09 August in History: ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार वर्ष का 221वां दिन (लीप वर्ष में 222वां दिन) है। साल में अभी और 144 दिन शेष हैं। भारत और विश्व इतिहास में 09 अगस्त का खास महत्व है, क्योंकि इस दिन कई महत्वपूर्ण घटनाएं घटी जो इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज होकर रह गईं हैं।
आज का इतिहास में जानिए आज के दिन जन्मे चर्चित व्यक्ति, प्रसिद्ध व्यक्तियों के निधन, युद्ध संधि, किसी देश की आजादी, नई तकनिकी का अविष्कार, सत्ता का बदलना, महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दिवस के बारे में। आईए हिमाचल न्यूज़ में पढ़ें भारत और विश्व इतिहास के पन्नों में दर्ज 09 अगस्त का इतिहास एवं घटनाक्रम।
1961: आज ही के दिन भाखड़ा बांध की गोबिंद सागर झील में समा गया पुराना बिलासपुर, देश की तरक्की के लिए दी थी अपने अस्तित्व की आहुति, जानिए 11 हजार परिवारों के महाबलिदान की गाथा

खेत, खलिहान और देवी-देवताओं के मंदिर तक सब जलमग्न हो गए… जानिए 9 अगस्त को डूबी कहलूर रियासत के गौरव और त्याग की पूरी कहानी
यह कहानी हिमाचल प्रदेश के एक ऐसे स्वाभिमानी और बलिदानी शहर की है, जिसने देश की खुशहाली और तरक्की के लिए अपनी सदियों पुरानी विरासत, उपजाऊ जमीनें और अपने आशियाने को हंसते-हंसते पानी में डुबो दिया। 09 अगस्त 1961 का वह दिन इतिहास के पन्नों में में दर्ज है, जब भाखड़ा बांध के निर्माण के चलते पुराना बिलासपुर शहर और कहलूर रियासत की ऐतिहासिक निशानियां जलमग्न हो गईं।
भाखड़ा से लेकर बिलासपुर तक फैली इस विशाल झील की लंबाई करीब 70 किलोमीटर है। देश को बिजली और पानी से रोशन करने के लिए बिलासपुर जिले की लगभग 41 हजार एकड़ उपजाऊ भूमि इस झील की भेंट चढ़ गई। उस समय जिले के 11 हजार 777 परिवार रातों-रात बेघर हो गए थे। बेघर हुए लोगों में से कुछ ने आसपास के जंगलों में शरण ली, तो करीब 3 हजार 600 परिवारों को हरियाणा के सिरसा, हिसार और फरीदाबाद में जमीनें देकर पुनर्वासित किया गया, हालांकि इनमें से कुछ लोग बाद में वापस अपने बिलासपुर लौट आए।

भाखड़ा बांध के निर्माण की रूपरेखा बहुत पुरानी थी। इसकी प्रारंभिक योजना साल 1918 में संयुक्त पंजाब के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर लुईस डान के कार्यकाल में तैयार की गई थी। देश की आजादी के बाद, साल 1948 में इसका निर्माण कार्य शुरू हुआ और 1963 में यह महा-परियोजना पूरी हुई। जब भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इस बांध का उद्घाटन किया, तो उन्होंने इसे ‘आश्चर्यजनक और अद्वितीय‘ बताते हुए आधुनिक भारत का नया मंदिर कहा था।
बांध बनने से बिलासपुर को एक बहुत गहरा जख्म मिला। बिलासपुर का सुप्रसिद्ध सांडू मैदान, वहां के ऐतिहासिक बाजार, प्राचीन मंदिर, राजाओं के वैभवशाली महल, चौंटा घाटी का बेहद उपजाऊ क्षेत्र और लगभग दो सौ के करीब गांव पूरी तरह पानी में डूब गए। आज उन्हीं डूबे हुए ऐतिहासिक स्थलों के ऊपर विश्व की सबसे बड़ी मानव निर्मित कृत्रिम झीलों में से एक ‘गोबिंद सागर झील‘ हिलोरे ले रही है। पुराने बिलासपुर शहर और उसके प्रसिद्ध ‘रंगमहल‘ के किस्से आज भी यहां के बुजुर्गों की जुबान पर जीवंत हैं।

