Barot Valley Himachal: पहाड़ों की कुदरती खूबसूरती पर कौन फिदा नहीं होता? यह वादियों का ऐसा जादू है कि खुद हिमाचलवासी भी जब अपने घर से निकलकर किसी दूसरे गांव पहुंचते हैं, तो वहां की फिजाओं पर दिल हार बैठते हैं।
हिमाचल के मंडी जिले का ‘बरोट’ गांव भी एक ऐसा ही छिपा हुआ खज़ाना है। अंग्रेज़ी हुकूमत के दौर में ब्रिटिश इंजीनियर कर्नल बैंटी की नज़र जब इस जगह पर पड़ी, तो वे इसके हुस्न के मुरीद हो गए। उन्होंने बरोट को संवारने का सपना देखा, और इसीलिए आज इसे ‘कर्नल बैंटी के सपनों का गांव’ भी कहा जाता है।
समुद्र तल से लगभग 1,835 मीटर की ऊंचाई पर बसा बरोट गांव मंडी जिला मुख्यालय से 68 किमी और पद्धर तहसील से महज़ 40 किमी दूर है। मंडी-पठानकोट राष्ट्रीय राजमार्ग पर झटींगरी से आगे बढ़ते ही 25 किमी दूर उहल नदी के किनारे यह बसावट दिखती है।
गहरे हरे रंग की चादर ओढ़े देवदार के विशाल जंगल, बर्फीली हवाएं और साथ-साथ कल-कल बहती उहल नदी… बरोट की असल पहचान यहां फैली असीम शांति है। यहां की हवा में एक अजीब सा सुकून है, जो शहर की हर थकान को पल भर में सोख लेता है।
बरोट केवल आलस करने के लिए नहीं है! यह कुल्लू और कांगड़ा घाटी को जोड़ने वाला एक ऐतिहासिक ट्रेकिंग रूट है।
‘ट्रिप्पल टी‘ और दुनिया की अनोखी ट्रॉली लाइन
बरोट का इतिहास जितना शांत है, उतना ही दिलचस्प भी। 1920 के दशक में अंग्रेजों ने यहां ‘शानन पावर हाउस’ परियोजना की नींव रखी थी। कर्नल बैंटी की दूरदर्शिता और मंडी के दूरदर्शी राजा के प्रयासों से यहां वर्ष 1932 में एक ऐतिहासिक ट्रॉली लाइन बनाई गई। तब स्विट्जरलैंड के बाद अगर दुनिया में कहीं ऐसी अनोखी ट्रॉली लाइन बनी, तो वो बरोट में ही थी! कभी पावर हाउस के भारी-भरकम सामान को जोगिंद्रनगर से लाने के लिए बनी यह ट्रॉली, देखते ही देखते स्थानीय लोगों की आवाजाही का सबसे तेज़ जरिया बन गई। आज भले ही यह जीर्ण-शीर्ण हालत में हो, लेकिन इतिहास के पन्नों पर यह ब्रिटिश इंजीनियरिंग का अद्भुत नमूना मानी जाती है।

‘ट्राउट मछली‘ और जादुई फव्वारा
बरोट सिर्फ सुस्ताने की जगह नहीं है, यह तो एडवेंचर और स्वादों का संगम है। शानन प्रोजेक्ट के तहत उहल नदी पर तीन खूबसूरत कृत्रिम झीलें बनाई गई हैं, जिनका पानी शीशे की तरह चमकता है। बरोट को पूरे देश में ‘ट्राउट मछली’ (Trout Fish) के उत्पादन और एंग्लिंग (शिकार) के लिए जाना जाता है। उहल नदी के बर्फीले पानी में पलने वाली इस मछली का स्वाद यहां के हर होमस्टे की शान है। नदी के पास बना एक पुराना फव्वारा अचानक आसमान की तरफ पानी उछालता है, जो किसी चमत्कार जैसा लगता है। ठीक सामने देव पाशाकोट का प्राचीन मंदिर है, जिन्हें यहां की वादियों का संरक्षक माना जाता है।
ट्राउट मछली के अलावा यहां के पहाड़ी लाल राजमा और लोकल आलू का स्वाद ऐसा है कि आपकी ज़ुबान इसका मज़ा कभी नहीं भूलेगी।

लपास: जहां ठहर जाती हैं घड़ी की सुइयां
बरोट से महज़ कुछ किलोमीटर की दूरी पर एक कच्ची सड़क आपको ‘लपास गांव’ ले जाती है। यहां की लकड़ियों से बने पारंपरिक घर, झरने और उनके बीच बनी छोटी सी शांत झील आपको बीते ज़माने के ठेठ पहाड़ी जीवन में वापस ले जाएगी। ट्रेकर्स के लिए यह गांव कुल्लू और कांगड़ा घाटी को जोड़ने वाला सबसे पसंदीदा रूट है।

आधुनिकता का लिबास, मगर रूह आज भी वही
आज बरोट पर्यटन के नक्शे पर तेज़ी से उभर रहा है। पक्की सड़कें आईं, गाड़ियां बढ़ीं और आधुनिकता ने पांव पसारे, लेकिन इसके बावजूद बरोट ने अपना वजूद नहीं खोया।आस-पास के ग्रामीण आज भी अपनी पारंपरिक शैली, लोक संस्कृति और मासूमियत को सहेजे हुए हैं। यहां का जीवन सादा है और मेहमाननवाज़ी ऐसी कि अजनबी भी पल भर में अपना बन जाए। यहां के युवा न सिर्फ कृषि और बागवानी से आगे बढ़कर नए व्यवसायों और नौकरियों में अपना परचम लहरा रहे हैं, बल्कि नए रास्तों पर चलने का हौसला भी दिखा रहे हैं।

इतिहास की पटरियों पर एक सफर
बरोट का इतिहास जितना पुराना है, उतना ही दिलचस्प भी। 1920 के दशक में अंग्रेजों ने यहां शानन बिजली परियोजना की नींव रखी थी। ब्रिटिश इंजीनियर कर्नल बैंटी का दिमाग और उस दौर की मशीनरी आज भी यहां देखी जा सकती है। यहां आज भी अंग्रेजों के जमाने की एक ढुलाई ट्रॉली मौजूद है, जो कभी जोगिंद्रनगर से सामान लाने का एकमात्र जरिया थी। आज यह जीर्ण-शीर्ण हालत में है, लेकिन इसे देखना बीते वक्त की गवाही देने जैसा है।

कैसे पहुंचे बरोट
हवाई मार्ग: निकटतम एयरपोर्ट गग्गल (114 किमी) या भुंतर (123 किमी) है।
रेल मार्ग: जोगिंद्रनगर तक नैरो गेज ट्रेन (40 किमी दूर) का लुत्फ उठाएं।
सड़क मार्ग: दिल्ली से 400 किमी और चंडीगढ़ से 258 किमी। मंडी या पालमपुर से सीधी बसें उपलब्ध हैं।
बरोट के लोग आज भी यही दुआ करते हैं कि आधुनिकता की इस चकाचौंध में उनके गांव की सादगी, भोलेपन और आत्मीयता को कभी किसी की नज़र न लगे!
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