16 August in History: ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार वर्ष का 228वां दिन (लीप वर्ष में 229वां दिन) है। साल में अभी और 137 दिन शेष हैं। भारत और विश्व इतिहास में 16 अगस्त का खास महत्व है, क्योंकि इस दिन कई महत्वपूर्ण घटनाएं घटी जो इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज होकर रह गईं हैं।
आज का इतिहास में जानिए आज के दिन जन्मे चर्चित व्यक्ति, प्रसिद्ध व्यक्तियों के निधन, युद्ध संधि, किसी देश की आजादी, नई तकनिकी का अविष्कार, सत्ता का बदलना, महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दिवस के बारे में। आईए हिमाचल न्यूज़ में पढ़ें भारत और विश्व इतिहास के पन्नों में दर्ज 16 अगस्त का इतिहास एवं घटनाक्रम।
2018: आज ही के दिन देश ने खोया था अपना ‘भारत रत्न’
भारतीय राजनीति के अजातशत्रु, महान ओजस्वी वक्ता, कवि और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि पर पूरा देश उन्हें कोटि-कोटि नमन कर रहा है। 16 अगस्त 2018 को दिल्ली के एम्स (AIIMS) अस्पताल में 93 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली थी। अपनी सर्वस्वीकार्य छवि, दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति और दूरदर्शी सोच के कारण वे न केवल भारतीय जनता पार्टी, बल्कि देश की हर राजनीतिक धारा के नेताओं के बीच अत्यंत सम्मानित रहे।

25 दिसंबर 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में जन्मे अटल बिहारी वाजपेयी देश के चुनावी इतिहास के एकमात्र ऐसे राजनेता हैं, जिन्होंने भारत के 4 अलग-अलग राज्यों की 6 अलग-अलग लोकसभा सीटों से चुनाव जीतकर संसद में प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने उत्तर प्रदेश की लखनऊ और बलरामपुर, मध्य प्रदेश की ग्वालियर और विदिशा, गुजरात के गांधीनगर, दिल्ली की नई दिल्ली से लोकसभा चुनाव जीते।

अटल जी ने महात्मा गांधी के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ (1942) के दौरान ही छात्र जीवन से सक्रिय राजनीति में कदम रखा था। भारतीय जनसंघ की स्थापना और उसे गांव-गांव तक पहुंचाने में उनकी अग्रणी भूमिका रही। वे साल 1957 में उत्तर प्रदेश की बलरामपुर सीट से चुनाव जीतकर पहली बार लोकसभा पहुंचे। संसद में उनके पहले भाषण से ही तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इतने प्रभावित हुए थे कि उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि यह नवयुवक एक दिन देश का प्रधानमंत्री बनेगा।
1977 में आपातकाल के खात्मे के बाद जब देश में गैर-कांग्रेसी जनता पार्टी की सरकार बनी और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने, तब अटल बिहारी वाजपेयी को देश का विदेश मंत्री बनाया गया।
विदेश मंत्री के तौर पर 4 अक्टूबर 1977 को संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए अटल जी ने इतिहास रच दिया। वे यूएनओ के वैश्विक मंच पर हिंदी में भाषण देने वाले भारत के पहले राजनेता बने। उनके इस संबोधन ने वैश्विक पटल पर भारत की भाषाई पहचान और सांस्कृतिक गौरव को एक नई पहचान दी।