जब पुराने शहर के डूबने का संकट मंडरा रहा था, तब बिलासपुर के तत्कालीन राजा आनंद चंद ने भारत सरकार के समक्ष विस्थापितों और नए शहर का मुद्दा पुरजोर तरीके से उठाया। इसके बाद भारत सरकार के चीफ आर्किटेक्ट जुगलेकर ने एक नए नियोजित शहर का नक्शा तैयार किया। इस नए नगर का निर्माण कार्य साल 1956 में शुरू हुआ और 1963 में यह बनकर तैयार हुआ।
शुरुआत में इस नए शहर को रौड़ा, डियारा और चंगर नामक तीन प्रमुख सेक्टरों के प्रारूप में बांटा गया। बाद में लोगों ने आर्किटेक्ट के मूल प्लान से हटकर अपनी मर्जी से भवन निर्माण शुरू कर दिया, जिसके कारण यह शहर पूर्णतः योजनाबद्ध तरीके से विकसित नहीं हो सका। वर्तमान में इस बिलासपुर शहर के कुल 11 सेक्टर हैं।
बिलासपुर देश का एक ऐसा अनोखा और पहला विस्थापित शहर है, जो 999 साल की लीज (पट्टे) पर आधारित है। विडंबना यह है कि देश को अपना सब कुछ दान करने के बाद भी यहां रहने वाले लोग कानूनी तौर पर अपनी ही जमीनों और संपत्तियों के पूर्ण मालिक नहीं माने जाते हैं।

ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखें तो बिलासपुर शहर प्राचीन कहलूर रियासत के अधीन रहा है। इस रियासत की स्थापना को लेकर इतिहासकारों में दो मत हैं। कुछ ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, कहलूर रियासत की नींव राजा वीरचंद ने 697 ईस्वी में रखी थी। वहीं दूसरी ओर, डॉक्टर जॉन हचिसन और जे.पी. वोगल की प्रसिद्ध पुस्तक ‘History of the Punjab Hill States’ के अनुसार, राजा वीरचंद ने 900 ईस्वी में इस ऐतिहासिक रियासत की स्थापना की थी।

बिलासपुर हिमाचल प्रदेश का वह गौरवशाली जिला है, जिसने देश निर्माण के यज्ञ में अपने खेत-खलिहान, आस-पड़ोस और पूजनीय देवी-देवताओं के स्थान तक खो दिए, लेकिन कभी अपनी आंखें नम नहीं होने दीं। यह त्याग और राष्ट्रभक्ति की एक ऐसी मिसाल है, जिसे देश हमेशा नमन करेगा।
आज यहां के लोग इस झील को देखकर एक लोकगीत गाते हैं
चढ़ी आया पाणी देख कुंडरे तां सांडूए…करी लेणी झीला री सैर
101 साल पहले हुए काकोरी कांड की कहानी; 4,601 रुपए की लूट से बौखलाए अंग्रेजों ने 4 क्रांतिकारियों को दे दी थी फांसी
यह कहानी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उस ऐतिहासिक और जांबाज पन्ने की है, जिसने अंग्रेजी हुकूमत के अहंकार को बीच रास्ते में ही मलबे में तब्दील कर दिया था। यह कोई सामान्य लूटपाट नहीं थी, बल्कि विदेशी ताकतों के खिलाफ भारतीय वीरों का एक खुला और सुगठित शंखनाद था।

साल 1920 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने देशव्यापी असहयोग आंदोलन की शुरुआत की थी। कुछ ही वर्षों में यह आंदोलन अपने चरम पर पहुंच गया था, लेकिन 1922 में गोरखपुर के चौरी-चौरा में एक हिंसक कांड घटित हो गया। उग्र आंदोलनकारियों ने एक पुलिस थाने को घेरकर आग लगा दी, जिसमें 20 से भी ज्यादा पुलिसकर्मी जिंदा जलकर मारे गए। इस हिंसक घटना से आहत होकर गांधी जी ने अचानक असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। इस फैसले से पूरे देश में घोर निराशा का माहौल छा गया और सबसे ज्यादा आघात देश के युवा क्रांतिकारियों को लगा। आंदोलन के बंद होने से निराश इन युवाओं ने तय किया कि वे आजादी के लिए एक नए मार्ग का चयन करेंगे और एक मजबूत दल का गठन करेंगे।
