25 July in History: ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार वर्ष का 206वां दिन (लीप वर्ष में 207वां दिन) है। साल में अभी और 159 दिन शेष हैं। भारत और विश्व इतिहास में 25 जुलाई का खास महत्व है, क्योंकि इस दिन कई महत्वपूर्ण घटनाएं घटी जो इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज होकर रह गईं हैं।
25 जुलाई भारत में राष्ट्रपति पद की शपथ ग्रहण तिथि के रूप में ऐतिहासिक महत्व रखती है। 1997 से 2022 तक कई राष्ट्रपतियों ने इसी दिन पदभार ग्रहण किया।
आज का इतिहास में जानिए आज के दिन जन्मे चर्चित व्यक्ति, प्रसिद्ध व्यक्तियों के निधन, युद्ध संधि, किसी देश की आजादी, नई तकनिकी का अविष्कार, सत्ता का बदलना, महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दिवस के बारे में। आईए हिमाचल न्यूज़ में पढ़ें भारत और विश्व इतिहास के पन्नों में दर्ज 25 जुलाई का इतिहास एवं घटनाक्रम।
25 जुलाई 1978: एक ऐसी ऐतिहासिक रात, जिसने मेडिकल साइंस का इतिहास बदल दिया
282 नाकामियों के बाद खिला एक नन्हा फूल: दुनिया की पहली टेस्ट ट्यूब बेबी की कहानी

25 जुलाई 1978 की वो सुहानी रात। इंग्लैंड के मैनचेस्टर शहर का ‘डिस्ट्रिक्ट जनरल अस्पताल’ आम दिनों की तरह शांत नहीं था। पूरे परिसर में अजीब सी हलचल थी। डॉक्टरों की भाग-दौड़ के बीच बाहर मीडियाकर्मियों का भारी जमावड़ा लगा हुआ था। सभी की उत्सुकता और निगाहें केवल एक ही जगह टिकी थीं…अस्पताल का डिलीवरी वार्ड।
वार्ड के अंदर दो दिग्गज चेहरे…प्रख्यात गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. पैट्रिक स्टेपटो और वैज्ञानिक रॉबर्ट एडवर्ड्स एक बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक ऑपरेशन की तैयारियों में लीन थे।
घड़ी की सुइयों ने जैसे ही रात के साढ़े ग्यारह बजाए, डिलीवरी वार्ड का दरवाजा खुला और खबर आई…“मुबारक हो, स्वस्थ बेटी हुई है!”
यह सुनते ही बाहर खड़े पत्रकारों और लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई। अगली ही सुबह दुनिया भर के अखबारों के फ्रंट पेज पर एक ही गूंज थी “दुनिया की पहली ‘टेस्ट ट्यूब बेबी’ का जन्म”
इस चमत्कारिक घटना की कहानी कुछ साल पहले शुरू हुई थी। लेस्ली और उनके पति पीटर ब्राउन शादी के बाद से ही माता-पिता बनने का सपना संजोए हुए थे। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। लेस्ली की फेलोपियन ट्यूब्स में खराबी के कारण कुदरत उन्हें माँ बनने का सुख नहीं दे पा रही थी।
तमाम डॉक्टरी इलाज के बाद लेस्ली लगभग अपनी उम्मीदें खो चुकी थीं। तभी उनके कानों में डॉक्टर पैट्रिक स्टेपटो और वैज्ञानिक रॉबर्ट एडवर्ड्स का नाम पड़ा, जो उस दौर में एक नई और अनूठी तकनीक IVF (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) पर शोध कर रहे थे।
डॉ. पैट्रिक और रॉबर्ट एडवर्ड्स पिछले एक दशक से रात-दिन एक करके लैब में बच्चे के निर्माण की तकनीक पर काम कर रहे थे। लेस्ली से पहले वे 282 महिलाओं पर इस तकनीक का प्रयास कर चुके थे। जिनमें से केवल 5 महिलाएं ही गर्भधारण कर सकी थीं, लेकिन अफ़सोस, विभिन्न चिकित्सीय जटिलताओं के कारण एक भी बच्चा दुनिया में नहीं आ सका था।
