22 July in History: ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार वर्ष का 203वां दिन (लीप वर्ष में 204वां दिन) है। साल में अभी और 162 दिन शेष हैं। भारत और विश्व इतिहास में 22 जुलाई का खास महत्व है, क्योंकि इस दिन कई महत्वपूर्ण घटनाएं घटी जो इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज होकर रह गईं हैं।
आज का इतिहास में जानिए आज के दिन जन्मे चर्चित व्यक्ति, प्रसिद्ध व्यक्तियों के निधन, युद्ध संधि, किसी देश की आजादी, नई तकनिकी का अविष्कार, सत्ता का बदलना, महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दिवस के बारे में। आईए हिमाचल न्यूज़ में पढ़ें भारत और विश्व इतिहास के पन्नों में दर्ज 22 जुलाई का इतिहास एवं घटनाक्रम।
22 जुलाई 1947: वो तारीख जिसने हर भारतीय को दिया तिरंगे का गौरव
चरखे से ‘अशोक चक्र’ तक, विवादों और समझौतों से तपकर ऐसे तैयार हुआ हमारा राष्ट्रध्वज
भारत के आन-बान-शान के प्रतीक, तिरंगे के जन्म की कहानी किसी ऐतिहासिक थ्रिलर से कम नहीं है।
22 जुलाई 1947 की वह ऐतिहासिक दोपहर… दिल्ली का ऐतिहासिक कॉन्स्टिट्यूशन हॉल खचाखच भरा हुआ था। देश की आजादी का काउंटडाउन शुरू हो चुका था और हर किसी की धड़कनें तेज थीं। तभी पंडित जवाहरलाल नेहरू मंच पर आए और आजाद भारत के एक नए संकल्प, एक नए प्रतीक—’तिरंगे’ को अपनाने का प्रस्ताव रखा। हॉल में गहन बहस और गंभीर मंथन के बाद, इसी दिन संविधान सभा ने सर्वसम्मति से भारत के राष्ट्रध्वज को आधिकारिक मंजूरी दे दी।
इस तिरंगे को तराशने का श्रेय जाता है वीर स्वतंत्रता सेनानी पिंगली वेंकैया को। शुरुआत में, वेंकैया जी ने जो ध्वज डिजाइन किया था, उसमें मुख्य रूप से दो ही रंग थे लाल और हरा, जो उस समय देश के दो बड़े धार्मिक समुदायों को दर्शाते थे। साल 1921 में जब पिंगली वेंकैया महात्मा गांधी से मिले, तो बापू ने इसमें एक क्रांतिकारी बदलाव का सुझाव दिया। उन्होंने देश के बाकी सभी धर्मों और समुदायों को प्रतिनिधित्व देने के लिए इसमें सफेद पट्टी जोड़ने और आत्मनिर्भरता व स्वदेशी आंदोलन के प्रतीक के रूप में केंद्र में चरखा लगाने की सलाह दी।
यह ध्वज क्रांति की मशाल बन चुका था। 1923 में नागपुर के एक शांतिपूर्ण आंदोलन में हजारों देशभक्तों ने इसे थामकर ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भी द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इस ध्वज की ताकत से सैनिकों में जोश भरा। लेकिन सफर इतना आसान नहीं था। ध्वज को लेकर कई विवाद और मांगें भी उठीं। कुछ लोग रंगों को धर्म से जोड़ने के खिलाफ थे, तो कुछ ने चरखे की जगह ‘गदा’ रखने की वकालत की। वहीं सिख समुदाय की मांग थी कि या तो इसमें पीला रंग शामिल हो, या फिर सभी धार्मिक प्रतीकों को पूरी तरह हटा दिया जाए। आखिरकार, साल 1931 में कांग्रेस ने तमाम बदलावों के साथ इसे अपने आधिकारिक ध्वज के रूप में स्वीकार कर लिया।