इसी सोच के साथ शचीन्द्रनाथ सान्याल के कुशल नेतृत्व में ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ की स्थापना हुई। इस क्रांतिकारी संगठन में योगेशचन्द्र चटर्जी, रामप्रसाद बिस्मिल और सचिन्द्रनाथ बक्शी जैसे दिग्गज शामिल थे। बाद के दिनों में चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारी भी इस पार्टी से जुड़ गए। इस दल का स्पष्ट मानना था कि अंग्रेजों की क्रूरता के खिलाफ भारत की पूर्ण आजादी के लिए अब हथियार उठाना अनिवार्य हो चुका है।
हथियारों की खरीद और संगठन को चलाने के लिए भारी-भरकम धन की आवश्यकता थी। शुरुआत में पार्टी के सदस्यों ने धन की व्यवस्था के लिए कुछ जगहों पर डकैती डालने का प्रयास किया। लेकिन जल्द ही उन्हें अहसास हुआ कि इन डकैतियों में अक्सर निर्दोष भारतीय नागरिक मारे जाते हैं और ब्रिटिश सरकार इस बात का फायदा उठाकर क्रांतिकारियों को ‘चोर और डाकू’ कहकर जनता के बीच बदनाम करती है। इस दुष्प्रचार को रोकने के लिए क्रांतिकारियों ने एक बड़ा नीतिगत फैसला लिया कि अब किसी भी भारतीय नागरिक के घर डकैती नहीं डाली जाएगी, बल्कि सीधे ब्रिटिश सरकार के सरकारी खजाने को ही निशाना बनाया जाएगा। इसी रणनीति के तहत अंग्रेजों का खजाना लेकर जा रही एक सरकारी ट्रेन को लूटने का पूरा खाका तैयार किया गया।
09 अगस्त 1925 को सहारनपुर से लखनऊ की ओर बढ़ रही ‘8 डाउन ट्रेन’ को 10 जांबाज क्रांतिकारियों ने अपने निशाने पर लिया। जैसे ही यह ट्रेन काकोरी स्टेशन के पास पहुंची, क्रांतिकारियों ने इसकी चेन खींचकर इसे रोक दिया। बंदूक की नोक पर ट्रेन के गार्ड को बंधक बना लिया गया और सरकारी तिजोरी को तोड़कर उसमें रखे कुल 4,601 रुपए की रकम को सफलतापूर्वक अपने कब्जे में ले लिया गया।
इस घटना से तिलमिलाई ब्रिटिश सरकार ने आनन-फानन में पूरे उत्तर भारत में गिरफ्तारियों का दौर शुरू कर दिया। हालांकि इस पूरे मिशन को अंजाम देने में केवल 10 ही क्रांतिकारी शामिल थे, लेकिन दमनकारी सरकार ने महज एक महीने के भीतर करीब 40 लोगों को सलाखों के पीछे डाल दिया। लंबे चले मुकदमे के बाद 6 अप्रैल 1927 को अदालत ने अपना क्रूर फैसला सुनाया।
इस फैसले में राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह को सीधे फांसी की सजा मुकर्रर की गई। संगठन के कई अन्य सदस्यों को 14-14 साल तक की कठोर कारावास की सजा दी गई, जबकि सरकारी गवाह बनने की शर्त पर दो लोगों को रिहा भी किया गया। इस पूरे घटनाक्रम के बीच महान रणनीतिकार चंद्रशेखर आजाद पुलिस के हाथ नहीं आए और वे उनके चंगुल से दूर ही रहे (यद्यपि बाद में वे इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में अंग्रेजों से लोहा लेते हुए शहीद हुए)।
फांसी की सजा की खबर सुनते ही पूरे देश की जनता में भारी उबाल आ गया और लोग सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन करने लगे। लेकिन निर्दयी अंग्रेजों ने भारतीयों की एक न सुनी और क्रांतिकारियों को अलग-अलग जेलों में फांसी देने की तैयारी कर ली। सबसे पहले निर्धारित तिथि से दो दिन पूर्व, यानी 17 दिसंबर 1927 को गोंडा जेल में राजेंद्र लाहिड़ी को फांसी के फंदे पर लटका दिया गया।