फिर आया नवंबर 1977 का महीना। लेस्ली और पीटर ने अपनी आखिरी उम्मीद के तौर पर इस प्रयोग के लिए हाँ कहा। डॉक्टरों ने लैब की कांच की डिश में लेस्ली के एग (अंडे) और पीटर के स्पर्म (शुक्राणु) का मिलन कराकर एक भ्रूण (Embryo) तैयार किया। फिर इस नन्हे से भ्रूण को बड़ी ही सावधानी से लेस्ली के गर्भाशय में रोपित (Implant) कर दिया गया।
जैसे ही लेस्ली की प्रेग्नेंसी की खबर फैली, मीडिया में हड़कंप मच गया। इसे लेकर तरह-तरह की बहसें और विवाद भी शुरू हो गए।
तमाम आशंकाओं, विवादों और वैज्ञानिक कसौटियों को पार करते हुए 25 जुलाई 1978 को जब नन्हीं लुईस ब्राउन ने इस दुनिया में पहली सांस ली, तो विज्ञान ने इतिहास रच दिया था। लुईस रातों-रात दुनिया की सबसे मशहूर बच्ची बन गईं। अखबार, पत्रिकाएं और टीवी—हर तरफ बस लुईस की ही तस्वीरें थीं।
कहानी यहीं खत्म नहीं होती! कुछ सालों बाद लेस्ली और पीटर ने फिर से IVF का सहारा लिया और उनके घर दूसरी बेटी नटाली का जन्म हुआ।
मई 1999 में जब नटाली खुद माँ बनीं, तो उन्होंने एक और नया इतिहास रच दिया। नटाली दुनिया की पहली ऐसी महिला बनीं, जिनका खुद का जन्म तो IVF तकनीक से हुआ था, लेकिन उन्होंने अपने बच्चे को बिल्कुल स्वाभाविक (Normal) तरीके से जन्म दिया।
25 जुलाई 1978 को मैनचेस्टर के उस अस्पताल में जन्मी नन्हीं लुईस केवल एक बच्ची नहीं थी, बल्कि वो दुनिया भर के उन करोड़ों निःसंतान दंपतियों की उम्मीदों की जिंदा मिसाल थी, जो माँ-बाप बनने का सपना देखते थे। आज वही तकनीक (IVF) हर साल दुनिया भर में लाखों परिवारों के आँगन को खुशियों और बच्चों की किलकारियों से महका रही है।
1984: जब अंतरिक्ष के सन्नाटे में एक महिला ने रचा इतिहास

8 अगस्त 1948 को मॉस्को की गलियों में जन्मी एक नन्हीं बच्ची की आँखों में बचपन से ही आम बच्चों की तरह जमीनी खेल नहीं, बल्कि अनंत आसमान को फतह करने के सपने पल रहे थे। इस बच्ची का नाम था स्वेतलाना सवित्स्काया।
स्वेतलाना के पिता सोवियत संघ की सेना में एक सम्मानित पायलट थे। घर का माहौल ही ऐसा था कि हवाओं से बातें करना उनके खून में बस गया। वर्ष 1966 में अपनी ग्रेजुएशन पूरी करने के तुरंत बाद, उन्होंने ‘मॉस्को स्टेट एविएशन इंस्टीट्यूट’ का रुख किया। उनकी लगन और जज्बे का ही नतीजा था कि 1971 में उन्हें एक योग्य फ्लाइट इंस्ट्रक्टर का लाइसेंस मिल गया। इसके बाद, उन्होंने एक प्रतिष्ठित निजी विमान निर्माता कंपनी में बतौर टेस्ट पायलट काम करना शुरू किया और आसमान की बुलंदियों में अपनी महारत साबित की।
जून 1980 का महीना स्वेतलाना की जिंदगी में एक नया मोड़ लेकर आया, जब उनका चयन एक सोवियत स्पेस मिशन के लिए हुआ। महीनों के बेहद कठिन और थका देने वाले प्रशिक्षण के बाद, अगस्त 1982 में उन्होंने पहली बार अंतरिक्ष के लिए उड़ान भरी।
यह केवल स्वेतलाना के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक ऐतिहासिक लम्हा था—क्योंकि इतिहास में यह पहला ऐसा स्पेस मिशन था, जिसमें महिला और पुरुष अंतरिक्ष यात्रियों को एक साथ भेजा गया था। इस उड़ान के साथ ही स्वेतलाना सवित्स्काया अंतरिक्ष में जाने वाली दुनिया की दूसरी महिला बन गईं।
