20 July in History: ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार वर्ष का 201वां दिन (लीप वर्ष में 202वां दिन) है। साल में अभी और 164 दिन शेष हैं। भारत और विश्व इतिहास में 20 जुलाई का खास महत्व है, क्योंकि इस दिन कई महत्वपूर्ण घटनाएं घटी जो इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज होकर रह गईं हैं।
आज का इतिहास में जानिए आज के दिन जन्मे चर्चित व्यक्ति, प्रसिद्ध व्यक्तियों के निधन, युद्ध संधि, किसी देश की आजादी, नई तकनिकी का अविष्कार, सत्ता का बदलना, महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दिवस के बारे में। आईए हिमाचल न्यूज़ में पढ़ें भारत और विश्व इतिहास के पन्नों में दर्ज 20 जुलाई का इतिहास एवं घटनाक्रम।
20 जुलाई 1905: इतिहास का वो काला फरमान
जब कर्जन की ‘काली लकीर’ से टकराया क्रांति का सैलाब: बंगाल विभाजन की वो खौफनाक दास्तान
20 जुलाई 1905… ब्रिटिश हुकूमत के सबसे शातिर चेहरों में से एक, लॉर्ड कर्जन ने एक ऐसा फरमान सुनाया जिसने पूरे हिंदुस्तान के सीने में आग लगा दी। यह फरमान था विशाल बंगाल का विभाजन। दिखने में यह सिर्फ कागजों पर खिंची एक प्रशासनिक लकीर थी, लेकिन परदे के पीछे छिपा था भारत की आत्मा को लहूलुहान करने का एक खौफनाक मंसूबा। यह इतिहास की वो तारीख थी, जब अंग्रेजों ने देश की सबसे बड़ी ताकत यानी ‘हिंदू-मुस्लिम एकता’ की जड़ पर सीधा और सबसे क्रूर वार किया था।
उस दौर का बंगाल कोई छोटा-मोटा सूबा नहीं था। आज का पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिशा, असम और पूरा बांग्लादेश मिलकर तब का ‘महा-बंगाल’ बनता था। क्षेत्रफल में यह फ्रांस जितना बड़ा था और आबादी के लिहाज से एक बड़े उपमहाद्वीप जैसा। अंग्रेजों ने दुनिया के सामने यह दलील दी कि इतने विशाल भूभाग को संभालना उनके बस की बात नहीं है, कानून-व्यवस्था ठप हो रही है और वे यह फैसला सिर्फ प्रशासनिक सुधार के लिए बेहद मजबूरी में ले रहे हैं।
लेकिन यह सिर्फ एक सफेद झूठ था, जिसके पीछे एक बेहद खतरनाक चाल चल रही थी। असल में, बंगाल उस वक्त हिंदुस्तानी राष्ट्रवाद, बुद्धिजीवियों और क्रांतिकारियों का सबसे बड़ा गढ़ बन चुका था। आजादी की जो चिंगारियां पूरे देश को जगा रही थीं, उनका केंद्र यही बंगाल था। लॉर्ड कर्जन इसी उभरती हुई राष्ट्रभक्ति और आजादी की चेतना को हमेशा के लिए कुचल देना चाहता था।
लॉर्ड कर्जन ने बड़ी चालाकी से नक्शे पर विभाजन की ऐसी लकीर खींची जो सीधे धर्म के आधार पर आबादी को काटती थी। उसने मुस्लिम बहुल पूर्वी हिस्से को असम के साथ मिलाकर एक नया प्रांत बना दिया, जिसका मुख्यालय ढाका को चुना गया। दूसरी तरफ, हिंदू बहुल पश्चिमी हिस्से को अलग कर उसे पश्चिम बंगाल का नाम दे दिया गया, जिसका केंद्र कलकत्ता बना रहा।
इस क्रूर गणित का एकमात्र मकसद दोनों ही प्रांतों में धर्म के आधार पर बहुसंख्यकों और अल्पसंख्यकों की नई दीवारें खड़ी करना था। यह अंग्रेजों की कुख्यात फूट डालो और राज करो की नीति का सबसे वीभत्स रूप था। वे समझ चुके थे कि जब तक हिंदू और मुसलमान एक होकर लड़ेंगे, तब तक ब्रिटिश साम्राज्य की नींव सुरक्षित नहीं है। इसलिए उन्होंने इस एकता की रीढ़ पर ही वार कर दिया।
