23 July in History: ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार वर्ष का 204वां दिन (लीप वर्ष में 205वां दिन) है। साल में अभी और 161 दिन शेष हैं। भारत और विश्व इतिहास में 23 जुलाई का खास महत्व है, क्योंकि इस दिन कई महत्वपूर्ण घटनाएं घटी जो इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज होकर रह गईं हैं।
आज का इतिहास में जानिए आज के दिन जन्मे चर्चित व्यक्ति, प्रसिद्ध व्यक्तियों के निधन, युद्ध संधि, किसी देश की आजादी, नई तकनिकी का अविष्कार, सत्ता का बदलना, महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दिवस के बारे में। आईए हिमाचल न्यूज़ में पढ़ें भारत और विश्व इतिहास के पन्नों में दर्ज 23 जुलाई का इतिहास एवं घटनाक्रम।
23 जुलाई 1927: जब भारत में गूंजी रेडियो की पहली आवाज
बॉम्बे में हुई थी भारत के पहले नियमित रेडियो प्रसारण केंद्र की शुरुआत, यही आगे चलकर बना ऑल इंडिया रेडियो
यह उस दौर की बात है जब शाम ढलते ही गांव के चौराहे या घर के आंगन में रखे एक बड़े से लकड़ी के बक्से के इर्द-गिर्द पूरा परिवार जमा हो जाता था। सुई घूमती, एक धीमी सी सरसराहट की आवाज आती और फिर गूंजती “यह आकाशवाणी का विदेश सेवा प्रभाग है…” उस आवाज के गूंजते ही जैसे वक्त ठहर जाता था। इंटरनेट और टीवी के इस दौर में भले ही हम रील्स में उलझे हों, लेकिन आवाज के जादू का यह साम्राज्य रातों-रात खड़ा नहीं हुआ था। इसके पीछे कहानियों, प्रयोगों और ऐतिहासिक मोड़ों का एक दिलचस्प ताना-बाना बुना हुआ है।
कहानी की शुरुआत होती है 20वीं सदी के शुरुआती सालों में, साल 1906 की एक बर्फीली शीतकालीन शाम से। 24 दिसंबर को कनाडा के एक जुनूनी वैज्ञानिक रेगिनाल्ड फेसेंडेन अपने लैब में बैठे थे। उन्होंने एक नया प्रयोग करते हुए अपना वायलिन उठाया और उस पर धुन बजानी शुरू की। उसी वक्त, तट से दूर गहरे समंदर में हिचकोले खा रहे जहाजों के कप्तानों और नाविकों के रेडियो सेट अचानक बज उठे। जहाजों के सन्नाटे में वायलिन की वह मीठी धुन गूंजने लगी।
उस रात से पहले रेडियो का मतलब केवल दो लोगों के बीच गुप्त सांकेतिक (कोड) संदेश भेजना होता था। लेकिन उस एक घटना ने दुनिया को यह अहसास कराया कि एक साथ एक ही समय में लाखों लोगों तक आवाज पहुंचाई जा सकती है। इसी चमत्कार ने ‘पब्लिक ब्रॉडकास्टिंग’ के विचार को जन्म दिया। इसके बाद प्रथम विश्वयुद्ध में रेडियो तरंगों ने सेनाओं का मुख्य सहारा बनकर अपनी उपयोगिता साबित की और युद्ध खत्म होते-होते इंग्लैंड में बीबीसी जैसी संस्थाओं के साथ रेडियो हर घर की जरूरत बनने लगा।
दुनिया में मच रही इस हलचल की गूंज जल्द ही भारत भी पहुंची। जून 1923 की उमस भरी गर्मियों में मुंबई के कुछ जुनूनी रेडियो प्रेमियों ने मिलकर ‘रेडियो क्लब ऑफ बॉम्बे’ की नींव रखी। इसके ठीक पांच महीने बाद कलकत्ता में भी ऐसा ही एक क्लब शुरू हुआ। हालांकि, उन दिनों ट्रांसमीटर इतने कमजोर थे कि आवाज बस पास की दो-चार गलियों तक ही पहुंच पाती थी।