अटल बिहारी वाजपेयी को भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में ’13 दिनों के प्रधानमंत्री’ के रूप में भी विशेष तौर पर याद किया जाता है।
1996 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी 161 सीटें जीतकर देश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। राष्ट्रपति ने अटल जी को सरकार बनाने का न्योता दिया और उन्होंने देश के 10वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। संसद में अन्य दलों से अपेक्षित समर्थन न मिल पाने के कारण उनकी सरकार बहुमत साबित नहीं कर सकी।
लोकसभा में विश्वास मत पर बहस के दौरान अटल जी ने ऐतिहासिक भाषण देते हुए कहा था, “सरकारें आएंगी-जाएंगी, पार्टियां बनेंगी-बिगड़ेंगी, लेकिन यह देश रहना चाहिए, इसका लोकतंत्र अमर रहना चाहिए।” बहुमत के आंकड़े से पीछे रहने पर उन्होंने सदन के पटल पर ही अपने इस्तीफे की घोषणा कर दी। मात्र 13 दिनों का यह कार्यकाल भारत के संसदीय इतिहास में किसी भी प्रधानमंत्री का सबसे छोटा कार्यकाल माना जाता है।
इसके बाद वे 1998 में दोबारा प्रधानमंत्री बने (13 महीने की सरकार) और फिर 1999 से 2004 तक 5 वर्षों का पूर्ण कार्यकाल सफलता से पूरा किया। उनके कार्यकाल के दौरान पोखरन परमाणु परीक्षण (1998), कारगिल युद्ध में ऐतिहासिक विजय (1999), स्वर्णिम चतुर्भुज योजना और दिल्ली मेट्रो जैसी युगांतरकारी योजनाएं शुरू हुईं। साल 2015 में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से अलंकृत किया गया।
जब पहली बार भेजा गया टेलीग्राफ मैसेज, महारानी विक्टोरिया के 99 शब्दों को वॉशिंगटन पहुंचने में लगे थे 18 घंटे
आज हम स्मार्टफोन के एक सिंगल टैप से दुनिया के किसी भी कोने में बैठे व्यक्ति से पलक झपकते ही एचडी वीडियो कॉल पर जुड़ जाते हैं। लेकिन आज से 168 साल पहले सुदूर महाद्वीपों के बीच संपर्क साधना एक अविश्वसनीय चुनौती थी। 16 अगस्त 1858 को संचार क्रांति के इतिहास में एक ऐसा मील का पत्थर रचा गया, जिसने इंसानी सभ्यता को पहली बार ‘अटलांटिक महासागर पार’ तात्कालिक संदेश भेजने की शक्ति दी।

इसी दिन ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया ने पहली बार अटलांटिक के नीचे बिछी केबल के जरिए अमेरिकी राष्ट्रपति जेम्स बुकानन को एक आधिकारिक टेलीग्राफ संदेश भेजा था।
16 अगस्त 1858 की सुबह 10 बजकर 50 मिनट पर महारानी विक्टोरिया ने लंदन से वॉशिंगटन के लिए अपना ऐतिहासिक संदेश रवाना किया। महारानी का यह ऐतिहासिक संदेश 99 शब्दों और 509 अक्षरों का था। संदेश को अटलांटिक महासागर के नीचे बिछी टेलीग्राफ केबल के जरिए अमेरिकी राष्ट्रपति तक पहुंचने में लगभग 18 घंटे का समय लगा। संदेश अगले दिन शाम 4:30 बजे पहुंचा। यानी उस दौर की सबसे आधुनिक तकनीक में भी 2 मिनट में केवल 1 अक्षर ही ट्रांसफर हो पाता था।
इसके जवाब में अमेरिकी राष्ट्रपति जेम्स बुकानन ने 143 शब्दों का एक टेलीग्राफ संदेश भेजा, जिसे महारानी तक पहुंचने में लगभग 10 घंटे का समय लगा था।