लॉर्ड कर्जन को लगा था कि बंदूक और सत्ता के दम पर वह जनभावनाओं को कुचल देगा, लेकिन उसे अंदाजा नहीं था कि उसने सोते हुए शेर को जगा दिया है। 20 जुलाई को हुई इस घोषणा की खबर फैलते ही पूरा देश एक सुर में चीख उठा। देश के कोने-कोने में विरोध की ऐसी लहर उठी जिसने ब्रिटिश हुकूमत के पैर उखाड़ दिए।
कांग्रेस के नेतृत्व में ऐतिहासिक स्वदेशी आंदोलन का शंखनाद हुआ। विदेशी सामानों के बहिष्कार का यह आंदोलन इतना आक्रामक था कि पूरे देश में मैनचेस्टर के कपड़ों और ब्रिटिश सामानों को चौराहों पर इकट्ठा करके उनकी होली जलाई जाने लगी। इसी दौर में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के भीतर का राष्ट्रभक्त जाग उठा। उन्होंने इस ऐतिहासिक दंश और नाइंसाफी के खिलाफ ‘आमार शोनार बांग्ला’ गीत लिखा, जिसकी एक-एक पंक्ति ने लोगों की रगों में देशभक्ति का खून दौड़ा दिया। यह गीत आगे चलकर बांग्लादेश का राष्ट्रगान बना।
इस घोषणा के करीब 3 महीने बाद, 16 अक्टूबर 1905 को विभाजन का यह काला कानून जबरन लागू कर दिया गया। लेकिन अंग्रेजों की लाठियां और बंदूकें हिंदुस्तानियों के हौसले को डिगा नहीं सकीं। पूरे देश ने इस दिन को घुटने टेक कर नहीं, बल्कि एक ‘राष्ट्रीय शोक दिवस’ के रूप में मनाकर अपना कड़ा प्रतिरोध दर्ज कराया।
विभाजन के उस काले दिन की सुबह बंगाल के किसी भी घर में चूल्हा नहीं जला। लाखों लोग नंगे पैर सड़कों पर उतर आए, गंगा के पवित्र जल में डुबकी लगाई और वंदे मातरम के नारों से आसमान गुंजा दिया। अंग्रेजों की इस बांटने वाली नीति के सीने पर सबसे बड़ा प्रहार तब हुआ, जब धर्म की दीवारों को तोड़कर हिंदुओं और मुसलमानों ने एक-दूसरे की कलाइयों पर राखियां बांधीं। उन्होंने पूरी दुनिया को दिखा दिया कि लाट साहब जमीन पर चाहे जितनी लकीरें खींच लें, वे भारतीय दिलों को कभी नहीं बांट सकते।
लॉर्ड कर्जन ने अपने अहंकार में बंगाल का बंटवारा तो कर दिया, लेकिन वह यह नहीं देख पाया कि इसी विभाजन ने उस बारूद में आग लगा दी थी, जिसने आगे चलकर 1947 में ब्रिटिश साम्राज्य को हमेशा के लिए खाक कर दिया। यह सिर्फ एक प्रांत का बंटवारा नहीं था, बल्कि यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की वो सिंहगर्जना थी जिसने अंग्रेजी हुकूमत के अंत की उल्टी गिनती शुरू कर दी थी।
1969: जब चांद पर पड़े इंसान के कदम, नील आर्मस्ट्रांग की वो ऐतिहासिक छलांग, जिसने बदल दी दुनिया की किस्मत
20 जुलाई 1969… यह इंसानी इतिहास की वो तारीख है, जब नामुमकिन शब्द हमेशा-हमेशा के लिए मिट गया। करोड़ों मील दूर, रात के सन्नाटे में चमकते चांद की छाती पर जब पहली बार किसी इंसान के कदम पड़े, तो पूरी दुनिया की धड़कनें थम गईं। अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रांग ने धूल और गड्ढों से भरी उस अनजानी दुनिया की सतह पर अपना बायां पैर रखा और एक ऐसा इतिहास लिख दिया, जो सदियों तक इंसानी जज्बे की कहानी सुनाता रहेगा।
इस महा-मिशन की शुरुआत हुई थी 16 जुलाई को, जब ‘अपोलो-11’ अंतरिक्ष यान तीन जांबाज यात्रियों को लेकर सैटर्न-5 रॉकेट के सहारे बादलों को चीरता हुआ अंतरिक्ष की ओर रवाना हुआ। सफर बेहद जोखिम भरा था और हर पल मौत का साया मंडरा रहा था। चार दिनों की अंतहीन और खौफनाक यात्रा के बाद, जब यान का लूनर मॉड्यूल ‘ईगल’ चांद की सतह पर उतरा, तो नील आर्मस्ट्रांग ने कैनेडी स्पेस सेंटर को एक संदेश भेजा… “द ईगल हैज़ लैंडेड… यानी हम लैंड कर चुके हैं!”