पहली सफलता के बाद स्वेतलाना का हौसला सातवें आसमान पर था। 17 जुलाई 1984 को वे अपनी दूसरी अंतरिक्ष यात्रा पर रवाना हुईं। लेकिन असली रोमांच और इतिहास बनना अभी बाकी था।
तारीख थी 25 जुलाई 1984। अंतरिक्ष यान ‘सल्युत-7’ (Salyut 7) पृथ्वी से सैकड़ों किलोमीटर ऊपर चक्कर लगा रहा था। यान का हैच खुला और स्वेतलाना सवित्स्काया अनगिनत तारों और पृथ्वी के नीले क्षितिज के बीच खुले अंतरिक्ष के सन्नाटे में बाहर निकलीं।
उन्होंने पूरे 3 घंटे 35 मिनट तक अंतरिक्ष के शून्य में वॉक (Space Walk) किया और वहां वेल्डिंग व कटिंग से जुड़े जटिल प्रयोग सफलतापूर्वक पूरे किए।
जब स्वेतलाना का कदम अंतरिक्ष के उस अनंत शून्य में पड़ा, तो उन्होंने हर उस सोच को धता बता दिया जो महिलाओं के सामर्थ्य पर सवाल उठाती थी। वह खुले अंतरिक्ष में स्पेस वॉक (EVA) करने वाली दुनिया की पहली महिला बनीं।
देश-विदेश में 25 जुलाई को इन घटनाओं के लिए भी याद किया जाता है
1759: सात वर्षीय युद्ध के दौरान ब्रिटिश सेना ने फोर्ट नियाग्रा पर कब्जा कर लिया था। इस ऐतिहासिक घटना में ब्रिटिश सेना और उनके मूल अमेरिकी सहयोगियों ने फ्रांसीसी सेना को हराया था।
1813: भारत में पहली बार नौका दौड़ प्रतियोगिता कलकत्ता (अब कोलकाता) में आयोजित हुई।
1837: इलेक्ट्रिक टेलीग्राफ के इस्तेमाल का पहली बार सफलता पूर्वक प्रदर्शन।
1854: वाल्टर हंट को पहले पेपर शर्ट कॉलर का अमेरिकी पेटेंट हासिल हुआ।
1909: लुई ब्लेरियो ने पहली बार हवाई जहाज से इंग्लिश चैनल पार किया
1943: इटली के तानाशाह मुसोलिनी ने छोड़ा था प्रधानमंत्री का पद।
1977: नीलम संजीव रेड्डी भारत के छठे राष्ट्रपति बने।
1982: ज्ञानी जैल सिंह ने भारत के सातवें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली।
1987: रंगास्वामी वेंकटरमण आठवें राष्ट्रपति बने।
1992: डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने भारत के नौवें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली
1997: के. आर. नारायणन ने भारत के 10वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। वे भारत के पहले दलित राष्ट्रपति बने।
2002: डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ने भारत के 11वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। ‘मिसाइल मैन’ के नाम से प्रसिद्ध डॉ. कलाम का कार्यकाल भारतीय राजनीति और विज्ञान के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
2000: एयर फ्रांस का कॉनकॉर्ड विमान उड़ान भरने के दो मिनट बाद ही दुर्घटनाग्रस्त हो गया। जिसमें सभी 109 यात्रियों और चालक दल सहित कुल 113 लोगों की मृत्यु हुई।
2007: प्रतिभा देवीसिंह पाटिल ने भारत 12वीं राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। वे भारत के इतिहास की पहली महिला राष्ट्रपति बनीं।
2012: प्रणब मुखर्जी ने भारत के 13वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली।
2017: रामनाथ कोविंद ने भारत के 14वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली।
2017: गुजरात में बाढ़ आने से 70 से ज्यादा लोग मरे।
2018: इमरान खान की पार्टी तहरीक-ए-इंसाफ को पाकिस्तान के आम चुनावों में सबसे ज्याटा वोट मिले।
