30 June in History: ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार 30 जून वर्ष का 181वां (लीप वर्ष में यह 182वां) दिन है। साल में अभी 186 दिन शेष हैं। भारत और विश्व इतिहास में 30 जून का खास महत्व है, क्योंकि इस दिन कई महत्वपूर्ण घटनाएं घटी जो इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज होकर रह गईं हैं।
आज का इतिहास में जानिए आज के दिन जन्मे चर्चित व्यक्ति, प्रसिद्ध व्यक्तियों के निधन, युद्ध संधि, किसी देश की आजादी, नई तकनिकी का अविष्कार, सत्ता का बदलना, महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दिवस के बारे में। आईए हिमाचल न्यूज़ में पढ़ें भारत और विश्व इतिहास के पन्नों में दर्ज 30 जून का इतिहास एवं घटनाक्रम।
30 जून की प्रमुख घटनाएं (What Happened on 30 June in History)
भारत के सबसे लंबे समुद्री ब्रिज की शुरुआत, 5.6 किलोमीटर लंबे इस ब्रिज ने 1 घंटे के सफर को 10 मिनट का कर दिया
मुंबई का बांद्रा-वर्ली सी लिंक। वो ब्रिज जिसने बांद्रा से वर्ली जाने वालों के सफर को एक घंटे से कम कर 10 मिनट का कर दिया। आज ही के दिन 2009 में इस ब्रिज को आम लोगों के लिए शुरू किया गया था। ये भारत का पहला 8 लेन और सबसे लंबा समुद्रीय ब्रिज है। इसकी लंबाई 5.6 किलोमीटर है।
इस ब्रिज के बनने से पहले बांद्रा से वर्ली जाने के लिए माहिम कॉजवे का इस्तेमाल करना पड़ता था। ये रास्ता लंबा तो था ही, मुंबई में वाहनों की संख्या बढ़ने के साथ ही इस रास्ते पर रोजाना जाम लगने लगा। इसके बाद बांद्रा को वर्ली से जोड़ने के लिए एक वैकल्पिक रास्ते की मांग उठने लगी।
आखिरकार फैसला लिया गया कि मुंबई के पश्चिमी तटीय इलाकों से होता हुआ फ्री वे बनाया जाएगा। ये फ्री वे मरीन ड्राइव को कांदिवली से जोड़ेगा।
इसी प्रोजेक्ट के तहत सबसे पहले बांद्रा वर्ली सी लिंक का काम शुरू किया गया। 1999 में इस ब्रिज को बनाने का काम शुरू हुआ। तब इसकी अनुमानित लागत 600 करोड़ रुपए आंकी गई थी और 5 साल में ब्रिज का काम पूरा करने का टारगेट रखा गया था।
ब्रिज बनने की शुरुआत से ही सरकार को खासी परेशानियों का सामना भी करना पड़ा। पुल के निर्माण के खिलाफ कोर्ट में पर्यावरण कार्यकर्ताओं और मछुआरों ने कई जनहित याचिकाएं दायर कीं। इन पर सुनवाई लंबी चली। इस वजह से ब्रिज का काम पूरा होने में देरी भी हुई और इसकी लागत भी बढ़ गई।
आखिरकार साल 2009 में अपने तय वक्त से 5 साल बाद ब्रिज का काम पूरा हो पाया। खर्च भी 600 करोड़ से बढ़कर 1600 करोड़ हुआ। 30 जून 2009 को पुल की 8 में से 4 लेन को आम ट्रैफिक के लिए खोला गया। 2010 में सभी 8 लेन शुरू की गईं और इसे राजीव गांधी सी लिंक नाम दिया गया।
इस पुल पर केवल बड़े वाहनों को ही आने-जाने की अनुमति है। दोपहिया वाहन और पैदल राहगीर इस पुल से नहीं जा सकते। कहा जाता है कि इस ब्रिज में धरती की परिधि के बराबर स्टील के तारों का इस्तेमाल हुआ है।
1937: दुनिया के पहले इमरजेंसी नंबर की शुरुआत
10 नवंबर 1935…लंदन के विम्पल स्ट्रीट के एक घर में आग लग गई। इस घर के पड़ोस में रहने वाले शख्स ने फायर ब्रिगेड को फोन किया, लेकिन किसी वजह से फोन लगा नहीं और आग बुझाने फायर ब्रिगेड नहीं पहुंच सकी। इस हादसे में 5 महिलाओं की जलकर मौत हो गई।
