Himachal Pradesh University: Shimla
कल्पना कीजिए….1970 का एक साल, हाथ में गिनती की इमारतें, मुट्ठी भर छात्र, और सिर्फ कानून जैसे इक्का-दुक्का विभाग। यहीं से शुरू हुई थी एक ऐसी यात्रा, जो आज हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (एचपीयू) को प्रदेश की सबसे बड़ी शैक्षणिक पहचान बना चुकी है। 22 जुलाई 1970 को तत्कालीन मुख्यमंत्री डा. यशवंत सिंह परमार ने जिस विश्वविद्यालय की नींव रखी थी, वह आज 56 वर्ष पूरे कर 57वें वर्ष में कदम रख चुका है।
देवदार के घने पेड़ों के बीच बसा यह कैंपस सिर्फ एक शिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि पहाड़ के हर उस छात्र की उम्मीद रहा है, जिसने भौगोलिक रूप से मुश्किल इस प्रदेश में उच्च शिक्षा का सपना देखा। और नतीजा सबके सामने है — नैक से ए प्लस ग्रेड, दो दर्जन से ज्यादा इमारतें, और एक ऐसी विरासत जिसमें राजनेता, जज, अभिनेता और यहां तक कि एक विदेशी राष्ट्रपति तक शामिल हैं।
57वें वर्ष में कदम रखते ही एचपीयू के सामने चुनौतियां भी हैं और संभावनाएं भी। घणाहट्टी का नया कैंपस, बढ़ती सीटें और डिजिटल सुविधाएं, यह विश्वविद्यालय एक नई पारी की तैयारी में जुटा दिख रहा है, जिसकी नींव उसी विरासत पर टिकी है, जो उसने पिछले 56 वर्षों में गढ़ी है।

जब आईएएस अधिकारी संभालते थे कुलपति की कुर्सी
एचपीयू के शुरुआती दिनों में वीसी की कुर्सी पर कोई एकेडमिशियन नहीं, बल्कि आईएएस अधिकारी बैठते थे। आरके सिंह विश्वविद्यालय के पहले वीसी बने। बाद में यह परंपरा बदली और एकेडमिक स्टाफ के प्रोफेसरों को यह जिम्मेदारी सौंपी जाने लगी। मौजूदा समय में हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सत प्रकाश बंसल एचपीयू की कमान संभाल रहे हैं। उनसे पहले सिकंदर कुमार यह जिम्मेदारी निभा रहे थे, जो अब राज्यसभा पहुंच चुके हैं।

मुट्ठी भर इमारतों से आधुनिक कैंपस तक का सफर
1970 में जब विश्वविद्यालय शुरू हुआ, तब न पर्याप्त इमारतें थीं, न फैकल्टी और न ही छात्रों की भीड़। सीमित विभागों के साथ शुरू हुआ यह सफर आज कहां पहुंच चुका है — इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अब घणाहट्टी में एचपीयू का बिल्कुल नया, आधुनिक कैंपस बनकर तैयार होने वाला है। बढ़ते छात्रों की संख्या को देखते हुए खासकर व्यावसायिक विभागों में सीटें दोगुनी की जा चुकी हैं। नए छात्रावास, पोर्टर हिल शिमला के पास इनडोर स्टेडियम और फिटनेस सेंटर — एचपीयू प्रशासन की भविष्य की योजनाओं की फेहरिस्त लंबी है।

अब हर काम एक क्लिक पर
डिजिटलाइजेशन की इस लहर में एचपीयू भी पीछे नहीं रहा। परीक्षा फॉर्म से लेकर एडमिशन और फीस भुगतान तक सब कुछ अब ऑनलाइन हो चुका है, जिसने छात्रों के लिए प्रक्रिया को पहले से कहीं आसान बना दिया है।
जब एक अफगान छात्र बना राष्ट्रपति
एचपीयू के इतिहास का सबसे चौंकाने वाला अध्याय शायद यही है- अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई ने 1983 में यहीं से पॉलिटिकल साइंस में मास्टर्स और 2003 में लिटरेचर में पीएचडी की। एक हिमाचली विश्वविद्यालय के गलियारों से निकलकर काबुल की सत्ता तक पहुंचने की यह कहानी अपने आप में मिसाल है। इसके अलावा नेपाली कांग्रेस की सदस्य आरजु राणा देउवा और केंद्रीय तिब्बती प्रशासन में वित्त मंत्री त्सेरिंग थोंडुप भी इसी कैंपस के छात्र रह चुके हैं।

राजनीति से न्यायपालिका तक, हर क्षेत्र में एचपीयू की छाप
देश की राजनीति में एचपीयू के छात्रों का दबदबा किसी परिचय का मोहताज नहीं। केंद्रीय मंत्री जगत प्रकाश नड्डा, पूर्व केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा, हिमाचल के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू, नागालैंड के पूर्व राज्यपाल अश्विनी कुमार, राज्यसभा सांसद इंदू गोस्वामी, पूर्व केंद्रीय मंत्री सिंघी राम और राम लाल ठाकुर, तथा भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष व वर्तमान सांसद सुरेश कश्यप, इन सबकी शुरुआती पढ़ाई इसी कैंपस से हुई। न्यायपालिका में भी एचपीयू के छात्रों ने बड़ा नाम कमाया है। त्रिपुरा उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजय करोल, पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश राजीव शर्मा और लोकपाल समिति की न्यायिक सदस्य अभिलाषा कुमारी, ये सभी नाम एचपीयू की शैक्षणिक गुणवत्ता की गवाही देते हैं।

अनुपम खेर से मोहित चौहान तक, बॉलीवुड और मेडिसिन में भी परचम
सिर्फ राजनीति और न्यायपालिका ही नहीं, एचपीयू ने मनोरंजन और चिकित्सा जगत को भी बड़े नाम दिए हैं। एम्स दिल्ली के पूर्व निदेशक रणदीप गुलेरिया, बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता अनुपम खेर और मशहूर गायक मोहित चौहान, तीनों इसी विश्वविद्यालय की देन हैं।

छात्र संगठनों की टकराहट से लेकर सुर्खियों तक
एचपीयू का सफर हमेशा शांत नहीं रहा। प्रदेश की राजनीति और छात्र संगठनों के बीच तीखी झड़पों ने भी इसे समय-समय पर सुर्खियों में रखा। लेकिन इन उतार-चढ़ावों के बावजूद, देवदार के पेड़ों के बीच बसा यह कैंपस आज भी उतना ही आकर्षक है, इतना कि यहां आने वाला हर छात्र या व्यक्ति वापस लौटने का मन नहीं बना पाता।
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