2022: द्रौपदी मुर्मु ने भारत की 15वीं राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली, वे भारत की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति बनीं।
2020: भारत की पहली स्वदेशी कोविड-19 वैक्सीन ‘कोवैक्सीन’ का पहला टीका एम्स दिल्ली में एक 30 वर्षीय वालंटियर को लगाया गया।
2023: एलॉन मस्क ने ट्विटर का नाम और लोगो बदलकर ‘X‘ किया।
2024: राष्ट्रपति भवन के दो ऐतिहासिक हॉलों के नाम बदले। ‘दरबार हॉल’ का नाम बदलकर ‘गणतंत्र मंडप’ और ‘अशोक हॉल’ का नाम बदलकर ‘अशोक मंडप’ रखा गया।
25 जुलाई को जन्मे प्रमुख व्यक्ति
1875: जिम कॉर्बेट– भारत में जन्मे ब्रिटिश मूल के प्रसिद्ध शिकारी, लेखक और प्रकृति संरक्षणवादी। इन्हीं के नाम पर उत्तराखंड में प्रसिद्ध ‘जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क’ स्थापित किया गया।
1894: परशुराम चतुर्वेदी – हिंदी के प्रख्यात साहित्यकार, शोधकर्ता और समीक्षक, जिन्होंने संत साहित्य और भारतीय संस्कृति पर महत्वपूर्ण कार्य किया।
1919: सुधीर फड़के – भारतीय संगीतकार।
1920: रोज़ालिंड फ्रैंकलिन– ब्रिटिश रसायनज्ञ और एक्स-रे क्रिस्टलोग्राफर, जिनके शोध ने DNA की संरचना समझने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
1929: सोमनाथ चटर्जी – पूर्व लोकसभा अध्यक्ष, प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ तथा ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी’ के प्रमुख नेताओं में से एक थे।
1966: हरसिमरत कौर बादल – भारत की प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ, पूर्व केन्द्रीय मंत्री।
25 जुलाई को हुए प्रमुख निधन
1880: गणेश वासुदेव जोशी – सार्वजनिक कार्यकर्ता।
1956: गोदावरीश मिश्र – उड़ीसा के प्रसिद्ध समाज सुधारक, स्वतंत्रता सेनानी और प्रख्यात साहित्यकार।
1981: मनमोहन सूरी– भारत के जाने-माने मैकेनिकल इंजीनियर और आविष्कारक। उन्होंने रेलवे के लिए प्रसिद्ध ‘सूरी ट्रांसमिशन’ का विकास किया था।
2001: फूलन देवी– पूर्व सांसद व बैंडिट क्वीन के नाम से जानी जाने वाली दस्यु सुंदरी (गैंगस्टर)।
2012: बी. आर. इशारा – प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक।
25 जुलाई के महत्त्वपूर्ण अवसर एवं उत्सव
विश्व आईवीएफ दिवस
विश्व आईवीएफ दिवस (World IVF Day) हर साल 25 जुलाई को मनाया जाता है। यह दिवस 25 जुलाई 1978 को दुनिया की पहली आईवीएफ शिशु लुईज़ ब्राउन के जन्म की स्मृति में मनाया जाता है। इसका उद्देश्य प्रजनन चिकित्सा और भ्रूणविज्ञान के क्षेत्र में विशेषज्ञों के योगदान को सम्मान देना।
विश्व डूबने से बचाव दिवस
विश्व डूबने से बचाव दिवस (World Drowning Prevention Day) हर वर्ष 25 जुलाई को मनाया जाता है। इसे संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2021 में घोषित किया। इसका उद्देश्य डूबने से होने वाली रोकी जा सकने वाली मौतों के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा जल-सुरक्षा उपायों को बढ़ावा देना है।
प्रस्तुति
हिमाचल न्यूज़ रिसर्च डेस्क
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