्न जलविद्युत उत्पादन संयंत्रों का दौरा किया। गहन कृषि कार्यक्रम के संबंध में चर्चा के लिए उन्हें 1965 में फिर से जर्मनी आमंत्रित किया गया। 1971 में उन्होंने यूएसए, कनाडा, जापान, इटली, सिंगापुर, मलेशिया, लेबनान और ग्रीस का दौरा किया।
Dr Yashwant Singh Parmar: जल-जंगल-जमीन के थे पैरोकार
डॉ. परमार को हिमाचल की संस्कृति और पर्यावरण के संरक्षक के रूप में भी जाना जाता है, उन्हें पर्यावरण से बहुत लगाव था। उन्होंने प्रदेश की सबसे बड़ी सम्पदा वनों के संरक्षण को सदैव ही अधिमान दिया। डॉ. परमार ने प्रदेश को हरित राज्य बनाने का मार्ग प्रशस्त किया। डॉ. परमार प्रदेश को कृषि-बागवानी मे सिरमौर और पहाड़ो को इससे भी हरा-भरा बनाना चाहते थे, जिसके लिए उन्होने नौणी मे इन्ही विषय का विश्वविद्यालय भी स्थापित करवाया।
एक भाषण मे उन्होने कहा था ‘.. वन हमारी बहुत बड़ी संपदा है, सरमाया है। इनकी हिफाजत हर हिमाचली को हर हाल मे करनी है, नंगे पहाड़ो को हमे हरियाली की चादर ओढ़ाने का संकल्प लेना होगा। प्रत्येक व्यक्ति को एक पौधा लगाना होगा और पौधे ऐसे हो जो पशुओ को चारा दे, उनसे बालन मिले और बड़े होकर इमारती लकड़ी के साथ आमदनी भी दे। एक मंत्र और सुन ले केवल पौधा लगाने से कुछ नही होगा, उसे पालना व संभालना होगा। वनो के त्रिस्तरीय उपयोग को लेकर परमार का कहना था कि कतारो मे लगाए इमारती लकड़ी के जंगल प्रदेश के फिक्स डिपोजिट होगे। बाग-बगीचे लगाकर हम तो संपन्न हो सकते है, लेकिन वानिकी से पूरे प्रदेश मे संपन्नता आएगी।”
हिमाचल के लिए मांगी तीन प्राथमिकताएं : सड़क, सड़क और सड़क
डॉ. यशवंत सिंह परमार भविष्यद्रष्टा व्यक्तित्व के धनी थे। उनसे जब केंद्र सरकार ने पूछा कि हिमाचल के लिए उनकी तीन प्राथमिकताएं क्या-क्या हैं तो वह बोले-सड़क, सड़क और सड़क। वह मानते थे कि जब तक राज्य के गांवों की कनेक्टिविटी नहीं होगी, तब तक यहां पर विकास संभव नहीं है। यही नहीं, बाहर के लोग यहां कृषि भूमि को न खरीद पाए, इसके लिए उन्होंने भू सुधार अधिनियम बनाया और इसमें धारा 118 की बंदिश डाली। उन्होंने प्रदेश को ऊर्जा राज्य बनाने की नींव रखी।
राजनीतिक पारदर्शिता के समर्थक
संयुक्त शिक्षा निदेशक के पद से सेवानिवृत केवलराम बताते है कि अपनी नौकरी के शुरुआती दिनो मे वह ज्यूरी के माध्यमिक स्कूल मे तैनात थे और अपनी बदली करवाना चाहते थे, जिसके लिए मुख्यमंत्री के पास उनके सहयोगी रहे अपने दादा व क्षेत्र के प्रधान को लेकर गए। उन्होने सबकी पूरी सुनी और फिर बोले कि ‘अरे मुख्यमंत्री बदली नही करता है, यह तो विभाग का कार्य है, वहां निदेशक बैठे है और मै विभागीय मामलो मे हस्तक्षेप नही करता।’
पहली पत्नी का देहांत होने पर किया दूसरा विवाह
डॉ. परमार के दो विवाह हुए। उनकी पहली पत्नी चंद्रावती की मृत्यु हो गई थी, जिनसे उनके चार पुत्र हुए। ये जितेंद्र सिंह परमार, जयपाल सिंह परमार, लव परमार और कुश परमार थे। उनका दूसरा विवाह सत्यवती डांग से हुआ। सत्यवती की पहले विवाह से दो बेटियां थीं, ये उर्मिल परमार और प्रोमिला परमार थीं। कुश परमार नाहन से विधायक रह चुके हैं।