इसके ठीक दो दिन बाद, 19 दिसंबर 1927 को रामप्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर जेल में हंसते-हंसते फांसी दे दी गई। इसी क्रम में अशफाक उल्ला खान ने फैजाबाद जेल में और ठाकुर रोशन सिंह ने इलाहाबाद (अब प्रयागराज) की जेल में भारत माता की जय बोलते हुए फांसी के फंदे को चूम लिया। काकोरी की इस घटना और इन महानायकों के सर्वोच्च बलिदान ने देश के भीतर स्वतंत्रता की ऐसी आग सुलगाई, जिसने अंततः अंग्रेजी हुकूमत को भस्म कर दिया।
1945: अमेरिका ने नागासाकी पर गिराया यूरेनियम बम, तीन दिन के भीतर दूसरे परमाणु हमले से दहल उठा जापान, घुटने टेकने पर हो गया मजबूर
यह घटना मानव इतिहास के उस सबसे भीषण और विनाशकारी सप्ताह की है, जिसने पूरी दुनिया को स्तब्ध कर दिया था। 6 अगस्त 1945 को हिरोशिमा पर ‘लिटिल बॉय’ गिराकर तबाही मचाने के बाद, अभी जापान संभल भी नहीं पाया था कि ठीक तीन दिन बाद अमेरिका ने दूसरा बड़ा प्रहार कर दिया।

09 अगस्त 1945 की अलसुबह अमेरिकी वायुसेना के B-29 लड़ाकू विमान ने तिनियन आइलैंड से उड़ान भरी। इस विमान में 4,050 किलोग्राम वजनी प्लूटोनियम परमाणु बम ‘फैट मैन’ लोड था, जो हिरोशिमा पर गिराए गए यूरेनियम बम से भी कहीं अधिक विनाशकारी था। अमेरिकी सेना का पहला टार्गेट जापान की प्रमुख औद्योगिक नगरी ‘कोकुरा’ थी, जहां बड़े पैमाने पर सेना के लिए गोला-बारूद बनाने वाली फैक्ट्रियां स्थित थीं।
विमान कुछ ही समय में कोकुरा के आसमान पर पहुंच भी गया, लेकिन उस दिन शहर के ऊपर घने बादल छाए हुए थे और धुंध के कारण टारगेट साफ दिखाई नहीं दे रहा था। इसके साथ ही अमेरिकी विमानों को जापानी राडार की पकड़ से भी बचना था। विजिबिलिटी बेहद खराब होने के कारण कैप्टन लियोनार्ड चेशर को तुरंत अपने दूसरे बैकअप टारगेट की ओर बढ़ने का कड़ा आदेश मिला। यह दूसरा टारगेट था नागासाकी शहर।
अमेरिकी विमान तेजी से नागासाकी की ओर मुड़ा और शहर के ऊपर पहुंचते ही विनाशकारी ‘फैट मैन’ को नीचे ड्रॉप कर दिया गया। सुबह ठीक 11 बजकर 2 मिनट पर इस बम को हवा में छोड़ा गया और करीब 50 सेकेंड बाद जमीन से कुछ ऊंचाई पर इसमें महाविस्फोट हुआ। विस्फोट होते ही पूरा नागासाकी शहर मलबे के ढेर में तब्दील हो गया। उस भयानक गर्मी और शॉकवेव के कारण पल भर में ही
मात्र 3 दिनों के भीतर हुए इन दो परमाणु हमलों ने जापानी साम्राज्य की कमर तोड़ दी और देश पूरी तरह तहस-नहस हो गया। इस महाविस्फोट के तुरंत बाद तो लाखों लोग मरे ही, लेकिन उस साल के अंत तक दोनों शहरों में मरने वालों का कुल आंकड़ा 2 लाख को पार कर गया। जो लोग इस परमाणु त्रासदी में किसी चमत्कार की वजह से जिंदा बच भी गए, वे जीवन भर एटॉमिक रेडिएशन (परमाणु विकिरण) के कारण कैंसर और ल्यूकेमिया (ब्लड कैंसर) जैसी जानलेवा बीमारियों से तड़पते रहे।
नागासाकी के इस भीषण विध्वंस के बाद जापान के पास घुटने टेकने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था। आखिरकार, 2 सितंबर 1945 को जापान ने आधिकारिक तौर पर मित्र देशों के सामने बिना शर्त आत्मसमर्पण कर दिया, और इसी के साथ छह वर्षों से चल रहे दूसरे विश्वयुद्ध का हमेशा के लिए अंत हो गया।
1971: आज ही के दिन दोस्ती के बंधन में बंधे थे भारत-रूस