हादसे के बाद इस शख्स ने ‘द टाइम्स’ अखबार में लेख लिखा और इस हादसे की न्यायिक जांच की मांग की। शख्स ने इस हादसे के पीछे सरकारी लापरवाही को दोषी ठहराया और सरकार से मांग की कि ऐसी आपातकालीन स्थितियों में मदद मांगने के लिए आम लोगों को अलग फोन नंबर दिया जाए, जिस पर कभी भी कॉल करके मदद मांगी जा सके।
उस शख्स की मांग को सरकार ने सुना और आज ही के दिन 1937 में दुनिया का पहला इमरजेंसी नंबर 999 लॉन्च किया गया। इस नंबर को लंदन में 19 किलोमीटर के दायरे में शुरू किया गया। लॉन्च होने के एक हफ्ते के भीतर ही इस नंबर पर पहला कॉल आया। ये कॉल चोरी की सूचना देने के लिए था और पुलिस ने समय पर पहुंचकर चोर को पकड़ भी लिया।
इमरजेंसी के लिए 999 नंबर को चुनने के पीछे भी एक वजह थी। दरअसल उस समय के पे-फोन और रोटेटिंग डायल वाले फोन में ये नंबर आसानी से डायल किया जा सकता था। धीरे-धीरे ये सर्विस पॉपुलर होने लगी और 1976 में इसे पूरे ब्रिटेन में शुरू किया गया। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद कई देशों में ये सर्विस शुरू की गई। 1968 में अमेरिका ने भी 911 इमरजेंसी सर्विस शुरू की।
हालांकि अभी तक इस सर्विस के साथ एक परेशानी थी। ऐसे लोग जो बचपन से ही बोल नहीं सकते थे या इमरजेंसी में उनका बोलना खतरे से खाली नहीं था वे लोग कैसे अपनी शिकायत दर्ज करें। इस परेशानी का भी हल निकाला गया और साइलेंट सॉल्यूशन 55 सर्विस शुरू की गई। अब आपके पास ये सुविधा थी कि आप 999 पर कॉल कर खांस कर या दूसरे किसी तरीके से बता सकते थे कि आप खतरे में हैं। आप अगर ऐसा भी नहीं कर सकते तो 55 दबाकर पुलिस से मदद मांग सकते हैं।
999 नंबर आज भी कई देशों में काम करता है और इस पर रोजाना हजारों कॉल्स आते हैं।
1938: पहली बार सामने आया ‘सुपरमैन’
बच्चों से लेकर बड़ों तक का बेहद पसंदीदा कार्टून कैरेक्टर सुपरमैन आज ही के दिन पहली बार कॉमिक्स के पन्नों पर नजर आया था। इस कॉमिक की कहानी जेरी सीगल ने लिखी थी और जो शुस्टर ने सुपरमैन को पन्नों पर उकेरा था। 30 जून 1938 को ये पहली बार दर्शकों के सामने आया।
जेरी की कहानी के मुताबिक सुपरमैन का जन्म क्रिप्टोन ग्रह पर हुआ था और उसका नाम काल-एल था। जब क्रिप्टोन ग्रह पर भयंकर विनाश के आसार नजर आने लगे तो सुपरमैन के पैरेंट्स ने उसे एक स्पेसक्राफ्ट के जरिए धरती पर भेज दिया।
धरती पर इस बच्चे को मार्था और जोनाथन केंट पालने लगते हैं। धीरे-धीरे सुपरमैन की शक्तियों का पता उसके पैरेंट्स को चलने लगता है और उसे ‘मैन ऑफ स्टील’ की उपाधि मिलती है।
जेरी सीगल ने साल 1933 में ही ‘द रेन ऑफ सुपरमैन’ नाम से कहानी पब्लिश की थी। इस कहानी में सुपरमैन अपने बनाए हुए वैज्ञानिक को ही मार देता है और एक विलेन बन जाता है। कहा जाता है कि सुपरमैन को विलेन से हीरो बनाने के लिए क्रिप्टोन ग्रह की थ्योरी रची गई।
कुछ सालों तक जेरी और शुस्टर अपने इस आइडिया को अखबारों में छापने के लिए लोगों से बात करने लगे। आखिरकार डीसी कॉमिक्स ने उन्हें इस पूरे आइडिया को 13 पेज की स्टोरी में बदलने को कहा। इसी बुक में पहली बार सुपरमैन नजर आया था।