1947 में जब आजादी की सुबह करीब थी, तब संविधान सभा के सामने सबसे बड़ा सवाल था कि आजाद भारत का अंतिम ध्वज कैसा दिखेगा। लंबे मंथन के बाद एक ऐतिहासिक फैसला लिया गया और गांधी जी के चरखे की जगह सम्राट अशोक के ‘धर्म चक्र’ (अशोक चक्र) को ध्वज के केंद्र में गहरे नीले रंग से उकेरा गया।
आजादी के बाद भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बना, और इसी के साथ तिरंगे के रंगों की परिभाषा को भी हमेशा के लिए बदल दिया गया। अब ये रंग किसी धर्म के नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों के प्रतीक बन गए। इसमें केसरिया रंग शक्ति, साहस और बलिदान को दर्शाता है, जबकि सफेद रंग सत्य, शांति और पवित्रता का प्रतीक है। हरा रंग देश की मिट्टी, समृद्धि और पर्यावरण से जुड़ाव को दिखाता है। ध्वज के बीच में बना अशोक चक्र न्याय के नियम का पहिया है, जो संदेश देता है कि ‘गति ही जीवन है और ठहराव मृत्यु है।’ इसकी 24 तीलियां यह बताती हैं कि देश को चौबीसों घंटे प्रगति के पथ पर आगे बढ़ना है। उसके बाद से अब तक भारत के ध्वज में कोई बदलाव नहीं हुआ।
दशकों तक देश में नियम बेहद सख्त थे। आम नागरिकों को केवल स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस जैसे गिने-चुने राष्ट्रीय पर्वों पर ही झंडा फहराने की इजाजत थी। लेकिन साल 2002 में ‘इंडियन फ्लैग कोड’ में एक ऐतिहासिक बदलाव किया गया। इसके बाद हर भारतीय को यह कानूनी अधिकार मिल गया कि वह साल के 365 दिन, किसी भी दिन अपने घर, दुकान, फैक्टरी या ऑफिस में पूरे सम्मान और गर्व के साथ तिरंगा फहरा सकता है।
22 जुलाई 1942: इतिहास की सबसे क्रूर तारीख, जब इंसानियत हार गई और शुरू हुआ इतिहास का सबसे बड़ा महाविनाश
ट्रेबलिंका का वो काला साया: 9 लाख मौतें, गैस चैंबर और हिटलर का वो खौफनाक सच
मानव इतिहास के पन्नों में एक ऐसा स्याह पन्ना भी दर्ज है, जिसकी क्रूरता और वीभत्सता को याद कर आज भी रूह कांप उठती है। यह कहानी है इतिहास के सबसे बड़े, संगठित और रोंगटे खड़े कर देने वाले नरसंहार की, जिसकी खौफनाक शुरुआत 22 जुलाई 1942 को हुई थी। इसी ऐतिहासिक तारीख से नाजी सैनिकों ने यहूदियों को वारसा से खदेड़कर पोलैंड के कुख्यात ‘ट्रेबलिंका कंसंट्रेशन कैंप’ में भेजना शुरू किया था। आंकड़े गवाही देते हैं कि सिर्फ इसी एक मौत के कारखाने में 9 लाख से ज्यादा बेगुनाह यहूदियों को तड़पा-तड़पाकर मार डाला गया।
इस विनाशलीला की पटकथा साल 1933 में ही लिख दी गई थी, जब अडॉल्फ हिटलर जर्मनी की सत्ता पर काबिज हुआ। हिटलर के भीतर यहूदियों को लेकर अंधी नफरत भरी थी। उसका मानना था कि जर्मन नस्ल ही दुनिया में सबसे सर्वश्रेष्ठ है, जबकि यहूदी समाज पर एक परजीवी की तरह हैं। हिटलर का यह पागलपन इस हद तक बढ़ चुका था कि उसका मानना था कि अगर जर्मनी को विश्व शक्ति बनना है, तो यहूदियों का समूल नाश करना होगा।