आजादी के बाद से ही भारत और सोवियत संघ (रूस) के बीच संबंध हमेशा बेहद मजबूत और भरोसेमंद रहे हैं। दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के दौरों ने इस रिश्ते को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। जून 1955 में भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सोवियत संघ का दौरा किया था, जिसके बाद सोवियत राष्ट्रपति निकिता ख्रुश्चेव भी भारत यात्रा पर आए थे। रूस ने केवल राजनीतिक मोर्चे पर ही नहीं, बल्कि भारत के औद्योगिक और सैन्य विकास में भी अभूतपूर्व योगदान दिया।

भारत में बुनियादी उद्योगों को खड़ा करने के लिए रूस ने भिलाई, विशाखापट्टनम और बोकारो में विशाल स्टील प्लांट स्थापित करने में भारत की तकनीकी व आर्थिक मदद की। इसके साथ ही भारतीय वायुसेना को मजबूत करने के लिए सोवियत संघ ने अपने अत्याधुनिक मिग-21 (MiG-21) युद्धक विमान भी भारत को सौंपे थे। स्वयं प्रधानमंत्री नेहरू भी सोवियत संघ के आर्थिक और औद्योगिक मॉडल से गहराई से प्रभावित थे।
भारत और रूस के इन प्रगाढ़ संबंधों के इतिहास में आज का दिन यानी 09 अगस्त 1971 सबसे खास और मील का पत्थर माना जाता है, जब दोनों महाशक्तियों ने आधिकारिक तौर पर एक ऐतिहासिक मैत्री संधि पर हस्ताक्षर किए थे।
साल 1962 में भारत और चीन के बीच हुए युद्ध के बाद से सीमा पर तनाव बना हुआ था। दूसरी तरफ, भारत के पश्चिमी पड़ोसी पाकिस्तान और महाशक्ति अमेरिका के बीच नजदीकियां लगातार बढ़ती जा रही थीं, जिससे क्षेत्र में एक नया सैन्य समीकरण बन रहा था। पाकिस्तान की अप्रत्याशित नीतियों और उसकी हरकतों पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं किया जा सकता था। इन जटिल परिस्थितियों के कारण भारत को अपने दोनों पड़ोसी देशों (चीन और पाकिस्तान) से एक साथ बड़ा सुरक्षा खतरा महसूस होने लगा था। भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसे मजबूत और वीटो पावर से लैस मित्र की जरूरत थी जो संकट के समय ढाल बनकर खड़ा हो सके।
इन्हीं चुनौतीपूर्ण और नाजुक हालातों के बीच सोवियत संघ के विदेश मंत्री अंद्रेई ग्रोमिको भारत के दौरे पर आए। 1971 में आज ही के दिन (9 अगस्त) उन्होंने नई दिल्ली में भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री सरदार स्वर्ण सिंह के साथ मिलकर ‘सोवियत-भारत शांति, मित्रता और सहयोग संधि’ पर हस्ताक्षर किए। इस संधि ने न केवल दोनों देशों के बीच व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत किया, बल्कि इसमें एक बेहद महत्वपूर्ण सुरक्षा क्लॉज भी शामिल था, जिसके तहत किसी भी देश पर संकट आने की स्थिति में दोनों देश एक-दूसरे की मदद के लिए बाध्य थे। इस ऐतिहासिक संधि ने आगे चलकर 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारत की जीत सुनिश्चित करने और अमेरिकी व चीनी हस्तक्षेप को रोकने में सबसे निर्णायक भूमिका निभाई थी।
9 अगस्त के दिन को इतिहास में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय महत्व की इन घटनाओं की वजह से याद किया जाता है…
1173: दुनिया के सात अजूबों में से एक इटली के पीसा के लीनिंग टॉवर (झुकी हुई मीनार) का निर्माण शुरू हुआ।
1329: पोप जॉन 22वें ने भारत के केरल के कोल्लम (जिसे तब क्यूलोन कहा जाता था) में पहले कैथोलिक धर्मप्रदेश की स्थापना की।
1831: अमेरिका में पहली बार स्टीम इंजन ट्रेन चली।
1842: वेबस्टर एशबर्टन संधि के तहत अमेरिका और कनाडा की सीमा निर्धारित की गई।
