18 August in History: ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार वर्ष का 230वां दिन (लीप वर्ष में 231वां दिन) है। साल में अभी और 135 दिन शेष हैं। भारत और विश्व इतिहास में 18 अगस्त का खास महत्व है, क्योंकि इस दिन कई महत्वपूर्ण घटनाएं घटी जो इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज होकर रह गईं हैं।
आज का इतिहास में जानिए आज के दिन जन्मे चर्चित व्यक्ति, प्रसिद्ध व्यक्तियों के निधन, युद्ध संधि, किसी देश की आजादी, नई तकनिकी का अविष्कार, सत्ता का बदलना, महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दिवस के बारे में। आईए हिमाचल न्यूज़ में पढ़ें भारत और विश्व इतिहास के पन्नों में दर्ज 18 अगस्त का इतिहास एवं घटनाक्रम।
81 साल बाद भी रहस्य है नेताजी की मौत, जिस प्लेन क्रैश में उनके निधन की बात, उसका रिकॉर्ड ही नहीं
“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” का नारा देकर देशवासियों के दिलों में स्वाधीनता की अलख जगाने वाले और ‘आजाद हिंद फौज’ के संस्थापक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की पुण्यतिथि पर पूरा देश उन्हें कोटि-कोटि नमन कर रहा है।
द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम दौर में 18 अगस्त 1945 को घटी वह घटना आज भी आधुनिक भारत के इतिहास का सबसे बड़ा और अनसुलझा रहस्य बनी हुई है।

अगस्त 1945 में जब जापान ने द्वितीय विश्व युद्ध में समर्पण कर दिया, तो ब्रिटिश हुकूमत नेताजी के पीछे हाथ धोकर पड़ गई। परिस्थितियों की गंभीरता को देखते हुए नेताजी ने सोवियत संघ (रूस) से मदद मांगने की रणनीति बनाई।
18 अगस्त 1945: नेताजी ने फौरमोजा (अब ताइवान) के ताइहोकू (ताइपे) हवाई अड्डे से मंचूरिया की ओर जाने के लिए एक जापानी सैन्य बॉम्बर विमान से उड़ान भरी। घटना के 5 दिन बाद, 23 अगस्त 1945 को ‘टोक्यो रेडियो’ ने बुलेटिन जारी कर खबर दी कि 18 अगस्त को ताइहोकू हवाई अड्डे के पास नेताजी का विमान टेकऑफ के तुरंत बाद क्रैश हो गया। इस हादसे में नेताजी गंभीर रूप से झुलस गए और ताइहोकू के सैन्य अस्पताल में उनका निधन हो गया। टोक्यो के प्रसिद्ध रैंकोजी मंदिर में रखी अस्थियों को आज भी नेताजी की अस्थियां माना जाता है।
नेताजी की मौत का सच जानने और देशवासियों के संशय को दूर करने के लिए भारत सरकार ने समय-समय पर तीन जांच समितियों का गठन किया।
सन 1956 में बनी शाहनवाज खान समिति ने निष्कर्ष निकाला कि नेताजी की मौत प्लेन क्रैश में ही हुई थी। सन 1970 में जी. डी. खोसला आयोग ने भी प्लेन क्रैश की थ्योरी की पुष्टि की। जस्टिस मनोज कुमार मुखर्जी आयोग (1999) की रिपोर्ट ने पूरी थ्योरी को पलट कर रख दिया। मुखर्जी आयोग ने ताइवान सरकार के आधिकारिक रिकॉर्ड्स के हवाले से कहा कि 18 अगस्त 1945 को ताइहोकू हवाई अड्डे पर कोई विमान हादसा हुआ ही नहीं था। हालांकि, तत्कालीन सरकार ने इस आयोग की इस रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया।
विमान हादसे की खबर के बाद भी देश के विभिन्न हिस्सों में नेताजी के जीवित होने और देखे जाने के दावे दशकों तक उठते रहे। उत्तर प्रदेश के फैजाबाद (अयोध्या) में रहने वाले एक साधु ‘गुमनामी बाबा’ के नेताजी होने का दावा सबसे ज्यादा चर्चा में रहा। सन 1985 में उनके निधन के बाद उनके कमरे से ऐसे सामान मिले जिसने सबको हैरान कर दिया। नेताजी के परिवार की पुरानी तस्वीरें, जर्मन व जापानी भाषा की किताबें, कई प्रतिष्ठित हस्तियों के पत्र और शाहनवाज व खोसला आयोग की मूल रिपोर्ट की प्रतियां।