इस एक छोटे से संदेश ने धरती पर बैठे वैज्ञानिकों और करोड़ों लोगों को खुशियों से सराबोर कर दिया।
जैसे ही नील आर्मस्ट्रांग ने ईगल यान की सीढ़ियों से नीचे उतरकर चांद की सूनी और ठंडी जमीं पर अपना पहला कदम रखा, उनके मुंह से निकले शब्द हमेशा के लिए अमर हो गए। उन्होंने कहा था, “एक इंसान के लिए यह एक छोटा सा कदम है, लेकिन पूरी मानव जाति के लिए यह एक बहुत बड़ी छलांग है।”
यह सिर्फ एक बयान नहीं था, बल्कि इंसानी हौसले की वो दहाड़ थी जिसने साबित कर दिया कि इंसान अगर ठान ले, तो वह सितारों को भी छू सकता है।
नील आर्मस्ट्रांग अकेले नहीं थे। कुछ ही मिनटों बाद उनके साथी अंतरिक्ष यात्री बज एल्ड्रिन भी यान से बाहर आ गए। दोनों ने चांद की रहस्यमयी और मखमली धूल पर करीब ढाई घंटे बिताए। इस दौरान उन्होंने वहां अमेरिका का झंडा गाड़ा, तस्वीरें लीं, चांद की मिट्टी और पत्थरों के नमूने इकट्ठा किए और कुछ बेहद जरूरी वैज्ञानिक प्रयोगों को अंजाम दिया। चांद पर बिताया गया वह एक-एक पल इंसानी इतिहास के सबसे कीमती पन्नों में दर्ज हो रहा था।
अपना काम पूरा करने के बाद, ये जांबाज अंतरिक्ष यात्री वापस अपने यान की ओर बढ़े। 24 जुलाई 1969 को नील आर्मस्ट्रांग और उनकी टीम प्रशांत महासागर में सुरक्षित लैंड कर गई। धरती पर लौटते ही वे सिर्फ वैज्ञानिक नहीं रह गए थे, बल्कि वे पूरी दुनिया के सबसे बड़े नायक बन चुके थे। इस मिशन ने इंसानों को एक नया हौसला दिया कि हमारे लिए अब ब्रह्मांड का कोई भी कोना दूर नहीं है।
1809: ज्वालामुखी की ऐतिहासिक संधि
एक किला, 66 गांव और महाराजा रणजीत सिंह का वादा… जब ‘ज्वालामुखी की संधि’ ने बदल डाला हिमाचल का पूरा इतिहास!
हिमाचल के इतिहास में 20 जुलाई का दिन बेहद निर्णायक माना जाता है। 20 जुलाई 1809 को कांगड़ा के राजा संसार चंद द्वितीय और पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह के बीच ऐतिहासिक ‘ज्वालामुखी की संधि’ पर हस्ताक्षर किए गए थे।
20 जुलाई 1809 को ज्वालामुखी के पवित्र मंदिर परिसर की छत्रछाया में दोनों महान शासक आमने-सामने बैठे। राजा संसार चंद को अपनी सल्तनत बचानी थी और महाराजा रणजीत सिंह को पहाड़ी क्षेत्रों में सिखों का परचम लहराना था। दोनों के बीच एक ऐसा समझौता हुआ जिसने इतिहास रच दिया।
इस संधि की शर्तें बेहद कड़क और ऐतिहासिक थीं कि महाराजा रणजीत सिंह अपनी अजेय सिख फौज को गोरखाओं को खदेड़ने के लिए कांगड़ा भेजेंगे। इस मदद के बदले में, राजा संसार चंद को सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण कांगड़ा का अभेद्य किला और उसके आसपास के 66 गांव हमेशा के लिए सिख साम्राज्य को सौंपने होंगे।
संधि पर मुहर लगते ही महाराजा रणजीत सिंह ने अपने सबसे भरोसेमंद और वीर सेनापति दीवान मोहकम चंद के नेतृत्व में एक विशाल सिख सेना को कांगड़ा की तरफ रवाना कर दिया। कांगड़ा की पहाड़ियों में सिखों और गोरखाओं के बीच एक भयानक और रक्तपात से भरी जंग हुई।
दीवान मोहकम चंद की युद्ध रणनीति के आगे अमर सिंह थापा के जांबाज गोरखा टिक नहीं पाए। सिखों ने गोरखा सेना को ऐसा खदेड़ा कि अमर सिंह थापा को भारी नुकसान के साथ पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा। महाराजा रणजीत सिंह की सेना ने कांगड़ा किले पर अपना नियंत्रण स्थापित किया था।
देश-विदेश में 20 जुलाई को इन घटनाओं के लिए भी याद किया जाता है