उसके बाद तो सुपरमैन रेडियो सीरियल, कॉमिक्स और फिल्मों का चहेता किरदार बन गया। साल 1941 में एनिमेटेड शॉर्ट फिल्म में पहली बार सुपरमैन पर्दे पर नजर आया। इस फिल्म में पहली बार सुपरमैन को उड़ता हुआ दिखाया गया। इससे पहले सुपरमैन केवल लंबी छलांग लगा सकता था।
साल 1948 में सुपरमैन की पहली फिल्म आई जिसमें कर्क एलेन ने सुपरमैन का किरदार निभाया था। साल 2014 में इसकी पहली बुक की एक प्रति 24 करोड़ रुपए में नीलाम हुई।
साभार: दैनिक भास्कर
1855: हूल क्रांति 60,000 तीरों ने जब हिला दी थी ब्रिटिश हुकूमत की नींव, 15000 आदिवासियों ने पाई वीरगति
सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की धधकती ज्वाला से ठीक दो साल पहले, वर्तमान झारखंड की वादियों में एक ऐसा रक्तपात और महासंग्राम हुआ जिसने ब्रिटिश हुकूमत के घमंड को चूर-चूर कर दिया था। यह कहानी सिर्फ एक विद्रोह की नहीं है; यह कहानी है जल, जंगल, ज़मीन और स्वाभिमान के लिए हंसते-हंसते प्राण न्यौछावर करने वाले 15,000 से अधिक अमर शहीदों की। इतिहास इसे ‘संथाल हूल’ के नाम से जानता है।
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की ‘स्थायी बंदोबस्त’ जैसी दमनकारी नीतियों ने संथालों की पारंपरिक और उपजाऊ ज़मीन को उनसे छीनकर ज़मींदारों के हवाले कर दिया था। बाहरी शोषकों (दिकुओं) और महाजनों ने भोले-भाले आदिवासियों को अत्यधिक ब्याज के जाल में फंसाकर बंधुआ मजदूर बना दिया। रही-सही कसर वहां की पुलिस, दरोगा और स्थानीय एजेंटों के शारीरिक और सामाजिक उत्पीड़न ने पूरी कर दी।
जब बर्दाश्त की हर हद टूट गई, तब भोगनाडीह गांव के एक भूमिहीन ग्राम प्रधान, चुन्नी मांडी के चार बेटों—सिद्धू, कान्हू, चांद और भैरव—ने इस जुल्म के खिलाफ कफ़न बांध लिया। उनके साथ उनकी वीर बहनें, फूलो और झानो मुर्मू भी खड़ी हुईं, जिन्होंने महिलाओं की एक साहसी टुकड़ी का नेतृत्व किया।
30 जून 1855 ई. को तत्कालीन बंगाल प्रेसिडेंसी के साहेबगंज ज़िले में स्थित भोगनाडीह गांव में एक ऐतिहासिक जनसभा हुई। करीब 400 गांवों के 30,000 से अधिक संथाल आदिवासी वहां अपनी माटी की पुकार पर इकट्ठा हुए। सिद्धू और कान्हू ने इसे ‘ईश्वर का आदेश’ बताते हुए अंग्रेजों को लगान न देने और अपनी ज़मीन खाली करने का फरमान सुनाया। उसी दिन हवाओं में एक नारा गूंजा, जिसने हर आदिवासी के रगों में लहू बनकर दौड़ना शुरू किया:
यह केवल संथालों का आंदोलन नहीं था, बल्कि इलाके के समस्त गरीबों, शोषितों, भूमिज और स्थानीय कारीगर समुदायों का साझा स्वतंत्रता संग्राम था। देखते ही देखते इस महा-आंदोलन में 60,000 से अधिक आदिवासियों ने शोषकों के खिलाफ हथियार उठा लिए।
संथालों के पास न तो तोपें थीं और न ही आधुनिक बंदूकें। उनके पास थे सिर्फ पारंपरिक तीर-कमान, कुल्हाड़ियां और अपनी माटी के लिए मर-मिटने का जज्बा। विद्रोहियों ने जुल्म के प्रतीकों—पुलिस थानों, डाकघरों और सूदखोर जमींदारों के महलों पर धावा बोल दिया।