इसके लिए नाजियों ने सबसे पहले यहूदियों को समाज से अलग-थलग करना शुरू किया। उनके लिए विशेष और बेहद तंग इलाके बनाए गए, जिन्हें ‘घेट्टो’ कहा जाता था। इन घेट्टो में यहूदियों को बंधक बनाकर जानवरों जैसी जिंदगी जीने पर मजबूर किया गया। हद तो यह थी कि उनकी इंसानी पहचान तक छीन ली गई और उन्हें नाम की जगह सिर्फ एक कैदी नंबर दे दिया गया।
साल 1939 में जब जर्मनी ने पोलैंड पर हमला किया, तो इसके साथ ही द्वितीय विश्व युद्ध का शंखनाद हो गया। हिटलर की सेना जहां-जहां जीत हासिल करती, वहां हजारों की तादाद में गुप्त कैंप और डिटेंशन साइट्स खड़ी कर दी जातीं। जंग के मैदान से पकड़े गए यहूदियों को भेड़-बकरियों की तरह इन कैंपों में ठूंस दिया जाता था।
इसी खौफनाक सिलसिले के तहत पोलैंड की राजधानी वारसा से करीब 80 किलोमीटर दूर जंगलों के बीच ‘ट्रेबलिंका कैंप’ तैयार किया गया। जुलाई 1942 में वजूद में आया यह कैंप नाजियों के उस खौफनाक प्लान का हिस्सा था, जिसे उन्होंने ‘फाइनल सॉल्यूशन’ (यानी यहूदियों का पूर्ण खात्मा) नाम दिया था। 22 जुलाई 1942 को इसी तबाही के केंद्र की तरफ पहली ट्रेन रवाना हुई थी।
वारसा के घेट्टो से यहूदियों को मालगाड़ियों के बंद डिब्बों में बिना हवा और पानी के, जानवरों की तरह ठूंसकर ट्रेबलिंका लाया जाता था। इस स्टेशन पर उतरने के बाद मौत का जो तांडव शुरू होता, उसकी कल्पना भी खौफनाक है। कैंप में पहुंचते ही पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के कपड़े जबरन उतरवा लिए जाते थे।
इसके बाद, उन्हें धोखे से या जबरदस्ती एक बहुत बड़े बंद हॉल में धकेल दिया जाता, जिसे नाजी ‘स्नानघर’ कहते थे। जैसे ही भारी दरवाजे बाहर से लॉक होते, छत के छिद्रों से जानलेवा कार्बन मोनोऑक्साइड गैस छोड़ दी जाती थी। कुछ ही मिनटों में पूरा हॉल चीखों और तड़पते हुए इंसानों के जिस्मों से भर जाता। दम घुटने के कारण लोग एक-दूसरे के ऊपर गिरते और दम तोड़ देते।
इंसानियत को शर्मसार करने वाला यह ‘होलोकॉस्ट’ (महाविनाश) साल 1945 में दूसरे विश्वयुद्ध के खत्म होने तक लगातार चलता रहा, जिसने इतिहास को कभी न मिटने वाला एक गहरा जख्म दे दिया।
22 जुलाई 1970: जब देवदार की वादियों ने रची शिक्षा की एक ऐतिहासिक इबारत!
56 साल का हुआ हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, जानिए इसकी अनकही दास्तान
पहाड़ों की मखमली गोद और देवदार के ऊंचे-खूबसूरत जंगलों के बीच एक ऐसा परिसर बसा है, जिसके रास्तों से गुजरते ही इतिहास की महक आने लगती है। यह कहानी है हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (HPU) की, जो आज अपने सुनहरे सफर का एक और बड़ा मील का पत्थर पार करते हुए शान से 57वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है।
22 जुलाई 1970 को जब तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. यशवंत सिंह परमार ने इस विश्वविद्यालय की बुनियाद रखी थी, तब किसी ने नहीं सोचा था कि भौगोलिक रूप से बेहद कठिन और दुर्गम माने जाने वाले इस पहाड़ी सूबे में उच्च शिक्षा की यह क्रांति इस कदर परवान चढ़ेगी!