1296: जलालुद्दीन खिलजी की हत्या के बाद अलाउद्दीन खिलजी ने खुद को दिल्ली का शासक घोषित किया।
1761: माधव राव प्रथम पेशवा बने।
1807: फ्रांस में साओन नदी पर एक नाव अपस्ट्रीम को सफलतापूर्वक शक्ति देने के बाद, निकेफोरेस नीएपा को नेपोलियन बोनापार्ट द्वारा पाइरोलोफोरे के लिए पेटेंट दिया गया, यह दुनिया का पहला आंतरिक दहन इंजन था।
1810: कोलंबिया ने स्पेन से अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की, लेकिन यह एक लंबी लड़ाई की शुरुआत थी। वास्तविक और स्थायी स्वतंत्रता उन्हें 7 अगस्त 1819 को ‘बोयाका की लड़ाई’ जीतने के बाद ही मिली।
1847: जर्मनी के खगोलशास्त्री थियोडोर ने धूमकेतु ब्रोरसेन-मेटकॉफ की खोज की।
1885: ब्रिटेन ने पेशेवर फुटबॉल को वैध कर दिया। इससे पहले, खिलाड़ियों को वेतन देने पर प्रतिबंध था, लेकिन इस ऐतिहासिक फैसले के बाद खिलाड़ियों को पैसे लेकर खेलने की अनुमति मिल गई।
1903: फोर्ड मोटर कंपनी ने अपनी पहली कार बाजार में उतारी।
1944: अमेरिका ने जापान के कब्जे वाले गुआम पर हमला किया।
1944: जर्मनी में 20 जुलाई की साज़िश के तहत क्लॉस फ़ॉन स्टॉफ़ेनबर्ग ने एडोल्फ हिटलर की हत्या का असफल प्रयास किया।
1951: जॉर्डन के पहले राजा, किंग अब्दुल्ला प्रथम, की यरुशलम स्थित अल-अक्सा मस्जिद में एक फिलिस्तीनी राष्ट्रवादी द्वारा गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस घटना के बाद उनके बेटे तलाल राजा बने।
1960: सिलॉन (अब श्रीलंका) की प्रधानमंत्री सिरिमावो भंडारनायके विश्व की प्रथम महिला प्रधानमंत्री निर्वाचित हुई।
1968: शिकागो में पहली बार इंटरनेशनल स्पेशल ओलिंपिक खेलों का आयोजन हुआ।
1969: भारत सरकार ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण संबंधी अध्यादेश को लागू किया। इसकी घोषणा 19 जुलाई को की गई थी और 20 जुलाई से यह प्रभावी हुआ।
1976: अमेरिका का वाइकिंग मंगल की सतह पर उतरा। मंगल ग्रह पर किसी स्पेसक्राफ्ट की ये पहली लैंडिंग थी।
1989: वर्मा (म्यांमार) की सेना समर्थित सरकार ने विपक्षी नेता आंग सांग सूकी को उनके घर में कैद कर दिया। वे पिछले 20 वर्षों में लगभग 14 वर्ष गृह कैद रही हैं।
1997: तीस्ता नदी जल बंटवारे पर भारत-बांग्लादेश में समझौता हुआ।
1999: स्पेन में प्रथम बौद्ध स्तूप का उद्घाटन।
2001: लंदन स्टॉक एक्सचेंज ने अपनी द्विशताब्दी (200 साल पूरे होने) के वर्ष में लंदन स्टॉक एक्सचेंज पीएलसी नामक एक सार्वजनिक कंपनी का रूप ले लिया।
2005: कनाडा में समलैंगिक विवाह को कानूनी मंजूरी मिली। ऐसा करने वाला कनाडा दुनिया का चौथा देश बना।
2017: रामनाथ कोविन्द, भारत के 14वें राष्ट्रपति निर्वाचित हुए।
2020: उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम-2019 लागू। इसके तहत ग्राहकों के अधिकारों की रक्षा के लिए ‘केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण’ (CCPA) की स्थापना की गई है।
2020: भारत की स्वदेशी कोविड-19 वैक्सीन, कोवैक्सिन के इंसानी परीक्षण को भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद और भारत बायोटेक ने मिलकर सफलतापूर्वक पूरा किया था। ट्रायल के दौरान पाए गए आंकड़ों के आधार पर इसे विश्व स्वास्थ्य संगठन से आपातकालीन उपयोग की मंजूरी मिली थी।
20 जुलाई को जन्मे प्रमुख व्यक्ति