शुरुआती जंग में, जब भारी बारिश के कारण ब्रिटिश सेना के बारूद गीले हो गए, तब इन रणबांकुरों ने मेजर बरो (Major Burrow) की अजेय मानी जाने वाली ब्रिटिश टुकड़ी और पहरिया रेंजर्स को धूल चटा दी। केवल नारायणपुर की एक ही जंग में 25 से अधिक ब्रिटिश सिपाही और कई बड़े अफसर मारे गए। क्रांति की शुरुआत में ही तीन अत्याचारी अंग्रेज ठेकेदारों को मौत के घाट उतार दिया गया। इस पूरे महासंग्राम में अंग्रेजों के वफादार करीब 1,000 से 1,500 ब्रिटिश सैनिक व अधिकारी मारे गए, और शोषण की मुख्य जड़ रहे 100 से अधिक बड़े जमींदारों, महाजनों और दारोगों को संथालों ने हमेशा के लिए खामोश कर दिया।
अपनी हार से बौखलाए अंग्रेजों ने इस जन-विद्रोह को कुचलने के लिए क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। पूरे क्षेत्र में मार्शल लॉ लगा दिया गया। तोपों और आधुनिक बंदूकों के सामने तीर-कमान लेकर लड़ते हुए 15,000 से अधिक संथाल वीरगति को प्राप्त हुए। राजमहल की पहाड़ियां और भोगनाडीह की माटी अपने ही बेटों-बेटियों के खून से लाल हो गई। सिद्धू, कान्हू, चांद और भैरव ने हंसते-हंसते मातृभूमि के लिए अपने प्राण दे दिए।
शहीदों का खून कभी व्यर्थ नहीं जाता। संथालों के इस अदम्य साहस और असीमित बलिदान के आगे अंततः क्रूर ब्रिटिश हुकूमत को भी घुटने टेकने पड़े। आदिवासियों के जल-जंगल-ज़मीन की सुरक्षा के लिए ब्रिटिश सरकार को ‘संथाल परगना काश्तकारी (SPT) अधिनियम, 1876’ पारित करना पड़ा। इस कानून ने यह तय किया कि कोई भी गैर-आदिवासी, आदिवासियों की पारंपरिक ज़मीन को हड़प नहीं सकता।
देश-विदेश में 30 जून को इन घटनाओं के लिए भी याद किया जाता है
1868: क्रिस्टोफर श्लेस ने टाइपराइटर के लिए पेटेंट अधिकार हासिल किया।
1870: अदा केपले लॉ कॉलेज से स्नातक की परीक्षा पास करने वाली पहली महिला बनी।
1888: फ्रेडरिक डगलस अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के लिए नामांकित होने वाले पहले अफ्रिकी-अमेरिकी बने।
1908: साइबेरिया (रूस) के पोदकामेनाया तुंगुस्का नदी के पास हवा में एक विशाल उल्कापिंड के फटने से इतिहास का सबसे बड़ा प्राकृतिक विस्फोट हुआ था। इसने बिना कोई क्रेटर (गड्ढा) बनाए लगभग 2,000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैले 8 करोड़ से अधिक पेड़ों को पूरी तरह से धराशायी कर दिया था।
1914: दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के अधिकारों के लिये आंदोलन करने के दौरान राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को पहली बार गिरफ्तार किया गया।
1921: स्वीडन में मौत की सजा खत्म की गई।
1934: एडोल्फ हिटलर ने अपने कई विरोधी नेताओं की हत्या करवा दी।
1937: दुनिया का पहला इमरजैंसी नंबर 999 लंदन में जारी किया गया था।
1938: बच्चों का पसंदीदा कार्टून सुपरमैन पहली बार कॉमिक्स (डीसी कॉमिक्स एक्शन सीरीज भाग-1) में नज़र आया।
1947: भारत के विभाजन की घोषणा के बाद बंगाल और पंजाब के विभाजन के लिए बाउंडरी कमीशन के सदस्यों की घोषणा की गई।
1960: कांगो को बेल्जियम से पूर्ण स्वतंत्रता मिली।
1965: भारत-पाकिस्तान ने युद्धविराम की घोषणा की।
1997: हांगकांग पर से ब्रिटिश हुकूमत खत्म हुई।
2000: अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने डिजिटल सिग्नेचर को मान्यता दी।
2019: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नॉर्थ कोरिया के लीडर किम जोंग उन से मुलाकात की। ट्रंप नॉर्थ कोरिया जाने वाले पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बने।