धीमी रफ्तार के बावजूद, महीनों में पहुंचने वाले समुद्री जहाजों की तुलना में 18 घंटे में संदेश पहुंच जाना उस दौर का सबसे बड़ा वैज्ञानिक चमत्कार माना गया था।
इस महान तकनीक के पीछे सैमुअल मोर्स का दिमाग था, जिन्हें 1840 में टेलीग्राफ का पेटेंट मिला था। मोर्स को टेलीग्राफ बनाने का विचार एक समुद्री जहाज की यात्रा के दौरान आया था, जब उन्होंने साथी यात्रियों से माइकल फैराडे की ‘इलेक्ट्रोमैग्नेट’ (विद्युत-चुंबक) खोज की चर्चा सुनी।
मोर्स ने गहराई से अध्ययन किया और समझा कि इलेक्ट्रोमैग्नेट के जरिए सिग्नल को एक जगह से दूसरी जगह तारों के माध्यम से भेजा जा सकता है। उन्होंने अंग्रेजी वर्णमाला के हर अक्षर के लिए छोटी-बड़ी रेखाओं (Dashes) और बिंदुओं (Dots) का एक संयोजन तैयार किया, जिसे दुनिया आज ‘मोर्स कोड’ (Morse Code) के नाम से जानती है।
संदेश भेजने के लिए हर अक्षर के आकार के अलग-अलग धातु के खांचे बनाए जाते थे। एक-एक अक्षर को सजाकर पूरा शब्द और फिर वाक्य रचा जाता था। इन खांचों के ऊपर से एक पतली इलेक्ट्रिक प्लेट गुजारी जाती थी, जो खांचों के कट-आउट के हिसाब से इलेक्ट्रिक सर्किट को बार-बार ‘ऑन’ और ‘ऑफ़’ करती थी।
दूसरी तरफ (रिसीवर एंड पर) जब सर्किट पूरा होता, तो वहां लगे उपकरण से कागज पर डॉट और डैश छपने लगते थे। इसी तरह एक-एक अक्षर तारों के जरिए महासागर पार पहुंच जाता था।
1930: टीवी पर आया दुनिया का पहला बोलता हुआ कलर कार्टून हुआ रिलीज, जानिए एनिमेशन की दुनिया के इस क्रांतिकारी मोड़ की कहानी

आज हम और हमारे बच्चे टीवी और सिनेमा के पर्दे पर 3D और हाई-डेफिनिशन (HD) एनिमेशन फिल्मों का लुत्फ उठाते हैं, लेकिन एनिमेशन की दुनिया को ब्लैक एंड व्हाइट से रंगीन और बेजुबान से बोलने वाला बनाने की शुरुआत आज ही के दिन यानी 16 अगस्त 1930 को हुई थी।
इसी दिन मशहूर एनिमेटर उब इवर्क्स ने दुनिया की पहली ऐसी शॉर्ट कार्टून फिल्म ‘फिडलस्टिक्स’ रिलीज की थी, जो न केवल पूरी तरह कलर में थी, बल्कि उसमें पहली बार सिंक्रोनाइज्ड साउंड का भी सटीक इस्तेमाल किया गया था।
केवल 6 मिनट की इस शॉर्ट एनिमेशन फिल्म का पूरा नाम ‘फ्लिप द फ्रॉग – फिडलस्टिक्स’ था। इसमें ‘फ्लिप’ नाम का एक मेंढक मुख्य भूमिका में था, जो एक चूहे के साथ पियानो और वायलिन बजाते हुए संगीतमय अंदाज में डांस करता नजर आता है।
इस कार्टून की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि इसमें संगीत के हर नोट और धुन के साथ कार्टून कैरेक्टर के मूवमेंट को बिल्कुल सटीक तरीके से ‘सिंक्रोनाइज’ किया गया था।
‘फिडलस्टिक्स’ बनाने वाले उब इवर्क्स कोई साधारण एनिमेटर नहीं थे। वे एनिमेशन जगत के बादशाह वॉल्ट डिज्नी के शुरुआती और सबसे करीबी बिजनेस पार्टनर थे। कहा जाता है कि दुनिया के सबसे मशहूर कार्टून कैरेक्टर ‘मिकी माउस’ को डिजाइन करने और उसे पहला रूप देने में उब इवर्क्स का सबसे अहम योगदान था।