ब्रिटिश हुकूमत ने जब इस डिब्बे की ताकत को पहचाना, तो 23 जुलाई 1927 को भारत के वायसराय लॉर्ड इरविन ने खुद बॉम्बे में देश के पहले आधिकारिक रेडियो केंद्र का फीता काटा। धीरे-धीरे निजी कंपनियों का दौर बीता और 1930 में सरकार ने ‘इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी’ का राष्ट्रीयकरण कर दिया। फिर आया जून 1936 का ऐतिहासिक महीना, जब इस सेवा को एक नया और रोबीला नाम मिला ऑल इंडिया रेडियो (AIR)। इसी यादगार साल रेडियो के जरिए देश का पहला आधिकारिक न्यूज बुलेटिन हवा में तैरता हुआ लोगों के कानों तक पहुंचा।
15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ, तो खुशियों के साथ-साथ रेडियो के दिल पर भी विभाजन का जख्म लगा। बंटवारे से पहले पूरे भारत में कुल 9 रेडियो स्टेशन थे। लेकिन जब सीमाओं की रेखाएं खिंचीं, तो 3 स्टेशन पाकिस्तान के पाले में चले गए। भारत के पास केवल 6 शहर बचे—दिल्ली, बॉम्बे, कलकत्ता, मद्रास, तिरुचिरापल्ली और लखनऊ। उस जमाने में ऑल इंडिया रेडियो की पहुंच देश की महज 11% आबादी तक ही थी।
लेकिन आजादी के बाद इस भारतीय आवाज ने नई उड़ान भरी। 1956 में ऑल इंडिया रेडियो को एक नया, सांस्कृतिक और आत्मीय नाम दिया गया—’आकाशवाणी’। इसके ठीक एक साल बाद, यानी 1957 में सुरों का वह कारवां शुरू हुआ जिसने हर हिंदुस्तानी के बचपन और जवानी को सुरीला बना दिया ‘विविध भारती’। फिल्मी गानों, हवा महल और ‘आपकी फरमाइश’ के कार्यक्रमों ने रेडियो को भारत के हर घर का सदस्य बना दिया।
आज ऑल इंडिया रेडियो को दुनिया के सबसे विशाल और प्रतिष्ठित मीडिया संगठनों में गिना जाता है। ऑल इंडिया रेडियो 262 ब्रॉडकास्टिंग स्टेशनों के विशाल नेटवर्क के बल पर आज यह देश के 91% भौगोलिक हिस्से को कवर करता है और भारत की 99.18% आबादी तक इसकी पहुंच है। समंदर में बजी उस पहली वायलिन की धुन से शुरू हुआ यह सफर आज भी भारत की नसों में राष्ट्रीय पहचान और भरोसे की आवाज बनकर गूंज रहा है।
23 जुलाई 1906: भारत मां के उस शूरवीर का जन्म, जिसे अंग्रेज कभी ज़िंदा नहीं पकड़ पाए
यह कहानी भारत मां के उस जांबाज बेटे की है, जिसके नाम से ही ब्रिटिश हुकूमत के पसीने छूट जाते थे। एक ऐसा योद्धा, जिसने जीते जी कभी गुलामी की बेड़ियों को अपने हाथों में नहीं बांधने दिया और मरते दम तक अपने नाम ‘आजाद’ की लाज रखी।
23 जुलाई 1906.. मध्यप्रदेश के भाबरा गांव में चंद्रशेखर तिवारी का जन्म हुआ। देश में आजादी की ज्वाला सुलग रही थी और मात्र 14 साल की निडर उम्र में यह बालक महात्मा गांधी के ‘असहयोग आंदोलन’ की आग में कूद पड़ा।
अंग्रेजों ने इस छोटे से लड़के को गिरफ्तार कर लिया और अदालत में जज के सामने खड़ा कर दिया। जज ने कड़क आवाज में पूछा—”तुम्हारा नाम क्या है?”