छत्तीसगढ़ में भी नेताजी को देखे जाने और उनके रहने के दावे सामने आए थे। यह मामला राज्य सरकार के पटल तक भी पहुंचा, लेकिन सरकार ने आधिकारिक रूप से इसमें हस्तक्षेप करने से मना कर दिया।
81 साल बीत जाने के बाद भी आज भी भारत मां का यह वीर सपूत देशवासियों के दिलों में अमर है और उनकी अंतिम यात्रा का सच इतिहास के पन्नों में एक अधूरा सवाल बना हुआ है।
बैरिया शहादत दिवस: क्रांति का वो खूनी पन्ना जब 18 अगस्त 1942 को बैरिया थाने पर तिरंगा फहराते समय 18 क्रांतिकारियों ने दी जान, स्कूली बच्चे भी थे शामिल
महात्मा गांधी ने 8 अगस्त 1942 को जब ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का शंखनाद किया और देशवासियों को “करो या मरो” का महामंत्र दिया, तो उसकी ज्वाला पूरे देश में दावानल बनकर फैल गई। उत्तर प्रदेश का पूर्वांचल, और खासकर बलिया जिला, इस इंकलाब का सबसे बड़ा और खौफनाक केंद्र बन चुका था।

चारों तरफ जनाक्रोश का उफान था। लोग सड़कों पर उतर आए थे, ब्रिटिश हुकूमत के दफ्तरों को घेरा जा रहा था और रेल पटरियां उखाड़ दी गई थीं। बौखलाए अंग्रेजों ने दमन चक्र चलाते हुए शीर्ष नेताओं को सलाखों के पीछे ठूंस दिया। फिरंगियों को लगा था कि बिना नेतृत्व के जनता की यह आग शांत हो जाएगी, लेकिन वे यह भूल गए थे कि यह ‘बागी बलिया’ है –जहां की माटी का बच्चा-बच्चा अपनी मातृभूमि की आजादी के लिए हंसते-हंसते सीने पर गोली खाने का मद्दा रखता है।
13 अगस्त को बनारस से पहुंची ट्रेन से उतरे छात्रों ने चितबड़ागांव स्टेशन को फूंक दिया। 14 अगस्त को जब मिडिल स्कूल के मासूम बच्चे हाथ में तिरंगा लेकर जुलूस निकाल रहे थे, तो क्रूर पुलिसकर्मियों ने उन पर घोड़ों की टापें बरसा दीं। इस बर्बरता ने बलिया के खून में ऐसा उबाल लाया कि 16 अगस्त को लोहापट्टी और गुदरी बाजार में पुलिस की गोलियों का सामना करते हुए दुखी कोइरी समेत 7 देशभक्त शहीद हुए, तो 17 अगस्त को रसड़ा की धरती 4 वीरों के खून से लाल हो गई।
इन्हीं सुलगते अंगारों के बीच 18 अगस्त 1942 की सुबह बैरिया के इतिहास में सदा-सदा के लिए अमर होने जा रही थी।
घटना से ठीक दो दिन पहले भूपनारायण सिंह और सुदर्शन सिंह के नेतृत्व में उमड़े अपार जनसैलाब के डर से बैरिया थाने के थानेदार काजिम के हाथ-पांव फूल गए थे। उसने खुद ही कांपते हाथों से थाने पर तिरंगा फहराया और परिसर खाली करने के लिए क्रांतिकारियों से दो दिन की मोहलत मांगी।
लेकिन उस धोखेबाज थानेदार के दिल में गद्दारी पल रही थी। उसने उसी रात चुपके से जिला मुख्यालय से पांच सशस्त्र पुलिसकर्मियों की टुकड़ी बुलवा ली और थाने पर लहराते तिरंगे को उतरवाकर फिंकवा दिया।
अगली सुबह जैसे ही इस गद्दारी की खबर गांव-गांव फैली, आजादी के दीवानों का गुस्सा अपनी हदों को पार कर गया। 18 अगस्त की दोपहर होते-होते 20 हजार से अधिक देशभक्तों के महासमुद्र ने बैरिया थाने को चारों तरफ से घेर लिया।
भीड़ का प्रचंड और विकराल रूप देखकर थानेदार और उसके सिपाही थाने की छत पर चढ़ गए। वहां से उन्होंने निहत्थी जनता पर अंधाधुंध गोलियों की बौछार शुरू कर दी। चारों तरफ गोलियों की तड़तड़ाहट, बारूद का धुआं और अपनों का खून बह रहा था, लेकिन ‘बागी बलिया’ के सपूत पीछे हटने वाले नहीं थे।