डिज्नी के साथ लंबे समय तक काम करने के बाद साल 1930 में इवर्क्स ने डिज्नी से अलग होने का फैसला किया और ‘इवर्क्स स्टूडियो’ नाम से अपना खुद का एनिमेशन स्टूडियो शुरू किया। ‘फिडलस्टिक्स’ उनके इस नए स्टूडियो का पहला ही कमर्शियल प्रोडक्शन था। डिज्नी के साथ काम करने के दौरान ही इवर्क्स ने ‘फ्लिप द फ्रॉग’ कैरेक्टर को मन ही मन डिजाइन कर लिया था, जिसे उन्होंने अपने इस प्रोजेक्ट में मुख्य हीरो बनाया।
हालांकि, ‘फिडलस्टिक्स’ जैसी तकनीकी रूप से उन्नत और ऐतिहासिक फिल्म बनाने के बावजूद, उब इवर्क्स का यह नया स्टूडियो मार्केट में डिज्नी जैसी बड़ी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सका। दर्शक और डिस्ट्रीब्यूटर्स अभी भी डिज्नी के मिकी माउस और सिलि सिम्फनी के प्रति अधिक आकर्षित थे।
आर्थिक तंगी और कमर्शियल सफलता न मिल पाने के कारण साल 1940 में उब इवर्क्स ने अपना स्टूडियो बंद कर दिया और वे वापस वॉल्ट डिज्नी कंपनी में लौट आए। डिज्नी में लौटने के बाद उन्होंने विजुअल इफेक्ट्स और स्पेशल कैमरा तकनीकों के विकास पर काम किया, जिसके लिए उन्हें आगे चलकर दो ऑस्कर भी मिले।
भले ही उनका स्टूडियो लंबे समय तक नहीं चल सका, लेकिन 16 अगस्त 1930 को रिलीज हुई उनकी ‘फिडलस्टिक्स’ ने एनिमेशन की दुनिया का दरवाजा हमेशा-हमेशा के लिए रंगीन और संगीतमय बना दिया।
1947: जब शिमला के ठियोग में देश के पहले प्रजामंडल ने संभाली थी सत्ता, चुना अपना प्रधानमंत्री और बनाई सरकार, जानिए भारत संघ में मिलने वाली पहली रियासत की गौरवगाथा

पूरा देश जहां 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस का मुख्य जश्न मनाता है, वहीं ठियोग में स्वाधीनता दिवस 16 अगस्त को मनाया जाता है। इसके पीछे एक बेहद अनूठा और स्वर्णिम इतिहास छिपा हुआ है।
वर्ष 1947 में जब पूरा भारत अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति पाने के लिए संघर्षरत था और देश 360 से अधिक रियासतों, राजाओं, राणाओं, नवाबों और निजामों के शासन में बंटा हुआ था, तब हिमाचल प्रदेश के शिमला जिला की ठियोग की जनता ने अपने अधिकारों के लिए हुंकार भरी।
ठियोग में देश के पहला प्रजामंडल का गठन 1946 में ही कर दिया गया था। देश में ठियोग से पहले कहीं भी न तो इस तरह के जन-प्रजामंडल की स्थापना हुई थी और न ही किसी स्थानीय मिनिस्ट्री (मंत्रिमंडल) का गठन हुआ था।
ठियोग रियासत की जागरूक जनता के भारी दबाव और प्रजामंडल के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए तत्कालीन राजा कर्मचंद ने जनभावनाओं का सम्मान करते हुए राजगद्दी छोड़ दी। 16 अगस्त 1947 को उन्होंने अपने सभी प्रशासनिक अधिकार और सत्ता प्रजामंडल को आधिकारिक रूप से सौंप दिए।
सत्ता हस्तांतरण के साथ ही 16 अगस्त 1947 को ठियोग प्रजामंडल के नेतृत्व में स्वतंत्र सरकार का गठन हुआ। सूरतराम प्रकाश को इस प्रजामंडल सरकार का पहला प्रधानमंत्री चुना गया। उनके साथ बुद्धिराम वर्मा (गृहमंत्री) और सीताराम वर्मा (शिक्षा मंत्री) समेत 8 अन्य मंत्रियों ने पद एवं गोपनीयता की शपथ ली।
ठियोग रियासत को स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक अनूठा गौरव प्राप्त है। यह “भारत संघ” (Union of India) में सबसे पहले स्वेच्छा से विलय करने वाली देश की पहली रियासत बनी। ठियोग की इस ऐतिहासिक पहल के बाद ही देश भर की अन्य रियासतें एक-एक कर भारत संघ में शामिल होने के लिए आगे आईं।