बालक ने सीना तानकर कहा—”आजाद!”
जज ने फिर पूछा—”पिता का नाम?”
जवाब मिला—”स्वतंत्रता!”
और जब रहने का पता पूछा गया, तो बालक ने बेबाकी से कहा—”जेलखाना!”
इस निडर जवाब ने अंग्रेजों को हिलाकर रख दिया। उन्हें 15 कोड़ों की सजा सुनाई गई, लेकिन हर कोड़े की मार पर बालक के मुंह से सिर्फ एक ही नारा निकला, ‘भारत माता की जय!’ इसी दिन से दुनिया चंद्रशेखर तिवारी को ‘चंद्रशेखर आजाद’ के नाम से जानने लगी।
आजादी की इस लड़ाई को तेज करने के लिए पैसों और हथियारों की सख्त जरूरत थी। 9 अगस्त 1925 की रात, राम प्रसाद बिस्मिल की अगुवाई में आजाद समेत 10 शूरवीर क्रांतिकारियों ने इतिहास का सबसे दुस्साहसिक कदम उठाया।
सहारनपुर से लखनऊ जा रही पैसेंजर ट्रेन को काकोरी (लखनऊ से 16 किमी दूर) के पास जबरदस्ती रोका गया और अंग्रेजों के सरकारी खजाने को लूट लिया गया। इस घटना से बौखलाई ब्रिटिश पुलिस ने रात-दिन एक करके करीब 40 क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया, लेकिन चंद्रशेखर आजाद अंग्रेजों की आंखों में धूल झोंककर हवा की तरह गायब हो गए।
समय बीतता गया, लेकिन अंग्रेज कभी आजाद तक नहीं पहुंच पाए। फिर आया 27 फरवरी 1931 का वह काला दिन। इलाहाबाद का अल्फ्रेड पार्क, जहां आजाद अपने साथी सुखदेव राज के साथ बैठकर संगठन की भावी रणनीतियों पर चर्चा कर रहे थे। तभी किसी मुखबिर की सूचना पर अंग्रेज पुलिस ने पूरे पार्क को चारों तरफ से घेर लिया और ताबड़तोड़ गोलियां बरसानी शुरू कर दीं।
आजाद ने पल भर की देरी किए बिना अपने साथी सुखदेव को वहां से सुरक्षित बाहर निकाला और खुद पेड़ के पीछे से अकेली पिस्तौल के दम पर पूरी पुलिस फोर्स से भिड़ गए। जब गोलियां खत्म होने लगीं और पिस्तौल में महज एक आखिरी गोली बची, तो आजाद के चेहरे पर एक मुस्कान तैर गई।
उन्होंने अंग्रेजों को ललकारते हुए खुद से वादा दोहराया “दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे, आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे!”