तभी भीड़ के बीच से एक स्कूली छात्र, वीर बालक कौशल कुमार, हाथ में तिरंगा थामे भारत माता की जय का नारा लगाते हुए आगे बढ़ा। गोलियों की सीधी बौछार के बीच अपनी जान की रत्ती भर परवाह किए बिना वह छात्र छलांग लगाकर थाने की छत पर जा पहुंचा। दगाबाज पुलिसकर्मियों की आंखों के सामने उसने एक बार फिर गर्व से तिरंगा लहरा दिया। लेकिन उसी पल अंग्रेजों की एक क्रूर गोली कौशल कुमार के सीने को चीरती हुई निकल गई। वीर बालक तिरंगे को लहराता हुआ वहीं गिर पड़ा और आजादी की छांव में सदा के लिए अमर हो गया।
उस खूनी दोपहर बैरिया थाने के आंगन में कौशल कुमार समेत 18 अमर शहीदों ने अपने प्राणों की आहुति दी, जिनमें कई स्कूली बच्चे भी शामिल थे।
बैरिया के उस ऐतिहासिक संग्राम और मासूमों की शहादत ने ऐसी ज्वाला सुलगाई कि अंग्रेजी हुकूमत की नींव पूरी तरह हिल गई। इस शहादत के ठीक अगले ही दिन, 19 अगस्त 1942 को, चित्तू पांडे के नेतृत्व में बलिया के वीरों ने अंग्रेजों को खदेड़ दिया और बलिया को देश का सबसे पहला ‘स्वतंत्र जिला’ घोषित कर दिया।
इसीलिए हर साल 18 अगस्त को पूरा देश और बैरिया ‘शहादत दिवस’ के रूप में उन वीरों को नमन करता है, जिन्होंने अपनी छाती पर अंग्रेजों की गोलियां खाकर आजाद भारत की पहली नींव रखी थी।
ये क्रांतिकारी हो गये शहीद: गोन्हिया छपरा निवासी निर्भय कुमार सिंह, देवबसन कोइरी, विशुनपुरा निवासी नरसिंह राय, तिवारी के मिल्की निवासी रामजनम गोंड, चांदपुर निवासी रामप्रसाद उपाध्याय, टोलागुदरीराय निवासी मैनेजर सिंह, सोनबरसा निवासी रामदेव कुम्हार, बैरिया निवासी रामबृक्ष राय, रामनगीना सोनार, छठू कमकर, देवकी सोनार, शुभनथही निवासी धर्मदेव मिश्र, मुरारपट्टी निवासी श्रीराम तिवारी, बहुआरा निवासी मुक्तिनाथ तिवारी, श्रीपालपुर निवासी विक्रम सोनार, भगवानपुर निवासी भीम अहीर शामिल थे। जबकि दयाछपरा निवासी गदाधर नाथ पांडेय, मधुबनी निवासी गौरीशंकर राय, गंगापुर निवासी रामरेखा शर्मा सहित तीन लोगों की जेल यातना में शहादत हुई।
ब्रह्मांड के दूसरे सबसे बड़े राज की खोज: जब 18 अगस्त 1868 को भारत की धरती ने दिया दुनिया को ‘हीलियम’
आज जिस हीलियम गैस का इस्तेमाल हम गुब्बारों को चमकाने से लेकर रॉकेट के ईंधन और एमआरआई (MRI) मशीनों को ठंडा रखने में करते हैं, उसका इतिहास भारत और 18 अगस्त 1868 के दिन से बेहद गहराई से जुड़ा हुआ है। बेहद दिलचस्प बात यह है कि हीलियम कोई ऐसी गैस नहीं थी जिसकी खोज सबसे पहले हमारी धरती की प्रयोगशालाओं में हुई हो, बल्कि इसका राज तो लाखों मील दूर दहकते सूरज के सीने में छिपा हुआ था।

18 अगस्त 1868… आंध्र प्रदेश के गुंटूर शहर में एक दुर्लभ पूर्ण सूर्यग्रहण दिखाई दे रहा था। दुनिया भर के खगोलशास्त्री इस पल का गवाह बनने पहुंचे थे, जिनमें फ्रांस के जाने-माने वैज्ञानिक जूल्स जैंसेन भी शामिल थे। जैंसेन ने सूर्यग्रहण के समय सूरज के बाहरी वायुमंडल से निकलने वाली किरणों को जब एक प्रिज्म से गुजारा, तो उसके स्पेक्ट्रम में एक अनोखी और बेहद चमकीली पीली रेखा दिखाई दी। शुरुआत में तो जैंसेन को भ्रम हुआ कि यह पीली रेखा सोडियम तत्व की मौजूदगी के कारण बन रही है।
