Himachal Tourism Ecological Crisis: हिमाचल प्रदेश, जिसे कभी असीम शांति, नैसर्गिक सौंदर्य और आध्यात्मिक चेतना का पावन प्रतीक माना जाता था, आज अनियंत्रित पर्यटन और प्रशासनिक अदूरदर्शिता के कारण एक भयावह पारिस्थितिक संकट के मुहाने पर खड़ा है। हर साल लाखों सैलानियों का देवभूमि की ओर रुख करना राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए तात्कालिक रूप से संतोषजनक संकेत हो सकता है, लेकिन इसके पीछे छिपी गंभीर जमीनी हकीकत और नीतिगत बेरुखी अत्यंत चिंताजनक है। प्रकृति के शाश्वत नियमों के साथ खिलवाड़ और ‘टूरिज्म’ के नाम पर कंक्रीट के जंगलों का अनवरत निर्माण अब इस खूबसूरत पहाड़ी राज्य के लिए एक अभिशाप बनता जा रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में हिमाचल प्रदेश ने जिन भीषण प्राकृतिक विभीषिकाओं और त्रासदियों को झेला है, वे केवल प्राकृतिक आपदाएं नहीं थीं, बल्कि बड़े पैमाने पर मानव-निर्मित थीं। शिमला, मनाली, डलहौजी और धर्मशाला जैसे प्रमुख पर्यटन केंद्रों में बिना किसी वैज्ञानिक और भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण के पहाड़ों को बेदर्दी से काटा जा रहा है। बहुमंजिला होटलों और व्यावसायिक परिसरों का निर्माण धड़ल्ले से जारी है, और नदियों के प्राकृतिक प्रवाह क्षेत्रों पर अवैध कब्जे कर लिए गए हैं।
मानसून के समय आने वाली विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन अब कोई अप्रत्याशित घटनाएं नहीं रह गई हैं। ब्यास, रावी और सतलुज जैसी नदियों के उफान में गगनचुंबी होटलों और सैकड़ों गाड़ियों का तिनके की तरह बह जाना इस बात का जीवंत प्रमाण है कि हमने प्रकृति की सहनशीलता और वहन क्षमता की हर सीमा को पार कर दिया है। आर्थिक लाभ की अंधी दौड़ में पहाड़ों की भूगर्भीय संवेदनशीलता को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है।
इस पूरे संकट का सबसे दुखद पहलू शासन और प्रशासन का अत्यंत उदासीन रवैया है। सरकारें अक्सर आपदा के घटित हो जाने के बाद ‘राहत पैकेज’ और ‘पुनर्वास’ की लोकलुभावन घोषणाएं तो करती हैं, लेकिन मूल समस्या को समूल नष्ट करने के लिए किसी दीर्घकालिक, टिकाऊ और प्रभावी नीति बनाने में पूरी तरह विफल रही हैं। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के पर्यावरण संबंधी दिशानिर्देशों और निर्माण नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, और प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है।
बुनियादी ढांचे की विफलता का आलम यह है कि पर्यटन सीजन के दौरान शिमला या मनाली की संकरी पहाड़ी सड़कों पर घंटों लंबा ट्रैफिक जाम लगना एक स्थाई नियति बन चुका है। वाहनों के इस अत्यधिक दबाव से कार्बन उत्सर्जन और प्रदूषण का स्तर खतरनाक रूप से बढ़ रहा है, जिससे संवेदनशील ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इसके अतिरिक्त, पहाड़ों में प्लास्टिक और ठोस कचरे का जो अंबार लग रहा है, उसने स्थानीय जल स्रोतों को दूषित कर दिया है और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को चरमरा कर रख दिया है।
वर्तमान नीतियां स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं कि सरकार का पूरा ध्यान केवल इस बात पर केंद्रित है कि पर्यटन क्षेत्र से कितना अधिक राजस्व वसूला जा सकता है। पर्यटकों की संख्या बढ़ाने के लिए, बुनियादी ढांचे को पर्यावरण-अनुकूल बनाए बिना ही, प्रचार-प्रसार पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिए जाते हैं। परंतु यक्ष प्रश्न यह है कि यदि ये संवेदनशील पहाड़ और नदियां ही सुरक्षित नहीं रहेंगी, तो यह पर्यटन और इससे मिलने वाला राजस्व कितने समय तक टिक पाएगा? आर्थिक लाभ के चक्रव्यूह में हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को दांव पर लगा रहे हैं।
हिमाचल प्रदेश को विनाश के कगार से बचाने के लिए अब केवल कागजी दावों और बैठकों से आगे बढ़कर जमीन पर कठोर कदम उठाने होंगे। सरकार को अपनी बेरुखी छोड़नी होगी और केदारनाथ जैसी किसी और भीषण त्रासदी का इंतजार करने के बजाय अभी से नीतिगत बदलाव करने होंगे।
सबसे पहले प्रमुख पर्यटन स्थलों की वहन क्षमता का वैज्ञानिक मूल्यांकन कर सैलानियों और वाहनों की संख्या की एक तार्किक सीमा तय करनी होगी। नदियों के किनारों पर और तीव्र ढलानों पर होने वाले अवैध निर्माणों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना होगा। समय आ गया है कि सरकार ‘मास टूरिज्म’ के बजाय ‘इको-टूरिज्म’ और नियंत्रित पर्यटन को सख्ती से लागू करे। यदि अब भी नीति-नियंता और समाज अपनी गहरी नींद से नहीं जागे, तो देवभूमि को मरुभूमि और मलबे के ढेर में तब्दील होने से कोई नहीं बचा पाएगा। प्रकृति का धैर्य समाप्त हो रहा है, और यह चेतावनी अंतिम है।
आलम पोर्ले
लेखक: हिमाचल न्यूज के संपादक हैं।