और उस आखिरी गोली को अपनी कनपटी पर दाग लिया। अंग्रेज पुलिस इतनी डरी हुई थी कि उनके शहीद होने के काफी देर बाद तक कोई उनके पार्थिव शरीर के पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा सका। अंग्रेज आजाद को जीते जी कभी छू भी न सके और वह मरते दम तक आजाद ही रहे।
1903: फोर्ड ने बेची थी अपनी पहली कार और रचा गया इतिहास
यह कहानी उस क्रांति की है जिसने इंसान के चलने और सफर करने का तरीका हमेशा-हमेशा के लिए बदल दिया। आज हम सड़कों पर फर्राटा भरती गाड़ियों को देखकर भले ही सहज महसूस करते हों, लेकिन चार पहियों पर दुनिया को दौड़ाने वाला यह सफर एक गैरेज में बने छोटे से इंजन और मुट्ठी भर डॉलर के जोखिम से शुरू हुआ था।
हेनरी फोर्ड—एक साधारण इंजीनियर, जिनकी आंखों में एक ऐसा सपना था जो उस दौर के लोगों को पागलपन लगता था। अलग-अलग कंपनियों में काम करते हुए हेनरी रात-दिन मशीनरी के साथ प्रयोग करते रहते थे।
साल 1893 में उन्होंने अपने गैरेज में एक छोटा, सिंगल सिलेंडर इंजन तैयार किया। दिमाग में जुनून था, तो उन्होंने इस इंजन को साइकल के चार पहियों के साथ जोड़ दिया और नाम दिया—’क्वाड्रासाइकिल’। यह हेनरी फोर्ड की जिंदगी और दुनिया के ऑटोमोबाइल इतिहास का पहला मील का पत्थर था।
इंजीनियर की नौकरी छोड़कर हेनरी फोर्ड ने 1903 में अपने 12 साथियों के साथ मिलकर ‘फोर्ड मोटर कंपनी’ की नींव रखी। निवेशकों ने कंपनी में 28 हजार डॉलर का निवेश किया था।
हेनरी और उनकी टीम ने अपना पूरा ध्यान पहली कॉमर्शियल कार ‘मॉडल A’ बनाने में लगा दिया। जुनून इस कदर था कि कार तैयार होते-होते निवेशकों का दिया पैसा खत्म हो चुका था और कंपनी के बैंक खाते में महज 223 डॉलर बचे थे। अगर यह कार न बिकती, तो फोर्ड कंपनी शुरू होने से पहले ही बंद हो जाती।
फिर आया 23 जुलाई 1903 का वह ऐतिहासिक दिन। शिकागो के एक डेंटिस्ट डॉक्टर अर्नस्ट फेनिंग ने फोर्ड कंपनी पर भरोसा जताया और 850 डॉलर में दुनिया की पहली ‘फोर्ड मॉडल A’ खरीद ली।
यह महज एक कार की बिक्री नहीं थी, बल्कि एक नए युग का आगाज था। इस पहली कार में डबल सिलेंडर और 8 हॉर्सपॉवर (HP) का इंजन लगा था। उस जमाने में यह कार 47 किलोमीटर प्रतिघंटा की तूफानी रफ्तार से दौड़ सकती थी।
पहली कार बिकते ही ऑर्डर की झड़ी लग गई। जो कंपनी चंद डॉलर के सहारे बंद होने के कगार पर खड़ी थी, उसने अगले ही 3 महीनों के भीतर 37 हजार डॉलर का बंपर मुनाफा कमाया।
23 जुलाई 1903 को डॉक्टर फेनिंग द्वारा खरीदे गए उस एक मॉडल A ने हेनरी फोर्ड के सपने को सच कर दिया और ‘फोर्ड’ को देखते ही देखते दुनिया की सबसे सफल और दिग्गज कार कंपनियों के सिरमौर बना दिया।
देश-विदेश में 23 जुलाई को इन घटनाओं के लिए भी याद किया जाता है
23 जुलाई 1906: भारत मां के उस शूरवीर का जन्म, जिसे अंग्रेज कभी ज़िंदा नहीं पकड़ पाए
यह कहानी भारत मां के उस जांबाज बेटे की है, जिसके नाम से ही ब्रिटिश हुकूमत के पसीने छूट जाते थे। एक ऐसा योद्धा, जिसने जीते जी कभी गुलामी की बेड़ियों को अपने हाथों में नहीं बांधने दिया और मरते दम तक अपने नाम ‘आजाद’ की लाज रखी।
23 जुलाई 1906.. मध्यप्रदेश के भाबरा गांव में चंद्रशेखर तिवारी का जन्म हुआ। देश में आजादी की ज्वाला सुलग रही थी और मात्र 14 साल की निडर उम्र में यह बालक महात्मा गांधी के ‘असहयोग आंदोलन’ की आग में कूद पड़ा।
अंग्रेजों ने इस छोटे से लड़के को गिरफ्तार कर लिया और अदालत में जज के सामने खड़ा कर दिया। जज ने कड़क आवाज में पूछा—”तुम्हारा नाम क्या है?”
बालक ने सीना तानकर कहा—”आजाद!”