लेकिन उसी साल ब्रिटेन के खगोलशास्त्री जोसेफ नॉर्मन लॉकयर ने भी सूरज की रोशनी के इस स्पेक्ट्रम का गहराई से अध्ययन किया। जोसेफ ने पाया कि यह पीली रेखा सोडियम से निकलने वाली पारंपरिक लाइनों से बिल्कुल अलग है, इसलिए उन्होंने इसे ‘D3 लाइन’ नाम दिया। जोसेफ इस नतीजे पर पहुंचे कि यह रेखा सूर्य के भीतर मौजूद किसी ऐसे नए तत्व की वजह से चमक रही है, जो इंसानों के लिए अब तक अज्ञात है। यूनानी (ग्रीक) भाषा में सूर्य को ‘हेलियोस’ कहा जाता है, इसी आधार पर उन्होंने ब्रह्मांड के इस नए मेहमान का नाम ‘हीलियम’ रख दिया।
सूरज के वायुमंडल में खोजे जाने के बाद भी करीब 27 वर्षों तक वैज्ञानिक यही समझते रहे कि हीलियम केवल सूर्य पर ही पाई जाती है, धरती पर इसका कोई अस्तित्व नहीं है। लेकिन यह रहस्य 1895 में तब टूटा जब ब्रिटिश रसायनशास्त्री विलियम रामसे ने क्लेवीट नामक एक रेडियोएक्टिव खनिज को गर्म किया। उसके स्पेक्ट्रम में भी वही जानी-पहचानी सूर्य वाली पीली रेखा उभर आई, जिसने पहली बार अधिकारिक तौर पर मुहर लगा दी कि हीलियम हमारी धरती पर भी मौजूद है।
18 अगस्त के दिन को इतिहास में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय महत्व की इन घटनाओं की वजह से याद किया जाता है…
1800: ब्रिटिश भारत के गवर्नर-जनरल लॉर्ड वेलेजली ने कलकत्ता (कोलकाता) में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की थी। इसका मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश अधिकारियों को भारतीय भाषाओं, कानूनों और रीति-रिवाजों से परिचित कराना था।
1891: कैरेबियाई सागर में स्थित मार्टिनिक द्वीप पर एक विनाशकारी चक्रवाती तूफान (जिसे ‘सैन मागिन’ भी कहा जाता है) आया था, जिससे लगभग 712 लोगों की मौत हुई थी।
1920: अमेरिका में महिलाओं को वोटिंग का अधिकार मिला।
1940: टेलीविजन पर पहली बार मौसम मानचित्र (वेदर मैप) का प्रसारण किया गया था। इतिहास के पन्नों में इस दिन को प्रसारण और मौसम विज्ञान के मेल के एक अनोखे पड़ाव के रूप में याद किया जाता है।
1950: कनाडाई सर्जन डॉ. विलफ्रैड जी. बिगलो ने हाइपोथर्मिया (शरीर का तापमान कम करने की तकनीक) का उपयोग करके पहली बार ओपन-हार्ट सर्जरी का सफल प्रयोग किया था।
1951: भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने देश के पहले भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान IIT खड़गपुर का उद्घाटन किया।
1963: अमेरिका में जेम्स मेरीडिथ मिसिसीपी विश्वविद्यालय से स्नातक करने वाला पहला अश्वेत व्यक्ति। यह ऐतिहासिक उपलब्धि उन्हें अमेरिकी नागरिक अधिकार आंदोलन की बाद मिली जिसके लिए उन्हें भारी विरोध के बीच संघीय सुरक्षा का सामना करना पड़ा था।
2000: इंग्लैंड ने वेस्टइंडीज को हराकर दो दिन में टेस्ट जीतने का इतिहास रचा।
2008: पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने महाभियोग की आशंका के बीच अपने पद से इस्तीफा दिया।
18 अगस्त को जन्मे प्रमुख व्यक्ति
1700: बाजीराव प्रथम – मराठा साम्राज्य के महान सेनानायक और पेशवा। वे 1720 से 1740 तक मराठा साम्राज्य के चौथे छत्रपति शाहूजी महाराज के पेशवा रहे और मराठा शक्ति का तेजी से विस्तार किया। उन्होंने मुगल साम्राज्य के विरुद्ध कई सफल सैन्य अभियान चलाए और मराठा साम्राज्य को उत्तर भारत तक मजबूत बनाया। उन्होंने अपने जीवन में लड़े गए 41 से अधिक युद्धों में पराजय का सामना नहीं किया