ठियोग की इस अनूठी स्वाधीनता की याद में पिछले 80 वर्षों से हर साल 16 अगस्त को स्थानीय ‘पोटैटो ग्राउंड’ में स्वतंत्रता दिवस का भव्य आयोजन किया जाता है। स्थानीय लोग इसे ‘रिहाली और जलसा’ के रूप में मनाते हैं। 15 और 16 अगस्त को आयोजित होने वाले इस दो दिवसीय आयोजन के ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए राज्य सरकार द्वारा ‘राज्यस्तरीय मेला’ घोषित किया गया है, जहां हर साल प्रजामंडल के सभी अमर स्वतंत्रता सेनानियों की कुर्बानियों को श्रद्धापूर्वक याद किया जाता है।
16 अगस्त के दिन को इतिहास में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय महत्व की इन घटनाओं की वजह से याद किया जाता है…
1896: जॉर्ज कारमैक, स्कूकूम जिम और डॉसन चार्ली ने कनाडा के युकोन में बोनान्ज़ा क्रीक (रैबिट क्रीक) पर सोने की खोज की।
1906: दक्षिण अमेरिकी देश चिली में 8.6 की तीव्रता के भूकंप से 3,882 लोगों की मौतें हुई।
1946: मुस्लिम लीग द्वारा घोषित ‘प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस’ (Direct Action Day) के, कलकत्ता में हुए भयानक दंगों में लगभग 5,000 लोग मारे गए और 15,000 से अधिक घायल हुए, जिससे भारतीय इतिहास का यह दौर विभाजन की त्रासदी का एक काला अध्याय बन गया।
1947: देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने सुबह करीब 8:30 बजे पहली बार दिल्ली के लाल किले की प्राचीर (लाहौर गेट) से राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराया और ऐतिहासिक भाषण दिया। इसी के साथ लाल किले से स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री द्वारा ध्वजारोहण की परंपरा विकसित हुई।
1958: सत्यजीत राय की प्रसिद्ध फिल्म ‘पथेर पांचाली’ ने कनाडा के वैंकूवर फिल्म समारोह में कई प्रमुख पुरस्कार प्राप्त किए। यह भारतीय सिनेमा की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा बढ़ाने वाली महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिनी जाती है।
1960: साइप्रस गणराज्य स्वतंत्र और संप्रभु राज्य के रूप में अस्तित्व में आया।
2004: आस्ट्रेलियाई और अमेरिकी टीम ने ओलम्पिक नौकायन में विश्व रिकार्ड क़ायम किया।
2008: कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में संयुक्त राष्ट्र मिशन के तहत तैनात 125 भारतीय पुलिस अधिकारियों को उनके साहसिक और उत्कृष्ट योगदान के लिए प्रतिष्ठित संयुक्त राष्ट्र शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
2008: बीजिंग ओलंपिक में जमैका के धावक उसेन बोल्ट ने 100 मीटर की दौड़ 9.69 सेकंड में पूरी करके स्वर्ण पदक और नया विश्व रिकॉर्ड अपने नाम किया था। ठीक एक बर्ष बाद 16 अगस्त 2009 को उसैन बोल्ट ने बर्लिन में आयोजित विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में अपने ही रिकॉर्ड को तोड़ते हुए 100 मीटर की दौड़ को 9.58 सेकंड में पूरा कर नया विश्व रिकॉर्ड बनाया था, जो आज भी कायम है।