जज ने फिर पूछा—”पिता का नाम?”
जवाब मिला—”स्वतंत्रता!”
और जब रहने का पता पूछा गया, तो बालक ने बेबाकी से कहा—”जेलखाना!”
इस निडर जवाब ने अंग्रेजों को हिलाकर रख दिया। उन्हें 15 कोड़ों की सजा सुनाई गई, लेकिन हर कोड़े की मार पर बालक के मुंह से सिर्फ एक ही नारा निकला, ‘भारत माता की जय!’ इसी दिन से दुनिया चंद्रशेखर तिवारी को ‘चंद्रशेखर आजाद’ के नाम से जानने लगी।
आजादी की इस लड़ाई को तेज करने के लिए पैसों और हथियारों की सख्त जरूरत थी। 9 अगस्त 1925 की रात, राम प्रसाद बिस्मिल की अगुवाई में आजाद समेत 10 शूरवीर क्रांतिकारियों ने इतिहास का सबसे दुस्साहसिक कदम उठाया।
सहारनपुर से लखनऊ जा रही पैसेंजर ट्रेन को काकोरी (लखनऊ से 16 किमी दूर) के पास जबरदस्ती रोका गया और अंग्रेजों के सरकारी खजाने को लूट लिया गया। इस घटना से बौखलाई ब्रिटिश पुलिस ने रात-दिन एक करके करीब 40 क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया, लेकिन चंद्रशेखर आजाद अंग्रेजों की आंखों में धूल झोंककर हवा की तरह गायब हो गए।
समय बीतता गया, लेकिन अंग्रेज कभी आजाद तक नहीं पहुंच पाए। फिर आया 27 फरवरी 1931 का वह काला दिन। इलाहाबाद का अल्फ्रेड पार्क, जहां आजाद अपने साथी सुखदेव राज के साथ बैठकर संगठन की भावी रणनीतियों पर चर्चा कर रहे थे। तभी किसी मुखबिर की सूचना पर अंग्रेज पुलिस ने पूरे पार्क को चारों तरफ से घेर लिया और ताबड़तोड़ गोलियां बरसानी शुरू कर दीं।
आजाद ने पल भर की देरी किए बिना अपने साथी सुखदेव को वहां से सुरक्षित बाहर निकाला और खुद पेड़ के पीछे से अकेली पिस्तौल के दम पर पूरी पुलिस फोर्स से भिड़ गए। जब गोलियां खत्म होने लगीं और पिस्तौल में महज एक आखिरी गोली बची, तो आजाद के चेहरे पर एक मुस्कान तैर गई।
उन्होंने अंग्रेजों को ललकारते हुए खुद से वादा दोहराया “दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे, आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे!”
और उस आखिरी गोली को अपनी कनपटी पर दाग लिया। अंग्रेज पुलिस इतनी डरी हुई थी कि उनके शहीद होने के काफी देर बाद तक कोई उनके पार्थिव शरीर के पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा सका। अंग्रेज आजाद को जीते जी कभी छू भी न सके और वह मरते दम तक आजाद ही रहे।
1903: फोर्ड ने बेची थी अपनी पहली कार और रचा गया इतिहास
यह कहानी उस क्रांति की है जिसने इंसान के चलने और सफर करने का तरीका हमेशा-हमेशा के लिए बदल दिया। आज हम सड़कों पर फर्राटा भरती गाड़ियों को देखकर भले ही सहज महसूस करते हों, लेकिन चार पहियों पर दुनिया को दौड़ाने वाला यह सफर एक गैरेज में बने छोटे से इंजन और मुट्ठी भर डॉलर के जोखिम से शुरू हुआ था।
हेनरी फोर्ड—एक साधारण इंजीनियर, जिनकी आंखों में एक ऐसा सपना था जो उस दौर के लोगों को पागलपन लगता था। अलग-अलग कंपनियों में काम करते हुए हेनरी रात-दिन मशीनरी के साथ प्रयोग करते रहते थे।