इन 56 वर्षों का सफरनामा सिर्फ समय बीतने की कहानी नहीं है, बल्कि यह संघर्ष, संकल्प और बेमिसाल कामयाबियों का एक रोमांचक सफर है। इस दौरान विश्वविद्यालय ने वक्त के कई थपेड़े झेले, कई उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन कभी थमना नहीं सीखा। एचपीयू के इतिहास में वैसे तो कई शानदार उपलब्धियां दर्ज हैं, लेकिन इसकी सबसे बड़ी और गौरवशाली छलांग तब देखने को मिली जब राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (NAAC) ने इसकी शैक्षणिक गुणवत्ता और कड़े परिश्रम को देखते हुए इसे ‘ए प्लस’ (A+) ग्रेड के प्रतिष्ठित खिताब से नवाजा। इस एक रैंकिंग ने पूरे देश के शिक्षा जगत में एचपीयू का डंका बजा दिया।
1970 में लॉ जैसे सीमित विभागों, मुट्ठी भर छात्रों और चुनिंदा इमारतों से शुरू हुआ यह सफर आज दो दर्जन से अधिक भव्य भवनों और हॉस्टल्स के साथ एक शानदार परिसर में तब्दील हो चुका है। भविष्य की योजनाओं के तहत व्यावसायिक कोर्सों में सीटें दोगुनी की गई हैं। अब घणाहट्टी में आधुनिक सुविधाओं से लैस नया कैंपस, नए छात्रावास और पोर्टर हिल के पास एक इनडोर खेल स्टेडियम व फिटनेस सेंटर का निर्माण किया जा रहा है। डिजिटलाइजेशन के इस दौर में प्रवेश परीक्षा से लेकर फीस जमा करने तक के सारे काम अब ऑनलाइन हो चुके हैं।
यह विश्वविद्यालय वैश्विक दिग्गजों की नर्सरी रहा है। यहाँ से अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई (पॉलिटिकल साइंस में मास्टर्स और लिटरेचर में पीएचडी), नेपाली कांग्रेस की आरजु राणा देउवा और तिब्बती प्रशासन के वित्त मंत्री त्सेरिंग थोंडुप ने पढ़ाई की है। भारतीय राजनीति में जे.पी. नड्डा, आनंद शर्मा, मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू, अश्विनी कुमार और इंदू गोस्वामी जैसे नामचीन लोग यहाँ के पूर्व छात्र रहे हैं। न्यायपालिका में संजय करोल, राजीव शर्मा, अभिलाषा कुमारी और चिकित्सा में डॉ. रणदीप गुलेरिया ने यहीं से उड़ान भरी। वहीं कला जगत में अभिनेता अनुपम खेर और गायक मोहित चौहान भी इसी समरहिल परिसर की देन हैं, जिसका जादू आज भी हर किसी को बांध लेता है।
देश-विदेश में 22 जुलाई को इन घटनाओं के लिए भी याद किया जाता है
1648: यूक्रेन में खमेलनत्सकी विद्रोह के दौरान चमीलनीक हत्याकांड में 10,000 यहूदियों की हत्या की गई। इतिहासकारों का अनुमान है कि विद्रोह के दौरान कुल 40,000 से 50,000 के करीब यहूदियों की हत्या कर दी गई थी।
1678: छत्रपति शिवाजी महाराज ने वेल्लोर का किला जीता।
1775: जॉर्ज वॉशिंगटन ने अमेरिकी सेना की कमान संभाली। जार्ज वॉशिंगटन अमेरिका के पहले राष्ट्रपति थे।
1918: भारत के पहले प्रवीण पायलट इन्द्रलाल राय प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान लंदन में जर्मनी के साथ हवाई लड़ाई में मारे गए।
1933: विली हार्डेमन पोस्ट विमान से अकेले दुनिया का चक्कर लगाने वाले पहले इंसान बने। उन्होंने 7 दिन 19 घंटे में अपना सफर पूरा किया था।