2010: संगीतकार ए आर रहमान द्वारा नई दिल्ली में होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों के लिए तैयार किए गए थीम सॉन्ग “जियो उठो बढ़ो जीतो” को सैद्धांतिक मंजूरी दी।
2012: विकिलीक्स के फाउंडर जूलियन असांज को इक्वाडोर ने राजनीतिक शरण दी।
2018: केरल में आई विनाशकारी बाढ़ से हुई भीषण तबाही से एक ही दिन में 106 लोगों की मौत हुई और डेढ़ लाख से अधिक लोग बेघर हो गए थे। यह सदी की सबसे भयानक बाढ़ में से एक थी, जिसने पूरे राज्य के जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया था।
2020: भारत में कोविड-19 महामारी के कारण कुल मौतों का आंकड़ा 50,000 के स्तर को पार कर गया था।
2026: इंडोनेशिया के पूर्वी हिस्से में रिक्टर पैमाने पर 7.7 तीव्रता का शक्तिशाली भूकंप आया, जिसमें 50 से अधिक लोगों की मौत हुई है, हजारों लोग विस्थापित हुए।
16 अगस्त को जन्मे प्रमुख व्यक्ति
1904: सुभद्रा कुमारी चौहान – प्रसिद्ध भारतीय कवयित्री और स्वतंत्रता सेनानी। उनकी कविता ‘झांसी की रानी’ (“खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी”) हिंदी साहित्य की सबसे लोकप्रिय देशभक्ति कविताओं में से एक है।
1920: कोटला विजय भास्कर रेड्डी – आंध्र प्रदेश के 9वें मुख्यमंत्री थे।
1954: जेम्स कैमरून – कनाडाई फिल्म निर्देशक, पटकथा लेखक और निर्माता, जिन्होंने ‘टाइटैनिक’ और ‘अवतार’ जैसी बेहद सफल फिल्मों का निर्देशन किया। उनकी फिल्मों ने तकनीकी दृष्टि से भी चलचित्र निर्माण में नए प्रयोगों को बढ़ावा दिया।
1958: महेश मांजरेकर – भारतीय अभिनेता, निर्देशक, पटकथा लेखक और निर्माता, जिन्होंने हिंदी तथा मराठी फिल्मों में अभिनय और निर्देशन दोनों क्षेत्रों में काम किया।
1958: मैडोना – पॉप संगीत दुनिया की दिग्गज अमेरिकी गायिका और अभिनेत्री, जिन्हें ‘क्वीन ऑफ पॉप’ कहा जाता है।
1968: अरविंद केजरीवाल – दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री, आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक हैं।
16 अगस्त को हुए प्रमुख निधन
1886: स्वामी रामकृष्ण परमहंस – 19वीं सदी के महान भारतीय संत, विचारक और स्वामी विवेकानंद के आध्यात्मिक गुरु।
1991: सी. अच्युत मेनन (चेलात अच्युत मेनन) – केरल के पूर्व मुख्यमंत्री (1969-1970 और फिर 1970-1977), उन्हें केरल के सबसे प्रभावशाली मुख्यमंत्रियों में से एक माना जाता है।
1997: नुसरत फतेह अली खान – अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त पाकिस्तानी गायक।
2016: गुरदयाल सिंह – ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ से सम्मानित पंजाबी साहित्यकार। वह अमृता प्रीतम के बाद यह सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान पाने वाले दूसरे पंजाबी साहित्यकार थे।
2020: चेतन चौहान – प्रसिद्ध भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी, जिन्होंने भारतीय क्रिकेट टीम के लिए ४० टेस्ट क्रिकेट मैच खेले।
प्रस्तुति
हिमाचल न्यूज़ रिसर्च डेस्क
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