साल 1893 में उन्होंने अपने गैरेज में एक छोटा, सिंगल सिलेंडर इंजन तैयार किया। दिमाग में जुनून था, तो उन्होंने इस इंजन को साइकल के चार पहियों के साथ जोड़ दिया और नाम दिया—’क्वाड्रासाइकिल’। यह हेनरी फोर्ड की जिंदगी और दुनिया के ऑटोमोबाइल इतिहास का पहला मील का पत्थर था।
इंजीनियर की नौकरी छोड़कर हेनरी फोर्ड ने 1903 में अपने 12 साथियों के साथ मिलकर ‘फोर्ड मोटर कंपनी’ की नींव रखी। निवेशकों ने कंपनी में 28 हजार डॉलर का निवेश किया था।
हेनरी और उनकी टीम ने अपना पूरा ध्यान पहली कॉमर्शियल कार ‘मॉडल A’ बनाने में लगा दिया। जुनून इस कदर था कि कार तैयार होते-होते निवेशकों का दिया पैसा खत्म हो चुका था और कंपनी के बैंक खाते में महज 223 डॉलर बचे थे। अगर यह कार न बिकती, तो फोर्ड कंपनी शुरू होने से पहले ही बंद हो जाती।
फिर आया 23 जुलाई 1903 का वह ऐतिहासिक दिन। शिकागो के एक डेंटिस्ट डॉक्टर अर्नस्ट फेनिंग ने फोर्ड कंपनी पर भरोसा जताया और 850 डॉलर में दुनिया की पहली ‘फोर्ड मॉडल A’ खरीद ली।
यह महज एक कार की बिक्री नहीं थी, बल्कि एक नए युग का आगाज था। इस पहली कार में डबल सिलेंडर और 8 हॉर्सपॉवर (HP) का इंजन लगा था। उस जमाने में यह कार 47 किलोमीटर प्रतिघंटा की तूफानी रफ्तार से दौड़ सकती थी।
पहली कार बिकते ही ऑर्डर की झड़ी लग गई। जो कंपनी चंद डॉलर के सहारे बंद होने के कगार पर खड़ी थी, उसने अगले ही 3 महीनों के भीतर 37 हजार डॉलर का बंपर मुनाफा कमाया।
23 जुलाई 1903 को डॉक्टर फेनिंग द्वारा खरीदे गए उस एक मॉडल A ने हेनरी फोर्ड के सपने को सच कर दिया और ‘फोर्ड’ को देखते ही देखते दुनिया की सबसे सफल और दिग्गज कार कंपनियों के सिरमौर बना दिया।
देश-विदेश में 23 जुलाई को इन घटनाओं के लिए भी याद किया जाता है
1555: हुमायूं ने सरहिंद में सिकंदर सूरी पर विजय प्राप्त करने के बाद दिल्ली में प्रवेश किया।
1829: अमेरिका के विलियम ऑस्टिन बर्ट ने टाइपोग्राफ का पेटेंट कराया, जिससे बाद में टाइपराइटर का विकास हुआ।
1881: अंतर्राष्ट्रीय जिम्नास्टिक संघ ने खेल परिसंघ की स्थापना की। यह विश्व का सबसे पुराना खेल परिसंघ है।
1904: चार्ल्स मेंचेस ने पहले आइसक्रीम कोन को बनाया था।
1905: अल्फ्रेड डीकीन दूसरी बार ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री बने।
1914: आर्क्ड्यूक फ्रांसिस फर्डिनेंड की हत्या के बाद आस्ट्रीया-हंगरी ने सर्बिया को अल्टीमेटम दिया। इसी के बाद प्रथम विश्व युद्ध शुरु हो गया।
1920: ब्रिटेन के कब्जे वाले पूर्वी अफ्रीका का नामकरण केन्या किया गया और इसे ब्रिटिश उपनिवेश बना दिया गया।
1929: इटली में फासीवादी सरकार ने विदेशी शब्दों के प्रयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया।
1952: कर्नल जमाल अब्दुल नासिर के नेतृत्व में ‘फ्री ऑफिसर्स मूवमेंट’ ने मिस्र में राजशाही का तख्तापलट कर गणराज्य की नींव रखी। इस दिन को मिस्र में ‘राष्ट्रीय क्रांति दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।