1872: विष्णु दिगम्बर पलुस्कर – महान हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायक और संगीत शिक्षक थे। उन्होंने शास्त्रीय संगीत को राजदरबारों से निकालकर आम जनता तक पहुंचाया।
1900: विजयलक्ष्मी पण्डित – स्वतंत्रता सेनानी। वे संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष बनीं। वह भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की बहन थी।
1923: लेफ्टिनेंट कर्नल ए. बी. तारापोरे – परमवीर चक्र से सम्मानित भारतीय सैनिक। इन्होंने भारत-पाकिस्तान युद्ध 1965 में अद्वितीय साहस व वीरता का परिचय दिया तथा देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। फिल्लौर की लड़ाई में अद्भुत शौर्य का प्रदर्शन करने के लिए इन्हें वर्ष 1965 में मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
1934: गुलजार – प्रसिद्ध भारतीय कवि, गीतकार, लेखक और फिल्म निर्देशक, जिन्होंने हिंदी तथा उर्दू साहित्य और भारतीय सिनेमा में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी रचनाओं के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, पद्म भूषण और दादा साहब फाल्के पुरस्कार सहित अनेक सम्मान मिले।
1938: डॉ. बेल्ले मोनप्पा हेगड़े – प्रसिद्ध भारतीय हृदय रोग विशेषज्ञ, चिकित्सा शिक्षक और लेखक, जिन्होंने चिकित्सा शिक्षा तथा स्वास्थ्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे मणिपाल अकादमी ऑफ हायर एजुकेशन के कुलपति भी रहे।
1952: अरुणा ईरानी – भारतीय अभिनेत्री, जिन्होंने हिंदी, मराठी और गुजराती फिल्मों में लंबे समय तक काम किया।
1956: संदीप पाटिल – भारतीय क्रिकेटर। वे क्रिकेट प्रशिक्षक और चयनकर्ता भी रहे।
1959: निर्मला सीतारमण – भारत सरकार में वित्त मंत्री और रक्षा मंत्री सहित महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। वे भारत की पहली महिला वित्त मंत्री हैं।
1967: दलेर मेहंदी – प्रसिद्ध भारतीय पंजाबी गायक, जिन्होंने भांगड़ा और पंजाबी पॉप संगीत को देश-विदेश में लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ‘बोलो ता रा रा’ और ‘तुनक तुनक तुन’ जैसे गीतों से उन्हें व्यापक लोकप्रियता मिली।
18 अगस्त को हुए प्रमुख निधन
1227: चंगेज़ ख़ान – मंगोल साम्राज्य के संस्थापक और इतिहास का सबसे बड़ा भू-साम्राज्य स्थापित करने वाला खूंखार मंगोल सम्राट। उन्होंने 13वीं शताब्दी में विशाल मंगोल साम्राज्य की नींव रखी।
1979: वसंतराव नाइक – महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री। प्रथम किसान मुख्यमंत्री के रुप में देशभर में उनका जिक्र किया जाता है। वे हरित क्रांति, पंचायति राज, श्वेत क्रांति और रोजगार गारंटी योजना के जनक माने जाते हैं।
1990: श्री नारायण चतुर्वेदी – हिन्दी के साहित्यकार तथा सरस्वती पत्रिका के संपादक।
1998: पर्सिस खंबाटा -प्रसिद्ध भारतीय मॉडल और हॉलीवुड अभिनेत्री। वह 1965 की ‘फेमिना मिस इंडिया’ रही।
2018: कोफ़ी अन्नान – संयुक्त राष्ट्र संघ के सातवें महासचिव थे।
2025: अच्युत पोतदार – भारतीय अभिनेता। उन्होंने 125 से ज़्यादा बॉलीवुड फ़िल्मों, 95 धारावाहिकों, 26 नाटकों और 45 विज्ञापनों में काम किया है।
प्रस्तुति
हिमाचल न्यूज़ रिसर्च डेस्क
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