1946: यरुशलम स्थित किंग डेविड होटल में हुए बम विस्फोट में 91 लोगों की मृत्यु हुई। यह ब्रिटिश शासनकाल के फ़िलिस्तीन के इतिहास की प्रमुख घटनाओं में गिना जाता है।
1970: हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला की स्थापना।
1972: सोवियत संघ का अंतरिक्ष यान वेनेरा 8 (Venera 8) शुक्र (Venus) ग्रह की सतह पर सफलतापूर्वक उतरा था। यह किसी दूसरे ग्रह की सतह पर उतरने वाला और वहां से लाइव डेटा (तापमान, दबाव और प्रकाश) पृथ्वी पर भेजने वाला इतिहास का पहला मानव निर्मित यान था।
1981: भारत के पहले भू स्थिर उपग्रह ‘एप्पल’ ने काम करना शुरु किया।
1988: अमेरिका के 500 वैज्ञानिकों ने रक्षा मंत्रालय पेंटागन में जैविक हथियार बनाने के लिए शोध का बहिष्कार करने की प्रतिज्ञा ली।
1991: अमेरिका के कुख्यात सीरियल किलर जेफ्री डाहमर को मिल्वौकी पुलिस ने गिरफ्तार किया। जेफ्री ने 17 लोगों का मर्डर किया था और सभी के शव को अपने घर में रख लिया था। माना जाता कि जेफ्री उन शवों को खाता था।
1993: हिमाचल की मणिकर्ण घाटी में आए उस विनाशकारी बादल फटने और भूस्खलन में लगभग 25 से अधिक लोगों की जान चली गई थी और दर्जनों लोग लापता हो गए थे।
1999: एमएसएन मैसेन्जर का पहला संस्करण माइक्रोसॉफ्ट द्वारा जारी किया गया।
1999: अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) द्वारा दुनिया भर में कार्यस्थलों पर लैंगिक भेदभाव खत्म करने और समान कार्य के लिए समान पारिश्रमिक देने की वैश्विक कार्य योजना को लागू किया गया था।
2000: एरिजोना विश्वविद्यालय और स्मिथसोनियन एस्ट्रोफिजिकल वेधशाला के खगोलविदों ने बृहस्पति के 17वें उपग्रह की खोज की। इस उपग्रह का व्यास लगभग 5 किलोमीटर था और इसे किट पीक (Kitt Peak) वेधशाला में मौजूद ‘स्पेसवॉच’ टेलीस्कोप की मदद से खोजा गया था
2001: शेर बहादुर देउबा नेपाल के नये प्रधानमंत्री बने।
2003: इराक में हवाई हमले में तानाशाह सद्दाम हुसैन के दो बेटे मारे गए थे।
2009: दुनिया ने 21वीं सदी का सबसे लंबा सूर्यग्रहण देखा। धरती के अलग-अलग हिस्सों से ये सूर्यग्रहण 6 मिनट 38 सेकेंड तक देखा गया।
2010: दुनिया के महानतम गेंदबाज श्रीलंका के मुथैया मुरलीघरन ने टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लिया। इनके नाम इस फॉमेंट में सबसे ज्यादा 800 विकेट का रिकोर्ड है।
2011: विवेकानंद इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मायकोलॉजी के फफूंदी अनुसंधान दल ने 100-115 डिग्री सेल्सियस तापमान सह सकने वाले तापरोधी फफूंदी के बीजाणुओं की खोज की।
2011: ओस्लो और उटोया द्वीप पर हुए आतंकवादी हमलों में 77 लोगों की मृत्यु हुई। यह नॉर्वे के आधुनिक इतिहास के सबसे भीषण आतंकी हमलों में से एक है।
2012: चीन के बीजिंग में भारी बारिश के कारण 77 लोग मरे।
2012: प्रणब मुखर्जी भारत के 13वें राष्ट्रपति बने।
2013: चीन के गांसु प्रांत में भूकंप से 89 लोग मरे।
2014: एक रिपोर्ट में 9/11 हमले को सरकारी संस्थाओं की नाकामी करार दिया गया।