2021: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने चीन को ‘मलेरिया-मुक्त’ घोषित किया। लगातार 30 वर्षों तक मलेरिया का एक भी स्वदेशी मामला सामने न आने के कड़े वैश्विक मानकों को सफलतापूर्वक पार करके चीन पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में पिछले 3 दशकों में यह दर्जा पाने वाला पहला देश बना था।
2022: मणिपुर के नोनी जिले में जिरीबाम-इम्फाल रेलवे परियोजना के टुपुल निर्माण स्थल के पास भीषण भूस्खलन से 61 लोगों मौत, जिनमें 29 भारतीय सेना के जवान भी शामिल थे।
2025: हिमाचल प्रदेश की सराज में बादल फटने के बाद आई इस बाढ़ में 7 लोगों की मृत्यु, 21 लापता, 50 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए। लगभग 400 परिवार बेघर हो गए थे, जिन्हें स्थानीय स्कूलों और प्रशासन द्वारा बनाए गए राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ी। 300 से अधिक मवेशी और पालतू जानवर (गाय, भैंस और बकरियां) काल के गाल में समा गए।
30 जून को जन्मे व्यक्ति (Born on 30 June)
1911: वैद्यनाथ मिश्र ‘नागार्जुन’– आधुनिक हिंदी और मैथिली साहित्य के अप्रतिम लेखक, कवि और जनकवि। वैद्यनाथ मिश्र का जन्म सतलखा (मधुबनी, बिहार) में हुआ था। वे प्रगतिशील काव्य आंदोलन के सबसे मजबूत स्तंभ थे। हिंदी साहित्य जगत में वे ‘नागार्जुन’ और मैथिली में ‘यात्री’ उपनाम से विख्यात हुए। उन्होंने शोषितों, किसानों और आम जनता के संघर्षों को अपनी कविताओं (जैसे अकाल और उसके बाद, बादल को घिरते देखा है) के जरिए प्रखर आवाज़ दी।
1928: कल्याणजी – हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध संगीतकर।
1934: सी. एन. आर. राव – भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक। भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित महान रसायनशास्त्री (Chemist) चिंतामणि नागेश रामचंद्र राव का जन्म बैंगलोर में हुआ था।वे सॉलिड-स्टेट और मैटेरियल्स केमिस्ट्री के क्षेत्र में दुनिया के शीर्ष वैज्ञानिकों में गिने जाते हैं। वे प्रधानमंत्री की वैज्ञानिक सलाहकार परिषद के प्रमुख भी रहे हैं और संरचनात्मक रसायन विज्ञान में उनके शोध ने भारत को वैश्विक स्तर पर बड़ी पहचान दिलाई है।
1966: माइक टाइसन – विश्व प्रसिद्ध मुक्केबाज़। मुक्केबाजी (Boxing) के इतिहास के सबसे आक्रामक और महानतम खिलाड़ियों में से एक माइक टायसन का जन्म ब्रुकलिन, न्यूयॉर्क (अमेरिका) में हुआ था। वे मात्र 20 साल की उम्र में दुनिया के सबसे युवा हैवीवेट बने थे। मुक्केबाजी की रिंग में अपने बेजोड़ कौशल और नॉकआउट करने की अद्भुत क्षमता के लिए वे पूरी दुनिया में ‘आयरन माइक’ के नाम से मशहूर हुए।
1969: सनत जयसूर्या – श्रीलंका के क्रिकेटर।
1985: माइकल फेल्प्स– इतिहास के सबसे सफल ओलंपिक एथलीट। अमेरिकी तैराक माइकल फेल्प्स का जन्म बाल्टीमोर, मैरीलैंड में हुआ था। वे ओलंपिक इतिहास के सबसे महान और सबसे अधिक पदक जीतने वाले एथलीट हैं। उन्होंने अपने करियर में कुल 28 ओलंपिक पदक जीते, जिनमें से 23 स्वर्ण पदक हैं, जो कि एक अटूट वैश्विक रिकॉर्ड है।
30 जून को हुए निधन (Died on 30 June)