सादगी के भी थे प्रतीक
डॉ. परमार सादगी के प्रतीक थे। दूर-दराज के इलाकों में भ्रमण के दौरान एक छड़ी की मदद से अपना सामान अपनी पीठ पर ले जाते थे, जिसमें महत्वपूर्ण दस्तावेज, ग्राम होते थे। वह खाने के लिए चने और गुड़ को साथ रखते थे। वह जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल आदि के बहुत करीब थे।
निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर दूसरों के लिए संघर्ष करते रहे
डॉ. यशवंतसिंह परमार 18 वर्ष तक मुख्यमंत्री तथा 8 साल तक प्रदेश कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष रहे, परंतु उन्होंने कभी अपने पद का दुरुपयोग नहीं किया। उन्होंने अपने किसी पुत्र, पुत्री या बहुओं तथा सम्बंधियों को तनिक भी लाभ उठाने की परंपरा नहीं डाली। वे स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ऐसे दुर्लभ राजनेता थे जिन्होंने निर्धनता को चुना। सदैव निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर दूसरों के लिए संघर्ष करते रहे। इसका प्रमाण रहा, उनके अपने घर-गांव जाने का ऊबड़ खाबड़ रास्ता और खंडहर में तब्दील होता उनका अपना घर। जिसे देखकर एक बार विधायक जालिमसिंह ने उसे ठीक करवाने की बात कही तो डॉ. परमार ने उत्तर दिया–‘‘जितना वेतन मिलता है, उतने में गुजारा करता हूं, मकान की मरम्मत कहां से करवाऊं।’’
परमार की जन्मभूमि आज भी उपेक्षा का शिकार

‘चन्हालग ने तुम्हें परमार दिया, परमार ने दिया हिमाचल, अब तुम बताओ कि तुमने चन्हालग को क्या दिया’। यह सवाल इसलिए उठ रहा है, क्योंकि हिमाचल निर्माता की जन्म चन्हालग को वास्तव में कुछ नहीं मिला। यह क्षेत्र सरकार की अनदेखी का अनोखा उदहारण है। हिमाचल रूपी पौधे को रोपकर उसे पल्लवित, पुष्पित और फलित होने का स्वपन देखने वाले डॉ. यशवंत सिंह परमार ने जिस स्थान पर जन्म लिया उसकी खबर लेने वाला आज कोई नहीं है। हर वर्ष 4 अगस्त डॉ. परमार जयंती पर जिला सिरमौर सहित प्रदेश में जगह-जगह सरकारी व गैर सरकारी आयोजन होते हैं। राजनेता उनके कसीदे पढ़ते है, मगर उन पर अमल नहीं होता।
”आज हम अपने अहद के खाके बनाकर छोड़ जाएंगे।
देखना कल हमारे बाद इनमे कोई रंग भर ही देगा।”
दो मई 1981 को इस महान जननायक ने दुनिया से अलविदा कहा, लेकिन उनके विचार और हिमाचल के विकास में दिया गया योगदान आज भी हर प्रदेशवासी के दिल में अमर है। हिमाचलवासियों के लिए अपनी ईमानदारी, लगन, निष्ठा, अथक परिश्रम और पवित्र सेवाभाव से एकत्र की हुई अकूत सार्वजनिक विरासत छोड़कर इस दुनिया को अलविदा कहने वाले डॉ. परमार के बैंक खाते में मात्र 563 रु 30 पैसे थे। अपने जीवनकाल में उन्होंने हिमाचल को एकीकृत करने, सजाने-संवारने और उन्नत करने की दिशा में जो भी प्रयत्न किये, उनकी प्रशंसा न केवल हिमाचल में बल्कि सारे भारत में हुई। यह उनके सेवाभाव, कर्मनिष्ठा, लगन, तप-त्याग तथा ईमानदारी की मिशाल है।
हिमाचल के अधिकारों के संरक्षण के लिए आज भी हर हिमाचली इन्हें सच्चे दिल से याद करता है।
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