2019: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने श्रीहरिकोटा से चंद्रयान-2 मिशन का सफल प्रक्षेपण किया। यह भारत का दूसरा चंद्र मिशन था और चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के अध्ययन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।
2020: दुनिया भर में कोरोना वायरस से 7,109 लोगों की मौत, 2,79,368 नए मामले भी आए। दुनिया भर में कोरोना वायरस से मौत का कुल आंकड़ा 6,29,339 और संक्रमितों का कुल आंकड़ा 15,364,925 पहुंचा, जबकि 93,43,850 ठीक भी हुए हैं।
2020: भारत में कोरोना वायरस से 1,130 लोगों की मौत, 45,601 नए मामले भी आए जबकि 31,874 ठीक हुए। देश भर में कोरोना वायरस से मौत का कुल आंकड़ा 29,890 और संक्रमितों का कुल आंकड़ा 12,39,684 पहुंचा, जबकि 7,84,266 ठीक भी हुए हैं।
2022: इमरजेंसी पैनिक बटन सिस्टम लॉन्च करने वाला पहला राज्य बना हिमाचल प्रदेश, जिसने ‘व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस’ (VLTD) और ‘इमरजेंसी पैनिक बटन’ को सीधे ‘इमरजेंसी रिस्पांस सपोर्ट सिस्टम’ (ERSS-112) से जोड़ा।
22 जुलाई को जन्मे प्रमुख व्यक्ति
1894: सरदार तेजा सिंह अकरपुरी – पहली लोकसभा के सदस्य।
1898: विनायकराव पटवर्धन – प्रसिद्ध शास्त्रीय संगीत गायक।
1923: मुकेश – प्रसिद्ध पार्श्व गायक।
1947: डॉनल्ड ह्यू डॉन हेनली – संगीतकार।
1959: अनंत कुमार – भारतीय जनता पार्टी से संबंधित राजनीतिज्ञ एवं कैबिनेट मंत्री।
1965: संदीप पांडेय – ‘रेमन मैगसेसे पुरस्कार’ से सम्मानित प्रसिद्ध भारतीय सामाजिक कार्यकर्ता।
1970: देवेन्द्र फडणवीस – महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री।
22 जुलाई को हुए प्रमुख निधन
1918: इन्द्र लाल रॉय – भारतीय मूल के प्रसिद्ध युद्धक पायलट, प्रथम विश्व युद्ध के दौरान हवाई युद्ध में शहीद हुए। वे ब्रिटिश रॉयल एयर फ़ोर्स के पहले भारतीय “फ्लाइंग ऐस” माने जाते हैं।
1933: यतीन्द्र मोहन सेन गुप्त – भारतीय स्वाधीनता संग्राम के प्रमुख नायकों में से एक।
1968: मुत्तू लक्ष्मी रेड्डी – भारत की प्रसिद्ध महिला चिकित्सक, सामाजिक कार्यकर्ता और पद्म भूषण प्राप्तकर्ता थीं।
22 जुलाई के महत्त्वपूर्ण अवसर एवं उत्सव
राष्ट्रीय झण्डा अंगीकरण दिवस
राष्ट्रीय झण्डा अंगीकरण दिवस हर वर्ष 22 जुलाई को मनाया जाता है। इस दिन 1947 को राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को भारत के संविधान द्वारा अपनाया (अंगीकृत) गया था।
विश्व मस्तिष्क दिवस
विश्व मस्तिष्क दिवस (World Brain Day) प्रत्येक वर्ष 22 जुलाई को मनाया जाता है। इसकी शुरुआत World Federation of Neurology (WFN) ने 2014 में की थी। इसका उदेश्य मस्तिष्क स्वास्थ्य, न्यूरोलॉजिकल रोगों की रोकथाम, शीघ्र पहचान और उपचार के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।
प्रस्तुति
हिमाचल न्यूज़ रिसर्च डेस्क
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