1917: दादा भाई नौरोजी – भारत के स्वतंत्रता सेनानी, उद्योगपति, शिक्षाविद और विचारक। इन्हें “ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया कहा जाता है। वे ब्रिटिश संसद के सदस्य बनने वाले पहले भारतीय थे। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “Poverty and Un-British Rule in India” में ‘धन के निष्कासन का सिद्धांत’ (Drain of Wealth Theory) दिया, जिसने पहली बार दुनिया के सामने यह उजागर किया कि कैसे अंग्रेज भारत की दौलत को आर्थिक रूप से लूट रहे थे।
2003: कैथरीन हेपबर्न – चार आस्कर पुरस्कार प्राप्त अभिनेत्री।
2007: साहिब सिंह वर्मा – दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री। वे 1996 से 1998 तक दिल्ली के चौथे मुख्यमंत्री रहे और बाद में अटल बिहारी वाजपेयी की केंद्र सरकार में केंद्रीय श्रम के रूप में भी सेवाएं दी थीं।
30 जून के महत्त्वपूर्ण अवसर एवं उत्सव (Important events and festivities of 30 June)
हूल क्रान्ति दिवस (राष्ट्रीय दिवस)
भारत (विशेष रूप से झारखंड और पश्चिम बंगाल के जनजातीय क्षेत्रों) में हर साल 30 जून को ‘हूल दिवस’ या ‘संथाल हुल’ की याद में मनाया जाता है। 30 जून 1855 को वीर सिद्धो-कान्हू, चांद-भैरव और फूलो-झानो के नेतृत्व में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी, जमींदारों और महाजनों के अत्याचारों के खिलाफ जो महासंग्राम शुरू हुआ था, यह दिन उसी ऐतिहासिक आदिवासी शौर्य और बलिदान को समर्पित है। इस अवसर पर देश के अमर शहीदों को राजकीय सम्मान के साथ याद किया जाता है।
अंतरराष्ट्रीय संसदवाद दिवस
संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा वर्ष 2018 में अंतरराष्ट्रीय संसदवाद दिवस (International Day of Parliamentarism) की घोषणा की गई थी। यह दिन लोकतांत्रिक व्यवस्था की रीढ़ यानी संसदों की पारदर्शिता, जवाबदेही, जनसहभागिता और राजनीति में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाने की वैश्विक समीक्षा के रूप में मनाया जाता है।
अंतरराष्ट्रीय क्षुद्रग्रह दिवस
संयुक्त राष्ट्र द्वारा वर्ष 2016 में अंतरराष्ट्रीय क्षुद्रग्रह दिवस (International Asteroid Day) को आधिकारिक कैलेंडर में शामिल किया गया था। 30 जून 1908 को रूस के साइबेरिया में हुए इतिहास के सबसे बड़े ‘तुंगुस्का खगोलीय विस्फोट’ की बरसी पर यह दिन मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य आम जनता को नियर-अर्थ ऑब्जेक्ट्स (NEOs) यानी पृथ्वी के करीब तैर रहे क्षुद्रग्रहों (Asteroids) से होने वाले संभावित खतरों और उनसे पृथ्वी की रक्षा करने वाली वैज्ञानिक प्रणालियों के बारे में जागरूक करना है।
विश्व सोशल मीडिया दिवस
विश्व सोशल मीडिया दिवस (World Social Media Day) की शुरुआत 2010 में लोकप्रिय समाचार और प्रौद्योगिकी पोर्टल ‘मैशेबल’ (Mashable) द्वारा की गई थी। हर साल 30 जून को दुनिया भर में डिजिटल कनेक्टिविटी, वैश्विक संचार में सोशल मीडिया के प्रभाव और इसके ज़िम्मेदार व सुरक्षित उपयोग को बढ़ावा देने के लिए यह दिवस मनाया जाता है।
प्रस्तुति
हिमाचल न्यूज़ रिसर्च डेस्क
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