356 ईसा पूर्व: सिकंदर – मेसेडोनिया का ग्रीक शासक था। इतिहास में वह सबसे कुशल और यशस्वी सेनापति माना गया है।
1919: सर एडमंड हिलेरी – न्यूज़ीलैंड के पर्वतारोही, जिन्होंने तेनजिंग नोर्गे के साथ पहली बार माउंट एवरेस्ट पर सफल आरोहण किया।
1811: लॉर्ड एल्गिन प्रथम- 1862 से 1863 तक भारत के वायसराय और गवर्नर-जनरल रहे।
1920: ग़ुलाम मोहम्मद शाह – जम्मू और कश्मीर के भूतपूर्व आठवें मुख्यमंत्री थे।
1820: गणेश वासुदेव जोशी – सार्वजनिक कार्यकर्ता।
1921: सामता प्रसाद – प्रसिद्ध भारतीय शास्त्रीय संगीतकार तथा तबला वादक थे।
1929: राजेंद्र कुमार – हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध सदाबहार अभिनेता।
1950: नसीरुद्दीन शाह – हिन्दी सिनेमा और रंगमंच के दिग्गज अभिनेता, पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित।
1969: कलिखो पुल – अरुणाचल प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री थे।
20 जुलाई को हुए प्रमुख निधन
1866: बरनार्ड रीमैन – जर्मनी के गणितज्ञ।
1914: बालकृष्ण भट्ट – आधुनिक हिन्दी साहित्य के शीर्ष निर्माता।
1922: चन्द्रनाथ शर्मा – असम राज्य के प्रथम असहयोगी और असम में कांग्रेस के संस्थापक।
1937: गुग्लिएल्मो मारकोनी– इटली के प्रसिद्ध आविष्कारक और भौतिक विज्ञानी, जिन्हें रेडियो (वायरलेस टेलीग्राफी) के आविष्कार के लिए जाना जाता है।
1965: बटुकेश्वर दत्त – महान स्वतंत्रता सेनानी, जिन्होंने भगत सिंह के साथ 1929 में केंद्रीय विधानसभा में बम फेंककर ब्रिटिश शासन का विरोध किया।
1966: अन्ना चांडी – भारत की पहली महिला न्यायाधीश थीं।
1972: गीता दत्त – हिन्दी और बांग्ला सिनेमा की प्रसिद्ध पार्श्व गायिका, जिनकी आवाज़ भारतीय फिल्म संगीत की अमूल्य धरोहर मानी जाती है।
1973: ब्रूस ली – विश्वविख्यात मार्शल आर्टिस्ट, अभिनेता, निर्देशक और जीट क्वींडो मार्शल आर्ट आंदोलन के संस्थापक।
1982: मीरा बेन – एक ब्रिटिश सैन्य अधिकारी की पुत्री, जिन्होंने ‘भारतीय स्वतंत्रता संग्राम’ में महात्मा गाँधी के सिद्धांतों से प्रभावित होकर खादी का प्रचार किया।
1989: च. छुंगा – मिजोरम के पहले मुख्यमंत्री।
2019: शीला दीक्षित – केरल की पूर्व राज्यपाल एवं दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री।
20 जुलाई के महत्त्वपूर्ण अवसर एवं उत्सव
अंतरराष्ट्रीय चंद्र दिवस
20 जुलाई को प्रतिवर्ष अंतरराष्ट्रीय चंद्र दिवस (International Moon Day) मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2021 में इस दिवस को घोषित किया। यह दिवस 20 जुलाई 1969 को अपोलो-11 के चंद्रमा पर सफलतापूर्वक उतरने की ऐतिहासिक उपलब्धि की स्मृति में मनाया जाता है। इसका उद्देश्य चंद्र अन्वेषण, अंतरिक्ष विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना है।
विश्व शतरंज दिवस
प्रतिवर्ष 20 जुलाई को विश्व शतरंज दिवस (International Chess Day) मनाया जाता है। इसी दिन 1924 में अंतरराष्ट्रीय शतरंज महासंघ (FIDE) की स्थापना पेरिस में हुई थी। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2019 में इस दिवस को आधिकारिक मान्यता दी। इसका उद्देश्य शतरंज के माध्यम से शिक्षा, रचनात्मकता, रणनीतिक सोच और वैश्विक मित्रता को बढ़ावा देना है।
प्रस्तुति
हिमाचल न्यूज़ रिसर्च डेस्क
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