1892: एडिसन को टू-वे टेलीग्राफ के लिए पेटेंट मिला।
1910: अल्वा फिशर ने बिजली से चलने वाली वाशिंग मशीन का पेटेंट हासिल किया।
1942: भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा के बाद अग्रेजों ने महात्मा गांधी को गिरफ्तार कर लिया।
1963: रूस की राजधानी मास्को में परमाणु हथियारों की परीक्षण प्रतिबंध संधि पर हस्ताक्षर करने वाला भारत पहला देश बना।
1965: सिंगापुर आधिकारिक तौर पर मलेशियाई संघ से अलग होकर एक पूर्ण संप्रभु और स्वतंत्र लोकतांत्रिक राष्ट्र बना। ली कुआन यू इसके पहले प्रधानमंत्री बने, जिन्होंने आगे चलकर सिंगापुर को एक वैश्विक आर्थिक महाशक्ति के रूप में बदला। 9 अगस्त सिंगापुर का राष्ट्रीय दिवस भी है।
1968: राज्यसभा में हिमाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा देने के मुद्दे पर चर्चा हुई। उस समय हिमाचल अभी केंद्रशासित प्रदेश था। पूर्ण राज्य का दर्जा बाद में 25 जनवरी 1971 को मिला।
1974: कुख्यात ‘वाटरगेट घोटाले’ में अपनी संलिप्तता और महाभियोग के निश्चित खतरे को देखते हुए रिचर्ड निक्सन ने अमेरिका के राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया था। वे पद से इस्तीफा देने वाले अमेरिका के पहले और एकमात्र राष्ट्रपति हैं।
1996: सचिन तेंदुलकर को भारतीय क्रिकेट टीम का कप्तान चुना गया।
1999: रूसी राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन ने प्रधानमंत्री सर्गेई स्तेपाशिन को पद से हटाकर संघीय सुरक्षा सेवा (FSB) के प्रमुख व्लादिमीर पुतिन को देश का कार्यवाहक प्रधानमंत्री नियुक्त किया।
2005: नासा का अंतरिक्षयान ‘डिस्कवरी’ (STS-114 मिशन) 14 दिन की सफल लेकिन जोखिम भरी उड़ान के बाद कैलिफ़ोर्निया के एडवर्ड्स एयरफोर्स बेस पर सकुशल उतरा।
2012: भारतीय सेना ने परमाणु हमला करने में सक्षम अग्नि-2 बैलेस्टिक मिसाइल का सफल परीक्षण किया।
2016: 16 साल से भूख हड़ताल कर रहीं मणिपुर की इरोम शर्मिला ने शहद खाकर अपनी भूख हड़ताल खत्म की। इसे दुनिया की सबसे ज्यादा दिनों तक चलने वाली भूख हड़ताल माना जाता है।
2023: केरल का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने के लिए विधानसभा पास। ‘केरलम’ केरल की मूल मलयालम भाषा का शब्द है।
2024: ब्राजील के साओ पाउलो के पास हुए विमान हादसे में सवार सभी 62 लोगों की मौत हो गई।
2024: पेरिस ओलंपिक में भारत के युवा पहलवान अमन सहरावत ने पुरुषों के 57 किलोग्राम फ्रीस्टाइल कुश्ती मुकाबले में पर्टो रीको के डैरियन क्रूज़ को हराकर कांस्य पदक जीता। वह ओलंपिक पदक जीतने वाले भारत के सबसे युवा (21 वर्ष) खिलाड़ी बने।
2025: भारत चुनाव आयोग ने नियमों का पालन न करने और साल 2019 के बाद से एक भी चुनाव न लड़ने के कारण 334 पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को अपनी सूची से डिलीट कर दिया।
09 अगस्त को जन्मे प्रमुख व्यक्ति
1892: एस. आर. रंगनाथन– भारत के प्रख्यात गणितज्ञ और पुस्तकालय वैज्ञानिक। इन्हें “भारत में पुस्तकालय विज्ञान का जनक” कहा जाता है। उनकी याद में ही भारत में ‘राष्ट्रीय पुस्तकालय दिवस’ मनाया जाता है।
1893: शिवपूजन सहाय– हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध उपन्यासकार, कहानीकार और पत्रकार, जिन्हें हिंदी गद्य के सजग शिल्पी के रूप में आदर से याद किया जाता है।