1962: यूरोप के लाखों लोगों ने सैटेलाइट टेलस्टार के जरिए पहली बार टीवी पर लाइव प्रसारण देखा था। इस घटना को सैटेलाइट कम्यूनिकेशन के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि माना जाता है।
1983: जापान के पश्चिमी शिमन प्रान्त में भारी बारिश से 117 लोग मरे।
1983: एलटीटीई द्वारा 13 सैनिकों की हत्या के बाद श्रीलंका में व्यापक हिंसा भड़की, जिसे Black July के नाम से जाना जाता है। इस घटना ने श्रीलंका के लंबे गृहयुद्ध को और गहरा कर दिया।
1984: वनेसा विलियम्स ‘मिस अमेरिका’ के इतिहास में अपना खिताब छोड़ने वाली पहली महिला बनी। एक नग्न तस्वीर के कारण उन्हें खिताब छोड़ने को मजबूर किया गया।
2005: मिस्र के शर्म-अल-शेख के रिसॉर्ट में हुए बम धमाकों में 88 लोग मारे गए थे।
2012: इराक में हुए सिलसिलेवार हमलों में 103 लोग मारे गए और 260 से अधिक लोग घायल हुए।
2019: यूके की कंजर्वेटिव पार्टी ने बोरिस जॉनसन को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार चुना। अगले ही दिन जॉनसन यूके के प्रधानमंत्री बने।
2020: चीन ने अपने पहले मंगल मिशन की शुरुआत की। वेंचांग लॉन्च साइट से चीन ने तियानवन-1 लॉन्च किया।
2022: विश्व स्वास्थ्य ने तेजी से फैल रहे मंकीपॉक्स (Mpox) संक्रमण को अंतर्राष्ट्रीय चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित किया था।
23 जुलाई को जन्मे प्रमुख व्यक्ति
1856: बाल गंगाधर तिलक – गणितज्ञ, दार्शनिक और उग्र राष्ट्रवादी व्यक्ति।
1898: ताराशंकर बंद्योपाध्याय – ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रसिद्ध बांग्ला साहित्यकार।
1916: हेल सलासी – इथोपियाई सम्राट।
1973: हिमेश रेशमिया – हिंदी फिल्मो के संगीतकार, निर्माता, निर्देशक, अभिनेता और गायक।
23 जुलाई को हुए प्रमुख निधन
1993: लक्ष्मण प्रसाद दुबे – छत्तीसगढ़ के स्वतन्त्रता सेनानी।
1999: शाह हसन – मोरक्को के शाह।
2004: महमूद अली – हिन्दी फिल्मों के कामेडी के बादशाह और फ़िल्म निर्देशक।
2007: मुहम्मद जहीरशाह – अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति का निधन।
2012: कैप्टन डॉ. लक्ष्मी सहगल- नेताजी सुभाष चंद्र बोस की ‘आज़ाद हिंद फ़ौज’ की रानी झाँसी रेजीमेंट की कमांडर, महान स्वतंत्रता सेनानी और प्रख्यात डॉक्टर।
2016: सैयद हैदर रज़ा- पद्म विभूषण से सम्मानित अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त भारत के दिग्गज आधुनिक चित्रकार।
23 जुलाई के महत्त्वपूर्ण अवसर एवं उत्सव
राष्ट्रीय प्रसारण दिवस (National Broadcasting Day)
राष्ट्रीय प्रसारण दिवस भारत में प्रत्येक वर्ष 23 जुलाई को मनाया जाता है। इस दिन वर्ष 1927 में इंडियन प्रसारण कंपनी ने बंबई स्टेशन से रेडियो प्रसारण शुरू किया था।
प्रस्तुति
हिमाचल न्यूज़ रिसर्च डेस्क
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