1909: विनायक कृष्ण गोकाक – ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ से सम्मानित पांचवे लेखक।
1911: विलियम अल्फ्रेड फाउलर– अमेरिकी खगोलभौतिकीविद्। तारों के अंदर रासायनिक तत्वों के निर्माण पर उनके शोध के लिए उन्हें 1983 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला था।
1915: हितेन्द्र देसाई – गुजरात के तीसरे मुख्यमंत्री।
1927: मार्विन मिंस्की – महान अमेरिकी वैज्ञानिक थे। उन्हें ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का जनक’ कहा जाता है। उन्होंने साल 1959 में जॉन मैकार्थी के साथ मिलकर मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) में दुनिया की पहली AI प्रयोगशालाओं में से एक की स्थापना की थी।
1938: रॉड लेवर – ऑस्ट्रेलिया के महान टेनिस खिलाड़ी। टेनिस के इतिहास में दो बार ‘कैलेंडर-वर्ष ग्रैंड स्लैम’ (एक ही साल में चारों बड़े टूर्नामेंट जीतने) वाले वे दुनिया के इकलौते पुरुष खिलाड़ी हैं।
1933: मनोहर श्याम जोशी – आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध गद्यकार, उपन्यासकार, व्यंग्यकार, पत्रकार, दूरदर्शन धारावाहिक लेखक, जनवादी-विचारक, फिल्म पट-कथा लेखक, उच्च कोटि के संपादक, कुशल प्रवक्ता तथा स्तंभ-लेखक।
1974: महेश बाबू– तेलुगु सिनेमा के सुपरस्टार और भारत के लोकप्रिय अभिनेता।
1993: दीपा करमरकर– ओलंपिक जिम्नास्टिक्स में भाग लेने वाली पहली भारतीय महिला। उन्हें ‘मेजर ध्यानचंद खेल रत्न’ और ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया जा चुका है।
09 अगस्त को हुए प्रमुख निधन
1962: हरमैन हीसे– जर्मनी के शायर और लेखक नोबेल पुरुस्कार।
1970: त्रिलोकनाथ चक्रवर्ती– जीवन में 30 वर्ष जेल में बिताने वाले स्वतंत्रता सेनानी।
2002: रामकिंकर उपाध्याय– पद्म भूषण से सम्मानित प्रसिद्ध कथावाचक एवं हिन्दी साहित्यकार।
2016: कलिखो पुल – अरुणाचल प्रदेश के 8वें मुख्यमंत्री।
09 अगस्त के महत्त्वपूर्ण अवसर एवं उत्सव
विश्व आदिवासी दिवस

संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिवर्ष 09 अगस्त को दुनिया भर की जनजातियों, मूल निवासियों के अधिकारों के संरक्षण के लिए विश्व आदिवासी दिवस (International Day of the World’s Indigenous Peoples) मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य आदिवासियों की अनूठी संस्कृति, भाषा, पारंपरिक ज्ञान को सहेजना और समाज में उनके मानवाधिकारों व भूमि अधिकारों के प्रति जागरूकता लाना है। भारत (विशेषकर हिमाचल प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और उत्तर-पूर्वी राज्यों) में इस दिन बड़े पैमाने पर सांस्कृतिक उत्सव और रैलियां आयोजित की जाती हैं।
प्रस्तुति
हिमाचल न्यूज़ रिसर्च डेस्क
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Posted By: Himachal News
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| सितंबर | 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 |
| अक्टूबर | 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 |
| नवंबर | 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 |
| दिसंबर | 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 |



